{"file_name": "2024_10_108_125_HIN.pdf", "text": "[2024] 10 एस. सी. आर 108: 2024 आई. एन. एस. सी. 735\n\nविजय सिंह 9 विजय कु. शर्मा\n\nबनाम\n\nबिहार राज्य\n\n(2015 की आपराधिक अपील संख्या- 1031)\n\n25 सितंबर 2024\n\n[बेला एम. त्रिवेदी और सतीशचंद्र शर्मा, न्यायमूर्तिगण]\n\nविचारण केलिएमुददा\n\nउच्च न्यायात्रय द्वारा निष्कर्षों की स्थिरता के संबंध में मुद्दा उठा जिसमें भा.द.सं. की\n\nधाराएँ 302/34 एवं 364/34 के तहत अपराध करने के कारण अपीलार्थियों को दोषी पाया\n\nगया, साथ भी उच्च न्यायालय का रुख यदि स्थित कानून के पंक्ति में स्थिर कानून द्वारा\n\nएक मुक्ति को दोषसिद्धि में पल्रटना।\n\nनोटस\n\n1860 की दंड संहिता-धाराएँ 302/34 एवं 364/34-अपहरण या भगा कर ले जाना एक संपत्ति\n\nके झगड़ा पर एक महिला का अपहरण एवंहत्या-मृत्यु के तथ्य की खोज मुखबिर एवं पीडित\n\nके बहनोई द्वारा दर्ज किया गया आगे के लिखित प्रतिवेदन- दोषसिद्धि एवं सजा जो\n\nअभियुक्त सं.1-5 का अपराध का कार्यान्वयन अभियुक्त सं. 6 एवं 7 को सभी आरोपो से\n\nधाराएँ 302/34 और 364/34 के तहत नियुक्ति-उच्च न्यायालय ने अभियुक्त सं. 1-5 के\n\nदोषसिद्धि को रोकना-साथ ही अभियुक्त सं. 6 एवं 7 को धाराएँ 364/34 एवं 302/34 के\n\nतहत अपराधों का क्रियान्वयन स्थिरता।\n\n\fअभिनिर्धारितः हत्या का अपराध पूरी तरह से परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर निर्भर है एवं एक\n\nवाद जो परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित है,\n\nसाक्ष्यों की कड़ी पूरी होनी चाहिए एवं बगैर\n\nदोष के निष्कर्ष जो छोड़ा न जा सके अवश्य देगा-अभियोजन वाद उस मानक को पाने से दूर\n\nहै-मात्र कुछ मेकअप सामग्री के पाये जाने के कारण निष्कर्ष, सबूत का तथ्य नहीं हो सकता\n\nहै कि पीडित उस घर में रह रही थी, विशेषतः जब एक अन्य महिला वहाँ रह रही थी-कोई\n\nसामग्री जो प्रत्यक्षतः इंगित करे कि मृतक के साथ मुखबिर भी वहां रहता है, पाया गया-\n\nअभियोजन उक्त तथ्य को प्रमाणित करने के लिए एक भी सहवासी वहां था परीक्षण में\n\nविफल रहा-चश्मदीद गवाहों का साक्ष्य मृत्यु के समय के पहलू की घोषणा करने में बिल्कुल\n\nअभरोसेमंद था-पोस्ट मॉर्टम प्रतिवेदन एवं पाये गए निष्कर्ष पर संदेह करने का कोई कारण\n\nनही था-अपहरण के संबंध में अभियोजन सुस्पष्ट संदेहों से भरा था-यद्यपि, पोस्ट मॉर्टम\n\nप्रतिवेदन इंगित करता है कि पीडित की मृत्यु अप्राकृतिक था एवं हत्या करने को हटाया नहीं\n\nजा सकता है, हालांकि अभियुक्त व्यक्तियों द्वारा हत्या करना प्रत्यक्ष साक्ष्य द्वारा\n\nप्रमाणित करना-अभियुकत व्यक्तियों एवं सुस्पष्ट आरोपित दोषी का कारण का जुड़ाव में\n\nअविद्यमान था। तथ्यों से निकलते हुए परिस्थितिजन्य साक्ष्यों, अपहरण के अपराध को घेरते\n\nहुए, जैसे चश्मदीद गवाहों के साक्ष्य, सबूत के परीक्षण को पाने में विफल रहे एवं इसे कानून\n\nके चक्षु\n\nमें प्रमाण नहीं माना जा सकता है-उद्देश्य का भी एक अभ्िप्राय, केवल जब\n\nअभिलेख पर साक्ष्य\n\nअपराध के तत्वों को साबित करने के लिए पर्याप्त हैं उसके तहत\n\nविचारण-संस्थापिय तथ्यों के सबूत के बिना, अभियोजन का वाद केवल उद्देश्य के मौजूदगी\n\nमें सफल नही हो सकते है- इस प्रकार अभियोजन अपने भार से विमुकत होने में उचित संदेह\n\nसे परे-कारण वाले संदेह असुलहनीय है एवं अभियोजन वाद के स्थापना पर जोर देते हैं-इसके\n\nअलावा, ए-6 एवं ए-7 के विमुक्ति को उलटने हेतु जो स्थायी कानून की पंक्ति में नही थे\n\nएवं मुक्तियों के उल्नटने के पंक्ति में नही थे-उच्च न्यायालय ने विषय का एक सरसरी दृष्टि\n\nडाली एवं विमुक्ति था विचारण न्यायालय की असंभव्यता को ध्यान में रखते हुए या\n\n \n\fविचारण हेतु न्‍यायात्रय द्वारा साक्ष्य के अप्रशंसा-अतः अपीलार्थी को सभी आरोपों से विमुक्त\n\nकिया गया, निचली अदालत द्वारा दोष के निष्कर्ष पर पहुँचने को जारी नही रखा जा सकता\n\nहै एवं दरकिनार किया गया-इससे कुछ भी अभियुक्त व्यक्तियों द्वारा धारा 302 के तहत\n\nअपराध किए जाने का अनुमान इससे नहीं लगाया जा सकता है। [कंडिकाएँ 28-32, 34-37]\n\nन्यायिक अर्थ-उच्च न्यायालय ने अवलोकन किया कि घर में पाया गया मेकअप की सामग्री\n\nविधवा महिला की नही हो सकती है,\n\nक्‍योंकि एक विधवा द्वारा मेकअप करने की कोई\n\nआवश्यकता नही थी:\n\nअभिनिर्धारित कियाः उक्त अवलोकन न केवल कानूनी तौर पर अतर्क संगत था, बल्कि\n\nकाफी आपत्तिजनक था-इस प्रकृति के समेट लेने वाल्रा अवलोकन एक कानूनी rags\n\nद्वारा अपेक्षित समपरिमाण के साथ था, विशेषतः जब यह अभिलेख पर किसी साक्ष्य द्वारा\n\nनही बनाया जाता था। [कंडिका 27]\n\nकानून वाद उदधत\n\n गोवा राज्य बनाम ठाकरन /2007 3 एस. सी. आर. 507: [2007] 3 एस. सी. सी. 755:\n\n चन्दप्पा बनाम कर्नाटक राज्य [2007] 2 एस. सी. आर. 630: [2007] 4 एस. सी. सी.\n\n415: नेपाल सिह बनाम हरियाणा राज्य [2009] 6 एस. सी. आर. 982: [2009] 12 एस.\n\nसी. सी. 351: काशीराम बनाम एम. पी: राज्य [2001] 4 पूरक एस. सी. आर. 263: [2002]\n\n 1 एस. सी. सी. 71: लाभ सिह बनाम पंजाब राज्य [1976] 1 एस. सी. सी. 181: सुरतलाल\n\nबनाम एम.पी:\n\nराज्य (1982) 1 एस.सी.सी. 488; राय साहेब एवं अन्य बनाम हरियाणा\n\nराज्य (1994) पूरक 1 एस.सी.सी. 74; संजीव बनाम एच. पी. राज्य (2022) 6 एस.सी.सी.\n\n294- संदर्भ्रित किया-\n\nअधिनियमकी सूची\n\n \n\fदंड संहिता, 1860\n\nमुख्यशब्दोंकी सूची\n\nअपहरण; हत्या; महिला का अपहरण एवं हत्या; पारिस्थितिक साक्ष्य;\n\nसाक्ष्य की कड़ी;\n\nविमुक्ति का पत्रटना; उद्देश्य; प्रयोजन; वाद का विवेकी संदेह से परे साबित करने का भार;\n\nन्यायिक विरोध; उच्च न्यायालय का अवलोकन काफी आपत्तिजनक; उच्च न्यायालय का\n\nअवलोकन जो कानून के न्यायालय से अपेक्षित संवेदनशीलता एवं निष्पक्षता आनुपातिक\n\nनहीं।\n\nवाद काउदभूतहोना\n\nअपराधिक अपीलीय Saran: 2015 का अपराधिक अपील सं.- 1031\n\nपटना उच्च न्यायालय का न्यायाधिकार दिनांकित 26.03.2015 के निर्णय एवं आदेशमें\n\nसरकारी अपील (खंड पीठ) संख्या- 16,1992 का।\n\nसाथ\n\n2017 का आपराधिक अपील सं. 1578, 765, 1579\n\nपक्षों की उपस्थिति\n\nआर. के. दास, वरीय अधिवक्ता, सुश्री फौजिया शकील, अमित शर्मा, दिपेश सिन्हा,\n\nसुश्री\n\nपललवी बरुआ,सुश्री अपर्णा सिंह, अजय कुमार सिंह, अपीलार्थी के लिए अधिवक्तागण।\n\nशिवम सिंह,\n\nकार्तिकेय अग्रवाल, मनीष कुमार,\n\nशंतानु सागर, अमित कुमार,प्रभात रंजन\n\nराज,\n\nगुंजेश\n\nरंजन,\n\nशशांक कुमार सौरभ,\n\nवैभव जैन, मनोनीत द्विवेदी,\n\nप्रतिवादी\n\nके\n\nअधिवक्तागण।\n\n \n\fGated SAGs का निर्णय/आदेश\n\nनिर्णय\n\nसतीशचन्द्र शर्मा, माननीय न्यायाधीश\n\n1.\n\n30.08.1985 को नीलम ने सिमलतला, थाना- सिकंदरा, जिला- मुंगेर, बिहार में अपनी\n\nअंतिम साँस ली। उसके मृत्यु का तथ्य मुखबीर एवं मृतक के बहनोई, यानि रामानंद\n\nसिंह राज्य (विचारण न्यायात्रय के समक्ष पी.डब्ल्यू. 18 के रुप में परीक्षित) जहाँ\n\nउन्होने यह आरोप लगाया कि नीलम को सात व्यक्तियों दवारा उनके घर से अपहरण\n\nकिया गया जो उसी दिन 10.00 रात्रि के लगभग घटी।\n\nसूचना के अनुसार, 1985 की\n\nप्राथमिकी सं. 127 थाना- सिकंदरा में दर्ज किया गया एवं अन्वेषण की कार्रवाई शुरु\n\nकी गई, जो सात अभियुक्त व्यक्तियों अर्थात्‌ कृष्ण नंदन सिंह (अभियुक्त सं.\n\n1), राम\n\nनन्दन सिंह (अभियुक्त सं. 2),\n\nराज नंदन सिंह (अभियुक्त सं. 3), श्याम नंदन सिंह\n\n(अभियुक्त सं. 6) एवं तनिक सिंह (अभियुक्त सं. 7) के खिल्राफ एक आरोप-पत्र दायर\n\nकरने को लेकर हुई।\n\n2.\n\nविचारण न्यायालय ने 1860 की भा.दं.सं. की धाराएँ 323, 302, 364, 449, 450,\n\n380/34 एवं 120 बी के तहत दंडनीय अपराध करने के कारण हुई। बाद में अभियुक्त\n\nसं. 6 एवं 7 को भा.दं.सं. की धाराएँ 342, 506 के साथ पठित धारा 34 के तहत\n\nदंडनीय अपराध के लिए भिन्‍न रुप से आरोपित थे। विचारण के पश्चात, विचारण\n\nन्यायालय ने आदेश दिनांकित 05.06.1992 के माध्यम से अभियुक्त सं.- 1, 2, 3, 4\n\nएवं 5 के लिए सूचीबद्ध अभियुक्त व्यक्तियों को दोषसिद्धि हेतु भा.दं.सं की धारा\n\n302/34 एवं 364/34 के तहत अपराध करने के लिए की गई। उन्हे दूसरे आरोपों से\n\nबरी कर दिया गया एवं अभियुक्त सं. 6 एवं 7 सभी आरोपों से बरी कर दिया गया।\n\n\f दोषसिद्धि व्यक्तियों\n\nने पटना उच्च अदालत को दोषसिद्धि आदेश के खिल्राफ\n\nदोषसिद्धि के अपील को प्राथमिकता दी एवं राज्य ने उच्च न्यायालय के समक्ष दोनों\n\nआरोपित व्यक्तियों को भी रिहा करने के आदेश के खिलाफ आरोप को प्राथमिकता दी।\n\nसंक्षिप्त तथ्य\n\nअनावश्यक विवरणों को छीनते हुए, तथ्य यह बताते हैं कि मृतक नीलम अशोक कुमार\n\nकी पत्नी हैं जो पी.डब्ल्यू.3/ गणेशप्रसाद सिंह, एवं सूचनादाता पी.डब्ल्यू.18/ रामानंद\n\nसिंह अशोक कुमार के भाई थे। सूचनादाता का वाद समय के संदर्भित बिंदु पर यह था\n\nकि मृतक अपने पति के साथ अपने दिवंगत पिता जंग बहादुर के साथ अपने पिता के\n\nघर में रह रही थी, जो सिमलतला में आंशिक रुप से मृतक, उसके पति एवं उसके\n\nबहनोई द्वारा दखल किया गया था एवं शेष भाग पर किराएदारों द्वारा किराए पर था,\n\nजो उस भाग में रह रहे थे।\n\nअभियोजन वाद के अनुसार 30.08.1985 को करीब 10.00 रात्रि में पी.डब्ल्यू. 18 घर\n\nके बाहर एक रिक्शा में दोमन तांती, दासो मिस्त्री एवं सूरदास एवं नीलम घर के अंदर\n\nरह रही थी। उसके पति, अशोक कुमार, अपने निवास स्थान घोगशा गए थे। अचानक,\n\nसात अभियुक्त व्यक्तियों जिसमें अपीलार्थी हमारे समक्ष थे,\n\nउत्तर दिशा से 15 अन्य\n\nअज्ञात हमलावर सामने आए थे। अभियुक्त विजय सिंह/ए-6 सूचनादाता/पी.डब्ल्यू.18\n\nको पकड़ लिया एवं जैसे ही उसने अलार्म उठाया एवं चिल्लाना शुरु किए, दो अज्ञात\n\nव्यक्तियों ने उनके सामने पिस्तौल तान दिया एवं उन्हे खामोश रहने का निर्देश दिया।\n\nइसके पश्चात, अभियुक्त व्यक्तियों, जिन्होने सुचनादाता को पकड़ा उस पर मुक्‍का एवे\n\nथप्पड़ द्वारा हमला किया एवं उन्हे एक कुआँ के निकट जो घर के उत्तर की ओर था,\n\nसीमित कर दिया। इस बीच ए-1 घर में 5-7 अन्य अभियुक्त व्यक्तियों के साथ, एक\n\nनिवासी यानि कुमुद रंजन सिंह द्वारा घर की छिटकिनी खोलकर नीलम को घर के\n\n \n\fबाहर खींच लिया। जैसे ही उन्हे घर के बाहर खींचा, चार व्यक्तियों ने नीलम को\n\nउठाकर लोहड़ा की ओर चलने त्रगे। सूचनादाता के अनुसार, अभियुक्त व्यक्तिगण\n\nने\n\nदो साड़ी, दो ब्लाउज, दो साया एवं चप्पल का एक जोड़ा, नीलम का बाहर ले जाने\n\nउठाया।\n\nजैसे ही सूचनादाता ने शोर किया, मोहल्ला के अन्य व्यक्ति भी वहां एकत्रित हुए\n\nजिसमें पी.डब्ल्यू.\n\n2, विनय कुमार सिंह,\n\nपी.डब्ल्यू. 4 चन्द्रशेखर प्रसाद सिंह एवं\n\nपी.डब्ल्यू. 5 राम नरेश सिंह भी शामित्र थे। उक्त तीन साक्षियों ने अभियुक्त व्यक्तियों\n\nको नीलम को ले जाते हुए देखा, लेकिन उन्हें रोक नही सके। सूचनादाता ने स्पष्ट\n\nकिया कि कोई भी व्यक्ति अभियुक्त व्यक्तियों का पीछा करने का साहस नही किया,\n\nक्योकि उनलोगो ने उनकी ओर पिस्तौल तान दिया एवं उन्हें गम्भीर परिणामों की\n\nघोषणा की। सूचनादाता ने अपराध करने के पीछे का उद्देश्य की व्याख्या भी की है।\n\nउनके बयान से यह भी प्रतीत होता है कि नीलम के दिवंगत पिता जंग बहादुर सिंह को\n\nपुत्र\n\nनहीं था एवं उनका घर उनकी बेटी नीलम के कब्जे में घर था। उनका अपहरण\n\n उनके पिता के घर का बलपूर्वक कब्जा करने के लिए किया गया था। दूसरा अंग एक\n\nतरफ ए-1 से ए-5 (अपीलार्थी) के बीच लंबित कानून से उत्पन्न होता है एवं मृतक\n\nनीलम, उनके नाना एवं उनकी दो बहनों का दूसरे तरफ से था। अभियुक्त व्यक्ति\n\nस्वर्गीय जंग बहादुर सिंह द्वारा लिखे गए प्रोबेट की इच्छा एवं प्रशासन प्राप्त पत्रों,\n\nजो सक्षम अदालत प्राप्त था एवं उक्त आदेश पटना उच्च न्यायालय के समक्ष मृतक,\n\nउसके नाना एवं छोटी बहनों से प्राप्त था। उक्त अपील में पटना उच्च न्यायात्रय ने\n\nनिषेधाज़ा द्वारा संपत्ति के किसी अंश को अलगाव की भावना रखा था। उच्च न्यायालय\n\nप्रोबेट के वसीयत के कार्यान्वयन पर एवं अभियुक्त व्यक्तियों को संपत्ति के कब्जे को\n\nप्रदान करने से रोका। मृतक नीलम अपने पति एवं बहनोई के साथ अपने पिता के घर\n\n\fमें रहती थी ताकि संपत्ति का कब्जा उसके पास रहे। इस पृष्ठभूमि में विषय मुकदमे के\n\nलिए गया।\n\nविचारण न्यायालय के समक्ष\n\nविचारण न्यायात्रय, ए-6 एवं ए-7 को रिहा करते हुए, यह अवलोकन किया कि अपराध\n\nकरने का उद्देश्य उक्त दो व्यक्तियों पर आरोप नही थे क्योकि लंबित कानून को\n\nखोलने में उनका कोई हित नही था। इसके अलावा यह भी पाया गया कि ए-6 का नाम\n\nप्राथमिकी में नही था, जो पी.डब्ल्यू.--18 सुपूर्द किए गए सूचना में दर्ज हुआ था एवं\n\nउनके मौखिक सदस्य में, हमले का कोई कथन ए-6 एवं ए-7 में नही दिया गया था |\n\nइसके अलावा यह भी अभिनिर्धारित किया गया कि कोई साक्ष्य विचारण के दौरान\n\nप्रकट नही हुए, यह बताने के लिए हत्या होना एवं उनका अपहरण अधिनियमों में हुआ\n\nथा।\n\nभारतीय दंड संहिता की धाराओं 302/34 एवं 364/34 के तहत ए-1\n\nसे ए-5 पर\n\nदोषसिद्ध करते हुए, विचारण अदात्रत द्वारा पी.डब्ल्यू-18, सूचनादाता, पी.डब्ल्यू.-2,\n\nपी.डब्ल्यू.-4 एवं पी.डब्ल्यू.-5 के साक्ष्यों पर निर्भर थी। अपराध करने का मकसद स्व.\n\nजंग बहादुर सिंह की संपत्ति को लंबित कानूनी झगड़ा में\n\nप्रदान किया गया था।\n\nअदात्त ने पारिस्थितिक साक्ष्य पर पी.डब्ल्यू.-7 (मृतक के मामा), पी.डब्ल्यू.-3 (मृतक\n\nके ससुर), पी.डब्ल्यू-23 (मृतक की बहन) एवं पी.डब्ल्यू.-13 (डॉक्टर) का जवाब दोष\n\nपर निष्कर्ष पर पहुँचना।\n\nउच्च न्यायालय के समक्ष\n\nउच्च न्यायात्रय द्वारा पारित विवादित निर्णय के पठन से यह सुझाव मिलता है कि\n\nउच्च न्यायात्रय ने साक्ष्य की नयी प्रशंसा की। उच्च नयायात्रय सर्वप्रथम इस बात की\n\n\fपरीक्षा किया कि क्‍या नीलम वास्तव में उस घर में रह रही थी जहाँ से उसका अपहरण\n\nहुआ था।\n\nपी.डब्ल्यू-7\n\n(मृतक के\n\nमामा),\n\nपी.डब्ल्यू-18\n\n(मृतक के बहनोई एवं\n\nसूचनादाता) एवं पी.डब्ल्यू.-21 (अन्वेषण पदाधिकारी) के साक्ष्यों पर भरोसा करते हुए,\n\nन्यायालय ने यह निष्कर्ष निकाला कि नीलम वास्तव में उक्त घर में रह रही थी ।\n\nऐसा करने में, न्यायालय ने इस तथ्य का विरोध किया कि घर के अन्य स्वतंत्र\n\nदखलकार जैसे राम छबीला सिंह, उसके पुत्र, कुमुद रंजन सिंह आदि उक्त तथ्य के\n\nसमर्थन में नही आए। इस कमी को पार कर, न्यायालय ने\n\nपी.डब्ल्यू-21\n\nएवे\n\nपी.डब्ल्यू-23 (मृतक की बहन) के बयानों पर कहा कि कुछ मेकअप सामग्री, उस कमरे\n\nमें रखे बैग में पाया गया, जो इस तथ्य का सुझाव में पी.डब्ल्यू.-21 एवं पी.डब्ल्यू.-23\n\n(मृतक की बहन), इस तथ्य पर निर्भर करते हुए इस तथ्य का सुझाव कि एक महिला\n\nउक्त कमरे में रह रहे थे।\n\n10.\n\nआगे विचारण में, उच्च न्यायात्रय ने पी.डब्ल्यू.-5 के साक्ष्य निष्कासित किया कि\n\nघटना के स्थान पर उनकी उपस्थिति संदेहात्मक था |\n\nपी.डब्ल्यू.-5 ने बयान दिया कि\n\nवह अपने घर की ओर देवघर से प्रस्थान कर रही थी कि लखीसराय से सिमलतला के\n\nरास्ते में वह पी.डब्ल्यू-2 एवं पी.डब्ल्यू-4 के साथ सिकंदरा चौक पर रुकी थी। इस\n\nबिंदु पर वे हल्ला सुने एवं अपराध करने पर साक्षियों पर समाप्त हुआ। उच्च\n\nन्यायालय ने इस तथ्य पर ध्यान दिया कि देवघर से सिमला जाते हुए त्रखीसराय एवं\n\nघोगसा पहले आएंगे एवं इस प्रकार पी.डब्ल्यू..5 को सिकंदरा चौक पर जाने का कोई\n\nकारण नही था, अगर वह अपने घर घोगसा जा रहा था, क्योंकि वह सीधे लखीसराय से\n\nघोगसा जाता। फिर भी, उच्च न्‍्यायात्रय के पी.डब्ल्यू.-2, पी.डब्ल्यू.-4 एवं पी.डब्ल्यू.-18\n\nके साक्ष्यों के साथ पारिस्थितिक साक्ष्य जिसमें पी.डब्ल्यू.-23, पी.डब्ल्यू.-13 (डॉक्टर) ने\n\nसाक्ष्यों पर भरोसा किया एवं उचित स्पष्टीकरण के अभाव में 1973 की आप.दं. सं.\n\n\f की धारा 313 के तहत मृतक द्वारा भागे गए घातक चोर के संबंध में। इस तरह,\n\nउच्च न्यायालय ने ए-1 से ए-5 के गलती के निष्कर्ष को अभिनिधारित किया।\n\n11,\n\nए-6 एवं ए-7 के संबंध में, उच्च न्यायालय ने विचारण न्यायात्रय रिहा के निष्कर्ष को\n\nपल्रट दिया।\n\nमुख्यतः उच्च न्यायालय अवलोकित किया कि उक्त दोनो अभियुक्त\n\nव्यक्ति को रिहा के निष्कासन के इस आधार को कायम नही रखा जा सकता है।\n\nइसके अलावा न्यायालय ने अभिनिधौरित किया कि पी.डब्ल्यू.-2,\n\nपी.डब्ल्यू.-4\n\nएवं\n\nपी.डब्ल्यू.-18 के साक्ष्य, ए-6 एवं ए-7 के भागीदारी के संबंध में सुसंगित है एवं इस\n\nप्रकार भा.दं.सं. की धाराएँ 364 एवं 302 के साथ पठित धारा 34 के तहत अपराध\n\nकरने हेतु दोषी पाए गए थे।\n\nभा.दं.सं. का प्रयोग इस तथ्य पर आधारित था कि ए-6\n\nएवं ए-7 ने पी.डब्ल्यू-18 कुआ के निकट सीमित रखा ताकि अन्य पाँच अभियुक्त\n\nव्यक्तियों द्वारा किए गए कार्य किसी आदेश को समाप्त करने एवं विरोध करने का\n\nकार्य किया गया है।\n\nप्रस्तुतियाँ\n\n12,\n\nए-6 और ए-7 की ओर से यह प्रस्तुत किया जाता है कि उक्त अभियुक्त व्यक्तियों का\n\nअपराध करने में शामित्र होने का कोई उददेश्य नहीं था। उद्देश्य, यदि कोई हो, केवल\n\nशेष पाँच अभियुक्त व्यक्तियों के लिए मौजूद था जो पक्षों के बीच लंबित मुकदमे के\n\nपरिणाम में रुचि रखते थे। यह आगे तक दिया जाता है कि उच्च न्यायालय को\n\nनिचली अदालत दूवारा लिए गए इष्टिकोण में कोई कमजोरी पाए बिना पूरे साक्ष्य की\n\nपुनः सराहना करने का अभ्यास नहीं करना चाहिए था। इस निवेदन को पुष्ट करने के\n\nलिए, यह प्रस्तुत किया जाता है कि चूंकि विचारण न्यायालय द्वारा लिया गया\n\nटृष्टिकोण एक संभावित इष्टिकोण था, इसलिए उच्च नयायात्रय द्वारा अपील में इसे\n\nबाधित नहीं किया जा सकता था। इस संबंध में, इस न्यायालय के निर्णयों पर निर्भरता\n\n\f रखी गई Bl Mal Wor TNA AAT ANA5AGU\nIANA कर्नाटक राज्य, 6\n\nराज्य,\nसिह बनाम हरियाणाराज्य_7\nनेपाल\n\nकाशीराम बनाम एम.\n\nपी.\n\nत्राभ सिह\n\nबनाम पंजाब राज्य 9 ऑर सूरतलाल बनाम एम. पी. राज्य/\n\n13.\n\nयह आगे प्रस्तुत किया जाता है कि पीडब्लू2 और पीडब्लू4 की गवाही पर कोई भरोसा\n\nनहीं किया जा सकता क्‍योंकि मौके पर उनकी उपस्थिति संदिग्ध थी। इसके अलावा,\n\nजब शोर-शराबा किया गया तो अगर वे 400 गज की दूरी पर थे, तो वे ए-6 को\n\nपीडब्लू 18 को कुएं की ओर ले जाते हुए नहीं देख सकते थे क्योंकि उक्त तथ्य शोर-\n\nशराबा से पहले हुआ था। यह आगे प्रस्तुत किया जाता है कि प्राथमिकी में कोई\n\nपिस्तौल् निर्धारित हुआ है, जबकि उक्त तथ्य साक्ष्य के समय आगे त्राया जाएगा |\n\nअपीलार्थीगण ने चिकित्सिय साक्ष्य के आधार पर घटना के समय के संबंधमें प्रश्न\n\nउठाए हैं। यह कहा जाता है कि पोस्ट मार्टम प्रतिवेदन यह इंगित करता है कि पीडित\n\nके पेट में आधा पचा हुआ भोजन पाया गया, जबकि सूचनादाता पी.डब्ल्यू.-18 का यह\n\nकथन है कि घटना रात के भोजन के\n\nतुरंत बाद हुआ।\n\nऐसे वाद में,\n\nमृत्यु\n\n30.08.1985-31.08.1985 के मध्य रात्रि में 1-2 पूर्वाहन में हुआ, लेकिन पोस्ट मार्टम\n\nप्रतिवेदन, जो 31.08.1985 को लगभग 05.30 बजे अपराहन में ल्रिए गए पोस्ट मार्टम\n\nपर आधारित है, यह इंगित करता है कि मृत्यु लगभग 24 घंटे पहले हुई एवं इस\n\nप्रकार मृत्यु का समय 30.08.1985 को लगभग 05.00 बजे अपराहन एवं न की\n\n10.00 रात्रि में, जैसा कि आरोपित है।\n\n14.\n\nअपीलकताओं ने यह भी कहा है कि अभियोजन पक्ष ने यह साबित नहीं किया है कि\n\n मृतक वास्तव में सिमल्‍्तल्‍्ला में संबंधित घर में रह रहा था।\n\nL5.\n\nइसके विपरीत, राज्य की ओर से यह प्रस्तुत किया जाता है कि केवल कुछ स्वतंत्र\n\nगवाहों से पूछताछ न करना अभियोजन पक्ष के मामले के लिए घातक नहीं होगा।\n\n\fरिलायंस को रखा गया है। राय स्राहब एवं अन्य बनाम हरियाणा राज्य के वाद में इस\n\nन्यायालय का निर्णय पर भरोसा रखा गया है एवं तक॑ दें कि कभी-कभी, स्वतंत्र गवाह\n\nडर के कारण आगे नहीं आ सकते हैं। यह आगे प्रस्तुत किया जाता है कि उच्च\n\nन्यायात्रय ने अभियुक्त व्यक्तियों के अपराध के निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए साक्ष्य की\n\nसही सराहना की है। यह आगे प्रस्तुत किया जाता है कि पीडब्लू2,\n\nपीडब्लू4 और\n\nपीडब्लू18 की गवाही सुसंगत है और उच्च न्यायालय ने उनकी गवाही पर सही ढंग से\n\nभरोसा किया है। जहां तक उद्देश्य का संबंध है, यह प्रस्तुत किया जाता है कि साक्ष्य\n\nअपराध के उद्देश्य को प्रकट करने के लिए पर्याप्त है।\n\n16.\n\nहमने अपीलार्थियों के साथ-साथ राज्य के लिए भी विद्वान वकीलों को सुना है। हमने\n\nअभिलेख की भी सावधानीपूर्वक जाँच की है।\n\nचर्चा\n\n17.\n\nपक्षकारों द्वारा उठाई गई प्रतिद्‌वंदवी दलीलों के आलोक मैं, न्यायालय के समक्ष जो\n\nप्रमुख मुद्दा उठता है, वह यह है कि क्या उच्च न्यायालय द्वारा अपीलार्थियों के\n\nअपराध का निष्कर्ष रिकॉर्ड पर साक्ष्य के आलोक में टिकाऊ है। इस मुद्दे के परिणाम\n\nयह जांचने के लिए कि क्या उच्च न्यायालय का इष्टिकोण किसी आपराधिक अपील में\n\nदोषमुक्ति को दोषसिद्धि में बदलने के लिए तय किए गए कानून के अनुरूप AT\n\n18.\n\nनिचली अदालत और उच्च न्यायात्रय के समक्ष दो दौर की मुकदमेबाजी के बाद, यह\n\nकाफी हद तक निश्चित है कि मामले की जांच केवल आई. पी. सी. की धारा 364 एवं\n\n302 और आई. पी. सी. की धारा 34 के तहत अपराधों के संबंध में की जानी है।\n\nआई. पी. सी. की धारा 364 के तहत अपराध के संबंध में, अभियोजन पक्ष का मामल्रा\n\nप्रत्यक्ष मौखिक साक्ष्य पर आधारित है, और आई. पी. सी. की धारा 302 के तहत\n\n\fअपराध के संबंध में, अभियोजन पक्ष का मामला अनिवार्य रूप से परिस्थितिजन्य\n\nसाक्ष्य पर आधारित है क्योंकि हत्या करने का कोई प्रत्यक्ष सबूत एकत्र नहीं किया जा\n\nसकता है। हालाँकि, यह बिल्कुल स्पष्ट है कि हत्या का अपराध अपहरण के अपराध के\n\nबाद किया गया था। दोनों अपराधों के बीच एक क्रमिक संबंध है और इस प्रकार, हत्या\n\nके अपराध के लिए एक मामला स्थापित करने के लिए, आरोपी व्यक्तियों/अपीलार्थियों\n\nद्वारा अपहरण के अपराध के अपराध को साबित करना आवश्यक है।\n\nक्‍योंकि,\n\nपरिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित मामले में श्रृंखला पूर्ण और सुसंगत होनी चाहिए।\n\n19.\n\nआई. पी. सी. की धारा 364 के तहत अपराध को साबित करने के लिए अभियोजन\n\nपक्ष\n\nने चार चश्मदीद गवाहों-पी.\n\nडब्ल्यू-2,\n\nपी.\n\nडब्ल्यू.-4,\n\nपी.\n\nडब्ल्यू-5 और पी.\n\nडब्ल्यू.18 की मौखिक गवाही पर भरोसा किया है। उनकी गवाही पर विभिन्‍न मामलों\n\nमें हमला किया गया है। अपीलकर्ताओं ने उक्त गवाहों को इच्छुक और संयोग गवाह\n\nबताया है। पहला आरोप इस तथ्य से उत्पन्न होता है कि गवाह मृतक से संबंधित थे,\n\nऔर दूसरा आरोप इस तथ्य से उत्पन्न होता है कि गवाहों के पास अपराध के स्थान\n\nपर उपस्थित होने के लिए कोई कारण नहीं था और वे केवल संयोग के रूप में\n\nअप्रत्याशित रूप से उपस्थित हुए। आइए हम दोनों पहलुओं की जांच करें। हम पहले\n\nमृतक के साथ उनके संबंधों में गए बिना स्वतंत्र रूप से गवाहों की गवाही की जांच कर\n\nसकते हैं।\n\n20.\n\nमुखबिर पीडब्लू18 ने बयान दिया है कि वह अपने घर के बाहर एक रिक्शा के पास\n\nखड़ा था और मृतक घर के अंदर सो रहा था। पीडब्लू18 तीन स्वतंत्र व्यक्तियों, डोमन\n\nटेंटी, दासों मिस्त्री और सूरदास के साथ खड़ा था। सात अभियुक्त व्यक्ति 15 अन्य\n\nव्यक्तियों के साथ आए थे। ए-6 और ए-7, अज्ञात व्यक्तियों के साथ, पहले पीडब्लू\n\n18 के पास आए और उसे कुएं की ओर ले गए और वहां उसे बंद कर दिया। इसके\n\n\fबाद, शेष आरोपी व्यक्ति अन्य अज्ञात हमलावरों के साथ उस घर में घुस गए, जहाँ\n\nमृतक सो रहा था। दिलचस्प बात यह है कि मुखबिर के बयान के अनुसार, घर को\n\nअंदर से बंद कर दिया गया था और एक किरायेदार कुमुद रंजन सिंह द्वारा खोला गया\n\nथा। सूचना देने वाले के संस्करण के साथ समस्या इसी बिंदु से शुरू होती है। उनके\n\nकथन के अनुसार, घटना के पहले चश्मदीद गवाह डोमन टेंटी, दासो मिस्त्री, सूरदास\n\nऔर कुमुद रंजन सिंह होने चाहिए थे। सूरदास नामक एक व्यक्ति को अंधा बताया\n\nगया था और इस प्रकार, उसे बाहर रखा जा सकता है। फिर भी, अभियोजन पक्ष को\n\nघटना के तीन प्राकृतिक गवाहों, डोमन टेंटी, दासो मिस्त्री और कुमुद रंजन सिंह से\n\nपूछताछ करनी चाहिए थी। प्राकृतिक चश्मदीद गवाहों से पूछताछ न करने के लिए कोई\n\nस्पष्टीकरण नहीं है। संस्करण अधिक संदिग्ध हो जाता है जब उसके बयान के आलोक\n\nमें इसकी जांच की जाती है कि वह आरोपी व्यक्तियों को रोक नहीं सका क्योंकि ए-6\n\nने उसे पिस्तौल से धमकी दी थी। एफ. आई. आर.में, ए-6 को किसी भी पिस्तौल के\n\nलिए जिम्मेदार नहीं ठहराया गया है, जबकि निचली अदात्रत के समक्ष दर्ज बयान में,\n\nइस तथ्य को पहली बार पेश किया गया था, जो सुधार का संकेत है। इसके अलावा,\n\nपीडब्लू18 ने प्राथमिकी में यह दर्ज कराया कि ए-6 और अन्य लत्रोगों ने उस पर मुट्ठी\n\nऔर थप्पड़ से हमला किया था, लेकिन उक्त तथ्य को निचली अदालत के समक्ष\n\nउसकी जांच में पेश नहीं किया गया था। यह विसंगति इस तथ्य के आलोक में अधिक\n\nगंभीरता धारण करती है कि किसी भी अभियुक्त व्यक्ति से कोई पिस्तौल बरामद नहीं\n\nकी गई है और यदि पिस्तौत्र की ब्रांडिंग का तथ्य संदेह का बादल है, तो पीडब्लू 18\n\nका पूरा आचरण संदिग्ध और अप्राकृतिक हो जाता है,\n\nक्योंकि उसने अभियुक्त\n\nव्यक्तियों को परिसर में प्रवेश करने या मृतक का अपहरण करने या मृतक को अपनी\n\nआंखों के सामने उनके कंधों पर ले जाने से रोकने की कोशिश नहीं की क्योंकि वह\n\nमृतक का बहनोई था।\n\n\f21.\n\nअन्य चश्मदीद गवाह, पीडब्लू2, पीडब्लू4 और पीडब्लू5 ने सामूहिक रूप से अभियोजन\n\nपक्ष के पक्ष में बयान दिया क्‍योंकि वे एक साथ अपराध स्थत्र पर पहुंचे थे। लगभग\n\n10 बजेः00 रात्रि में उस दुर्भाग्यपूर्ण रात को, उक्त चश्मदीद गवाह सिकंदर चौक पर\n\nमौजूद थे और उन्होंने मृतक के घर पर कुछ शोर-शराबा सुना। गवाह लखीसराय से\n\nएक जीप में एक साथ आ रहे थे और घोघा गाँव में अपने घर की ओर जा रहे थे,\n\nजिस गाँव में मृतक की शादी हुई थी और पीडब्लू 18/मुखबिर के पैतृक गाँव की ओर\n\nभी जा रहे\n\nथे।\n\nपीडब्लू2 पीडब्लू4 का चालक था। उक्त पीडब्ल्यू की गवाही से यह\n\nस्पष्ट हो गया है कि लखीसराय से सिकंदर चौक आते समय घोगशा पहले आया,\n\nउसके बाद लोहंदा और सिमलल्‍्तल्‍ला आता है। ऐसी परिस्थितियों में, 10 बजे रात्रि\n\nमें\n\nसिकंदर चौक पर उनकी उपस्थिति को अदालत की संतुष्टि के लिए समझाया जाना\n\nचाहिए। उनके पास सिमल्रतल्‍्ला आने का कोई अवसर नही था, क्योकि यह उनके\n\nWed से नहीं गुजरना था।\n\n22,\n\nदित्रचस्प होते हुए यह कभी उच्च न्यायालय द्वारा विधिवत ध्यान देते हुए पीडब्लू5 के\n\nसंबंध में, क्योकि उनके पास घटना के समय सिकंदरा चौंक पर उपस्थित होने का कोई\n\nकारण नही था एवं उसके प्रमाण को बाहर किया गया। हात्रांकि, यही तथ्य पीडब्लू4 के\n\nसाथ प्रमाण का विस्तारण उसी तर्क से किया जाए, क्योकि यह समानतः उनके लिए\n\nअसंभावत सिकंदरा चौक पर 10.00 बजे रात्रि में घटना के दिन उपस्थित होना। उसे\n\nसिकंदरा चौक जाना उसके गाँव जाने हेतु अनावश्यक था। अन्यथा भी,\n\nचूँकि तीनो\n\nचश्मदीद गवाह के संस्करण के अनुसार समान रुप से पदस्थापित थे। एक गवाह का\n\nप्रमाण को रद्द करना एक प्राकृतिक संदेह को उठा सकता है एवं अन्य दो गवाहों का\n\nप्रमाण भी खारिज किया जा सकता है जब तक उनके पास इससे बेहतर स्पष्टीकरण\n\nथा।\n\nहालांकि, उच्च न्यायालय द्वारा ऐसे संदेह को पसंद नहीं किया जाता है एवं\n\nविवादित निर्णय इसके लिए कोई स्पष्टीकरण नही प्रदान किया जा सकता है\n\n।\n\nअपने\n\n\fही प्रमाण के आलोक में,\n\nतीनों चश्मदीद गवाहों में से कोई को सिकंदरा चौंक या\n\nसिमलतल्ला होकर गाँव नही जाते है।\n\n23,\n\nचश्मदीद गवाहों का प्रमाण अभिलेख पर अन्य साक्ष्यों के आलोक में हटाये भी जा\n\nसकते है।\n\nपीडब्लू 21 वाद का अन्वेषण पदाधिकारी थे एवं उसने उक्त पीडब्लू को\n\nघटना के चश्मदीद गवाहों के रुप में परीक्षण किया था। चश्मदीद गवाहों द्वारा बढाये\n\nगए संस्करण गंभीर संदेह से मित्रते हैं जब साक्ष्य के आत्रोक में डी.डब्लू. 3 एवं डी.\n\nडब्लू. 4, वे घटना के पश्चात पीडब्लू 18 के साथ थाना पहुँचा था एवं न उसने पीडब्लू\n\n4 ने आई.ओ. को सूचना दी थी कि उन्होने प्रत्यक्षतः घटना को देखा था। पीडब्लू 21\n\nएवं डी.डब्लू. 3/डी.डब्लू.4 के बीच बढाये गए संस्करण अन्वेषण की निष्पक्षता के संदर्भ\n\nमें गंभीर संबंध उठाते है कि चश्मदीद गवाहों को वाद को साबित करने हेतु लाया गया\n\nथा। डी.डब्लू.3 एवं डी.डब्लू.4, दोनो वरीय पदाधिकारी जिन्होने पीडब्लू 21 द्वारा किए\n\nगए अन्वेषण के ऊपर सर्वेक्षण किया, यह इंगित करता है कि घटना में कहे गए\n\nचश्मदीद गवाह वास्तव में तथ्यों के उपरांत उपस्कर थे एवं न की तथ्यों के उपस्कर।\n\n24.\n\nआपत्ति का दूसर अंग चश्मदीद गवाहों के प्रमाण के खिलाफ यह था कि कोई चश्मदीद\n\nगवाह, तथ्यों का स्वतंत्र गवाह नही था।\n\nसाधारणतः, गवाहों के कानून का कोई नियम\n\nहटाने लायक नहीं है, केवल इसलिए कि पीडित को जानते थे या उसके परिवार के\n\nसदस्य थे।\n\n25,\n\nमुख्यतः चश्मदी गवाहों का आचरण भी अप्राकृतिक प्रतीत होता है, इस पर विचार\n\nकरते हुए कि वे सभी मृतिका के रिश्तेदार थे। पहले पीडब्लू 18 ने अपहरण को रोकने\n\nका प्रयास किया कि पीडब्लू2, पीडब्लू4 और पीडब्लू5 एक जीप में आए और उन्होंने\n\nआरोपी व्यक्तियों को नीलम का अपहरण करने के बाद उसके साथ जाते देखा। यह भी\n\nस्वीकार किया जाता है कि उन्होंने अभियुक्त व्यक्तियों की पहचान की थी, जो\n\n\fअनिवार्य रूप से चश्मदीद गवाहों के रिश्तेदार थे। ऐसी परिस्थितियों में, स्वाभाविक\n\nमानव आचरण के अनुसार, वे कम से कम अपनी जीप में आरोपी व्यक्तियों का पीछा\n\nकर सकते थे। माना जा सकता है कि उनके पास एक तैयार वाहन था। इसके बावजूद,\n\nउनकी ओर से ऐसा कोई प्रयास नहीं किया गया, इतना कि अगली सुबह तक नीलम\n\nका शव भी नहीं मिल्रा क्योंकि किसी भी चश्मदीद गवाह को इस बात का कोई सुराग\n\nनहीं था कि आरोपी व्यक्ति मृतक को अपहरण करने के बाद कहाँ ले गए थे।\n\n26,\n\nवर्तमान मामले में एक महत्वपूर्ण मूलभूत तथ्य यह है कि मृतक सिमल्तल्‍्ला में अपने\n\nपिता के घर पर रह रही थी। हालाँकि, निचली अदालत और उच्च न्यायात्रय ने उक्त\n\nतथ्य पर संदेह नहीं किया है, लेकिन इस बारे में हमारी आपत्तियाँ हैं।\n\nपीडब्लू18\n\n(मुखबिर), पीडब्लू23 (मृतक की बहन) और पीडब्लू7 (मृतक के मामा) के बयानों के\n\nअलावा, किसी अन्य गवाह ने निवास के तथ्य को साबित करने के लिए गवाही नहीं दी\n\nहै। अभिलेख पर स्वीकार किए गए साक्ष्य पर्याप्त रूप से इंगित करते हैं कि कई अन्य\n\nकिरायेदार एक ही घर में रह रहे थे, जिनमें कुमुद रंजन सिंह,\n\nशिक्षा अधिकारी राम\n\nचबीला सिंह अपनी बेटी और बेटे के साथथे।\n\n27,\n\nजाँच अधिकारी पीडब्लू21 ने घर का निरीक्षण किया था और कुछ मेकअप वस्तुओं को\n\nछोड़कर कोई प्रत्यक्ष सामग्री एकत्र नहीं की जा सकी थी ताकि यह संकेत दिया जा सके\n\nकि नीलम वास्तव में वहाँ रह रही थी। माना जा सकता है कि एक अन्य महिला चंदो\n\nदेवी (राम चबीला सिंह की बहन) भी घर के उसी हिस्से\n\nमें रह रही थी। उच्च\n\nन्यायालय ने इस तथ्य पर ध्यान दिया, लेकिन यह कहते हुए इसे स्पष्ट कर दिया कि\n\nचूंकि चंदों देवी एक विधवा थीं, इसलिए मेकअप की वस्तुएं उनकी नहीं हो सकती थीं\n\nक्योंकि विधवा होने के नाते उन्हें मेकअप करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। हमारी\n\nराय में, उच्च न्यायालय की टिप्पणी न केवल कानूनी रूप से असमर्थनीय है, बल्कि\n\n\f अत्यधिक आपत्तिजनक भी है। इस प्रकृति का व्यापक अवलोकन कानून की अदालत से\n\nअपेक्षित संवेदनशीलता और तटस्थता के अनुरूप नहीं है, विशेष रूप से जब यह रिकॉर्ड\n\nपर किसी भी साक्ष्य से नहीं बनाया गया है।\n\n28,\n\n जो भी हो, केवल कुछ साज-सज्जा की वस्तुओं की उपस्थिति इस तथ्य का निर्णायक\n\nप्रमाण नहीं हो सकती है कि मृतक उक्त घर में रह रहा था, विशेष रूप से जब कोई\n\nअन्य महिला वहां रह रही थी। इसके अलावा, अगर नीलम वास्तव में वहाँ रह रही थी,\n\nतो उसका अन्य सामान जैसे कपड़े आदि पाए जाने चाहिए थे। सदन में और भले ही\n\nऐसा न हो, उसी घर के अन्य निवासी उक्त तथ्य के समर्थन में गवाही देने के लिए\n\nआगे आ सकते थे।\n\n29,\n\nउल्लेखनीय है कि मृतक के शव के साथदो साड़ियां, दो ब्लाउज और दो पेटीकोट जैसे\n\nकुछ कपड़े बरामद किए गए थे। अभियोजन पक्ष का कहना है कि आरोपी व्यक्तियों ने\n\nमृतक का अपहरण करते हुए उसके घर से उक्त कपड़े ले ल्रिए थे। अभियुक्त व्यक्तियों\n\nकी ओर से उक्त आचरण के लिए बिल्कुलत्र कोई स्पष्टीकरण नहीं है। यह समझना\n\nमुश्किल है कि आरोपी व्यक्ति उसका अपहरण करते समय उसके कपड़े क्यों साथ ले\n\nजाते थे। इसके विपरीत, यह तथ्य वास्तव में अभियोजन पक्ष के मामले को यह\n\nसाबित करने में मदद करता है कि मृत व्यक्ति वास्तव में सिमल्‍्तल्‍ला में घर पर रह\n\nरहा था। ऐसा प्रतीत होता है कि मृतक के Addon में उसके पिता के घर पर\n\nवास्तविक निवास के तथ्य का समर्थन करने के लिए शव के साथ कपड़े त्रगाए गए थे।\n\nअभिलेख पर मौजूद सामग्री के आलोक में, यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि जंग\n\nबहादुर सिंह के घर पर ऐसी कोई सामग्री नहीं मिली जो सीधे संकेत दे कि मृतक वहां\n\nरह रहा था। मेकअप लेखों को पूरी तरह से अस्वीकार्य तर्क के आधार पर और बिना\n\nकिसी पुष्टि करने वाली सामग्री के मृतक के साथ जोड़ा गया था। अभियोजन पक्ष\n\n \n\fउक्त तथ्य को साबित करने के लिए एक भी साथी से पूछताछ करने में विफल रहा है।\n\nइसके अलावा, मृतक का कोई भी व्यक्तिगत सामान, जैसे कपड़े, जूते, बर्तन आदि पूरे\n\nघर में नहीं मिला। इसलिए, हम यह विश्वास करने के लिए इच्छुक नहीं हैं कि मृतक\n\n वास्तव में सिमल्‍्तल्‍्ला में घर में रह रहा था। उसी सांस में, हम यह भी नोट कर\n\nसकते हैं कि पीडब्लू 18 के लिए भी, उक्त घर में ऐसी कोई सामग्री नहीं मिली थी जो\n\nयह इंगित करे कि वह वास्तव में वहां रह रहा था। अपने स्वयं के बयान के अलावा,\n\nकोई भी गवाह यह गवाही देने के ल्रिए आगे नहीं आया है कि सूचना देने वाल्रा उक्त\n\nघर का निवासी था। अभियोजन पक्ष ने पूरे घर में कोई कमरा नहीं देखा है जिसमें\n\n पीडब्लू 18 रह रहा था और इस प्रकार, घटना स्थत्र पर उसकी अपनी उपस्थिति\n\nसंदिग्ध है।\n\n30.\n\nअपीलार्थियों ने मृत्यु के समय के संबंध में कुछ आपत्तियां भी उठाई हैं।\n\n31.08.1985\n\nको शाम लगभग 5.30 बजे किए गए पोस्टमॉर्टम के आधार पर पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के\n\nआधार पर विसंगति को चिहिनत किया गया है, जो दर्शाता है कि मृत्यु लगभग 24\n\nघंटे पहले हुई थी। यह दर्शाता है कि मृत्यु का समय 30.08.1985 को शाम लगभग\n\n5.00 बजे रहा होगा, जो कि पीडब्लू 18 के साक्ष्य के विपरीत है कि घटना\n\n30.08.1985 को रात लगभग 10.00 बजे हुई थी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट को आम तौर पर\n\nमृत्यु के कारण के बारे में रिपोर्ट में उल्लिखित तथ्यों के निर्णायक सबूत के रुप में\n\nनही माना जाता है,\n\nमृत्यु का समय आदि। इसे हमेशा रिकॉर्ड पर मौजूद अन्य प्रत्यक्ष\n\nसाक्ष्य जैसे कि चश्मदीद गवाहों के नेत्र संबंधी साक्ष्य से पुष्ट किया जा सकता है।\n\nहालांकि, जब रिपोर्ट का खंडन करने के लिए रिकॉर्ड पर कोई अन्य विश्वसनीय साक्ष्य\n\nनही होता है, तो पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बताए गए तथ्यों को आम तौर पर सच माना\n\nजाता है। वर्तमान मामल्रे में, चश्मदीद गवाहों के साक्ष्य को मृत्यु के समय के पहलू\n\n\fसहित पूरी तरह से अविश्वसनीय घोषित किया गया है। इस प्रकार, पोस्टमार्टम रिपोर्ट\n\nऔर उसमे दिए गए निष्कर्षों पर संदेह करने का कोई कारण नही है।\n\n31.\n\nइस स्तर पर, हम यह भी ध्यान दे सकते है कि उच्च न्‍यायात्रय का रुख, ए-6 एवं ए-\n\n7 के विपरीत Cees कानून के समक्ष में मुक्ति के संबंध में बिल्कुल नहीं है।\n\nविचारण\n\nन्यायालय ने उक्त अभियुकषत व्यक्तियों को स्पष्ट साक्ष्य के प्रशंसा में मुक्त किया था\n\nएवं उच्च न्यायालय केवल्न अवलोकन किया कि पीडब्लू 5 के मुक्ति असंभाव्य बयान\n\nके आधार पर एवं चूंकि पीडब्लू 5 के साक्ष्य अभिलेख से बाहर रहेंगे, ए-6 एवं ए-7 को\n\nरिहा करने का कोई कारण नहीं था। मुख्यतः उच्च न्यायालय अवैधता के निष्कर्ष या\n\nविचारण न्यायालय की विकृति पर नहीं गए।\n\nइसके अलावा, यह कि किसी\n\nस्वीकारात्मक निष्कर्ष पर शामित्र होना दो अभियुक्त व्यक्तियों के सामान्य इरादा के\n\nनेत्र मेंशेष अभियुक्त व्यक्तियों के साथ/बराबरी में पीडब्लू5 के साक्ष्य का निष्कासन\n\nकि कैसे पीडब्लू 2 एवं पीडब्लू4 उसी प्रकार से निष्कासन के लायक नही था, गलत एवं\n\nत्रुटिपूर्ण था।\n\n32.\n\nहम यह कहना नही चाहते हैं कि उच्च न्यायालय अभिलेख के साक्ष्य की प्रशंसा नही\n\nकी है, अपने अपीलार्थी के शक्ति में।\n\nहाल्रांकि, मुक्ति के निष्कर्ष को उल्रटना, एक\n\nउच्च प्रवेश को आवश्यकता थी। अपनी निर्देषिता के अनुमान में जो एक अभियुक्त के\n\nपक्ष में संचालन पूरे विचारण को विचारण न्यायात्रय के मुक्ति का निष्कर्ष मजबूत हो\n\nजाता है। इस प्रकार, ऐसे निष्कर्ष को उल्टा नहीं किया जा सकता है केवल इस\n\nसंभावना के कारण दूसरा दृष्टिकोण भी जीवित था। बल्कि विचारण अदालत द्वारा\n\nलिए गए दृष्टिकोण नहीं माना जा सकता है। उच्च नयायात्रय ने विवादित निर्णय के\n\nविषय पर सरासर अपनाई एवं ए-6 एवं ए-7 के मुक्ति के लिए पत्रट दी गई, बिना\n\n\fअवैधता या विकृति या असंभाव्यता का विचारण न्यायालय द्वारा इष्टिकोण या\n\nविचारण अदालत के साक्ष्य की अप्रशंसा।\n\n33. हम उपयोगी रूप से संजीव बनाम एच. पी.\n\nराज्य, 12 में कानून की व्याख्या का\n\nउल्लेख कर सकते हैं जिसमें इस न्यायालय ने इस संबंध में स्थिति का सारांश दिया\n\nऔर निम्नानुसार टिप्पणी कीः\n\n“7, यह अच्छी तरह से तय है किः\n\n7.1. बरी किए जाने के खिल्राफ अपील पर विचार करते समय, उन\n\nकारणों पर विचार किया जाना चाहिए जिन पर निचली अदालत ने\n\nआरोपी को बरी करने में विचार किया था, यदि अपीलीय अदालत का\n\nविचार है कि निचली अदालत द्वारा दिए गए बरी किए जाने के फैसले\n\nको पलट दिया जाना चाहिए (विजय मोहन सिह बनाम कर्नाटक राज्य,\n\nHAR अली बनाम हिमाचल्र प्रवेश राज्य)\n\n7.2.निचली अदालत द्वारा बरी किए जाने के आदेश के साथ, किसी\n\nआपराधिक मामले में निर्दोष होने का सामान्य अनुमान प्रबलित जाता है।\n\n(देखें एटली बनाम यू:\n\nपी. का राज्य)\n\n7.3. यदि अभिलेख पर साक्ष्य से दो विचार संभव हैं, तो अपीलीय\n\nन्यायालय को बरी किए जाने के खिलाफ अपील में हस्तक्षेप करने में\n\nबेहद धीमा होना चाहिए (स्रंबाशिवन FAIA FT Wea)\"\n\n34. यह देखने के बाद कि अभियोजन पक्ष का मामला अपहरण के अपराध के संबंध में\n\nस्पष्ट संदेहों से भरा है, हम संक्षेप में नोट कर सकते हैं और दोहरा सकते हैं कि हत्या\n\nका अपराध पूरी तरह से परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर निर्भर है।\n\nहात्रांकि,\n\nपोस्टमॉर्टम\n\n\fरिपोर्ट से संकेत मिलता है कि मृतक की मौत अप्राकृतिक थी और हत्या से इनकार\n\nनहीं किया जा सकता है। लेकिन अभियुक्त व्यक्तियों द्वारा हत्या किए जाने को\n\nसाबित करने के लिए रिकॉर्ड पर कोई प्रत्यक्ष सबूत नहीं है। अभियुक्त व्यक्तियों और\n\nकथित अपराध के बीच कारण का संबंध स्पष्ट रूप से गायब है। अपहरण के अपराध\n\nके आसपास के तथ्यों से निकलने वाले परिस्थितिजन्य साक्ष्य,\n\nजैसे कि चश्मदीद\n\nगवाहों की गवाही, सबूत के परीक्षण को पूरा करने में विफल रही है और इसे कानून\n\nकी नजर में साबित नहीं कहा जा सकता है। इसलिए, परिस्थितिजन्य साक्ष्य की नींव\n\nगिरने के कारण, आयोग का अनुमान त्रगाने के लिए इससे कोई निष्कर्ष नहीं निकाला\n\nजा सका, अभियुक्त व्यक्तियों द्वारा आई. पी. सी. की धारा 307 के तहत अपराध।\n\nयह एक तुच्छ कानून है कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित मामले में साक्ष्य की\n\nश्रृंखला पूरी होनी चाहिए और अपराध का एक अपरिहार्य निष्कर्ष देना चाहिए। भेजे\n\nजाने से पहले के मामले में, अभियोजन पक्ष का मामल्रा उस मानक को पूरा करने से\n\nबहुत दूर है।\n\n35.\n\nजहां तक उददेश्य का संबंध है, हम यह कहने के लिए पर्याप्त हो सकते हैं कि उद्देश्य\n\nका प्रभाव केवल तभी पड़ता है जब अभिलेख पर साक्ष्य विचाराधीन अपराधों के घटकों\n\nको साबित करने के लिए पर्याप्त हो। मूलभूत तथ्यों के प्रमाण के बिना, अभियोजन\n\nपक्ष का मामला केवल उद्देश्य की उपस्थिति पर सफल नहीं हो सकता है। इसके\n\nअलावा, वर्तमान मामले में उद्देश्य दोनों तरीकों से काम कर सकता है। अभियुक्त\n\nव्यक्ति और प्रत्यक्षदर्शी एक ही परिवार के हैं और संपत्ति से संबंधित विवाद की\n\nउपस्थिति स्पष्ट है। एक काल्पनिक अर्थ में, दोनों पक्षों को दूसरे को फंसाने से लाभ\n\nहो सकता है। ऐसी परिस्थितियों में, केवल उद्देश्य पर निर्भर रहना दोधारी तलवार हो\n\nसकती है। हम और नहीं कहते हैं।\n\n\f36.\n\nउपरोक्त विश्लेषण इंगित करता है कि अभियोजन पक्ष उचित संदेह से परे मामले को\n\nसाबित करने के लिए अपने बोझ का निर्वहन करने में विफल रहा है। ऊपर बताए गए\n\nउचित संदेह अपरिवर्तनीय हैं और अभियोजन पक्ष के मामले की नींव पर प्रहार करते\n\nहैं। इस प्रकार, अपीलार्थी सभी आरोपों से बरी होने के लिए उत्तरदायी हैं।\n\n37.\n\nपूर्वगामी चचा के आलोक में, हम एतददवारा यह निष्कर्ष निकालते हैं कि विचारण\n\nन्यायालय और उच्च न्यायात्रय द्वारा दोषी ठहराए जाने के निष्कर्ष टिकाऊ नहींहैं।\n\nइसके अलावा, उच्च नन्‍्यायात्रय ने ए-6 और ए-7 को बरी करने के फैसले को उलटने में\n\nगलती की। तदनुसार, आक्षेपित निर्णय के साथ-साथ विचारण न्यायात्रय द्वारा दिए\n\nगए निर्णय (ए-1 से ए-5 की दोषसिद्धि की सीमा तक) को दरकिनार कर दिया जाता\n\nहै, और सभी सात अभियुक्त व्यक्तियों (अपीलकर्ताओं) को एतद्दवारा उन पर लगाए\n\nगए सभी आरोपों से बरी कर दिया जाता है। अपीलार्थियों को निर्देश दिया जाता है कि\n\nयदि वे हिरासत में हैं तो उन्हें तुरंत रिहा कर दिया जाए।\n\n38.\n\nइस फैसले के संदर्भ में शीर्षक वाली अपीलों का निपटारा किया जाता है। अंतरिम\n\nआवेदन, यदि कोई हों, का भी निपटारा कर दिया जाएगा। कोई लागत नहीं। मामले का\n\nपरिणामःअपीलों का निपटारा किया गया।\n\nहेडनोट तैयार किए गए: निधि जैन\n\n\f"}