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ab-khushii-hai-na-koii-dard-rulaane-vaalaa-nida-fazli-ghazals |
अब ख़ुशी है न कोई दर्द रुलाने वाला
हम ने अपना लिया हर रंग ज़माने वाला
एक बे-चेहरा सी उम्मीद है चेहरा चेहरा
जिस तरफ़ देखिए आने को है आने वाला
उस को रुख़्सत तो किया था मुझे मा'लूम न था
सारा घर ले गया घर छोड़ के जाने वाला
दूर के चाँद को ढूँडो न किसी आँचल में
ये उजाला नहीं आँगन में समाने वाला
इक मुसाफ़िर के सफ़र ज... |
insaan-hain-haivaan-yahaan-bhii-hai-vahaan-bhii-nida-fazli-ghazals |
इंसान में हैवान यहाँ भी है वहाँ भी
अल्लाह निगहबान यहाँ भी है वहाँ भी
ख़ूँ-ख़्वार दरिंदों के फ़क़त नाम अलग हैं
हर शहर बयाबान यहाँ भी है वहाँ भी
हिन्दू भी सुकूँ से है मुसलमाँ भी सुकूँ से
इंसान परेशान यहाँ भी है वहाँ भी
रहमान की रहमत हो कि भगवान की मूरत
हर खेल का मैदान यहाँ भी है वहाँ भी
उठता है दिल-ओ-जाँ से धुआँ... |
us-ke-dushman-hain-bahut-aadmii-achchhaa-hogaa-nida-fazli-ghazals |
उस के दुश्मन हैं बहुत आदमी अच्छा होगा
वो भी मेरी ही तरह शहर में तन्हा होगा
इतना सच बोल कि होंटों का तबस्सुम न बुझे
रौशनी ख़त्म न कर आगे अँधेरा होगा
प्यास जिस नहर से टकराई वो बंजर निकली
जिस को पीछे कहीं छोड़ आए वो दरिया होगा
मिरे बारे में कोई राय तो होगी उस की
उस ने मुझ को भी कभी तोड़ के देखा होगा
एक महफ़िल में... |
har-ek-baat-ko-chup-chaap-kyuun-sunaa-jaae-nida-fazli-ghazals |
हर एक बात को चुप-चाप क्यूँ सुना जाए
कभी तो हौसला कर के नहीं कहा जाए
तुम्हारा घर भी इसी शहर के हिसार में है
लगी है आग कहाँ क्यूँ पता किया जाए
जुदा है हीर से राँझा कई ज़मानों से
नए सिरे से कहानी को फिर लिखा जाए
कहा गया है सितारों को छूना मुश्किल है
ये कितना सच है कभी तजरबा किया जाए
किताबें यूँ तो बहुत सी हैं मेर... |
tanhaa-tanhaa-dukh-jhelenge-mahfil-mahfil-gaaenge-nida-fazli-ghazals |
तन्हा तन्हा दुख झेलेंगे महफ़िल महफ़िल गाएँगे
जब तक आँसू पास रहेंगे तब तक गीत सुनाएँगे
तुम जो सोचो वो तुम जानो हम तो अपनी कहते हैं
देर न करना घर आने में वर्ना घर खो जाएँगे
बच्चों के छोटे हाथों को चाँद सितारे छूने दो
चार किताबें पढ़ कर ये भी हम जैसे हो जाएँगे
अच्छी सूरत वाले सारे पत्थर-दिल हों मुमकिन है
हम तो उस ... |
mohabbat-men-vafaadaarii-se-bachiye-nida-fazli-ghazals |
मोहब्बत में वफ़ादारी से बचिए
जहाँ तक हो अदाकारी से बचिए
हर इक सूरत भली लगती है कुछ दिन
लहू की शो'बदा-कारी से बचिए
शराफ़त आदमियत दर्द-मंदी
बड़े शहरों में बीमारी से बचिए
ज़रूरी क्या हर इक महफ़िल में बैठें
तकल्लुफ़ की रवा-दारी से बचिए
बिना पैरों के सर चलते नहीं हैं
बुज़ुर्गों की समझदारी से बचिए |
har-ek-ghar-men-diyaa-bhii-jale-anaaj-bhii-ho-nida-fazli-ghazals |
हर एक घर में दिया भी जले अनाज भी हो
अगर न हो कहीं ऐसा तो एहतिजाज भी हो
रहेगी वा'दों में कब तक असीर ख़ुश-हाली
हर एक बार ही कल क्यूँ कभी तो आज भी हो
न करते शोर-शराबा तो और क्या करते
तुम्हारे शहर में कुछ और काम-काज भी हो
हुकूमतों को बदलना तो कुछ मुहाल नहीं
हुकूमतें जो बदलता है वो समाज भी हो
बदल रहे हैं कई आदमी दर... |
man-bai-raagii-tan-anuuraagii-qadam-qadam-dushvaarii-hai-nida-fazli-ghazals |
मन बै-रागी तन अनूरागी क़दम क़दम दुश्वारी है
जीवन जीना सहल न जानो बहुत बड़ी फ़नकारी है
औरों जैसे हो कर भी हम बा-इज़्ज़त हैं बस्ती में
कुछ लोगों का सीधा-पन है कुछ अपनी अय्यारी है
जब जब मौसम झूमा हम ने कपड़े फाड़े शोर किया
हर मौसम शाइस्ता रहना कोरी दुनिया-दारी है
ऐब नहीं है इस में कोई लाल-परी न फूल-कली
ये मत पूछो ... |
har-taraf-har-jagah-be-shumaar-aadmii-nida-fazli-ghazals |
हर तरफ़ हर जगह बे-शुमार आदमी
फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी
सुब्ह से शाम तक बोझ ढोता हुआ
अपनी ही लाश का ख़ुद मज़ार आदमी
हर तरफ़ भागते दौड़ते रास्ते
हर तरफ़ आदमी का शिकार आदमी
रोज़ जीता हुआ रोज़ मरता हुआ
हर नए दिन नया इंतिज़ार आदमी
घर की दहलीज़ से गेहूँ के खेत तक
चलता फिरता कोई कारोबार आदमी
ज़िंदगी का मुक़द्द... |
munh-kii-baat-sune-har-koii-dil-ke-dard-ko-jaane-kaun-nida-fazli-ghazals |
मुँह की बात सुने हर कोई दिल के दर्द को जाने कौन
आवाज़ों के बाज़ारों में ख़ामोशी पहचाने कौन
सदियों सदियों वही तमाशा रस्ता रस्ता लम्बी खोज
लेकिन जब हम मिल जाते हैं खो जाता है जाने कौन
वो मेरी परछाईं है या मैं उस का आईना हूँ
मेरे ही घर में रहता है मुझ जैसा ही जाने कौन
जाने क्या क्या बोल रहा था सरहद प्यार किताबें ख़... |
har-ghadii-khud-se-ulajhnaa-hai-muqaddar-meraa-nida-fazli-ghazals |
हर घड़ी ख़ुद से उलझना है मुक़द्दर मेरा
मैं ही कश्ती हूँ मुझी में है समुंदर मेरा
किस से पूछूँ कि कहाँ गुम हूँ कई बरसों से
हर जगह ढूँढता फिरता है मुझे घर मेरा
एक से हो गए मौसमों के चेहरे सारे
मेरी आँखों से कहीं खो गया मंज़र मेरा
मुद्दतें बीत गईं ख़्वाब सुहाना देखे
जागता रहता है हर नींद में बिस्तर मेरा
आइना देख क... |
dhuup-men-niklo-ghataaon-men-nahaa-kar-dekho-nida-fazli-ghazals |
धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो
ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो
सिर्फ़ आँखों से ही दुनिया नहीं देखी जाती
दिल की धड़कन को भी बीनाई बना कर देखो
पत्थरों में भी ज़बाँ होती है दिल होते हैं
अपने घर के दर-ओ-दीवार सजा कर देखो
वो सितारा है चमकने दो यूँही आँखों में
क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बना कर देखो
फ़ासला ... |
besan-kii-saundhii-rotii-par-khattii-chatnii-jaisii-maan-nida-fazli-ghazals |
बेसन की सौंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी माँ
याद आती है! चौका बासन चिमटा फुकनी जैसी माँ
बाँस की खर्री खाट के ऊपर हर आहट पर कान धरे
आधी सोई आधी जागी थकी दो-पहरी जैसी माँ
चिड़ियों की चहकार में गूँजे राधा मोहन अली अली
मुर्ग़े की आवाज़ से बजती घर की कुंडी जैसी माँ
बीवी बेटी बहन पड़ोसन थोड़ी थोड़ी सी सब में
दिन भर इक र... |
duniyaa-jise-kahte-hain-jaaduu-kaa-khilaunaa-hai-nida-fazli-ghazals |
दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है
मिल जाए तो मिट्टी है खो जाए तो सोना है
अच्छा सा कोई मौसम तन्हा सा कोई आलम
हर वक़्त का रोना तो बे-कार का रोना है
बरसात का बादल तो दीवाना है क्या जाने
किस राह से बचना है किस छत को भिगोना है
ये वक़्त जो तेरा है ये वक़्त जो मेरा है
हर गाम पे पहरा है फिर भी इसे खोना है
ग़म हो ... |
us-ko-kho-dene-kaa-ehsaas-to-kam-baaqii-hai-nida-fazli-ghazals |
उस को खो देने का एहसास तो कम बाक़ी है
जो हुआ वो न हुआ होता ये ग़म बाक़ी है
अब न वो छत है न वो ज़ीना न अंगूर की बेल
सिर्फ़ इक उस को भुलाने की क़सम बाक़ी है
मैं ने पूछा था सबब पेड़ के गिर जाने का
उठ के माली ने कहा उस की क़लम बाक़ी है
जंग के फ़ैसले मैदाँ में कहाँ होते हैं
जब तलक हाफ़िज़े बाक़ी हैं अलम बाक़ी है
थक... |
jab-se-qariib-ho-ke-chale-zindagii-se-ham-nida-fazli-ghazals |
जब से क़रीब हो के चले ज़िंदगी से हम
ख़ुद अपने आइने को लगे अजनबी से हम
कुछ दूर चल के रास्ते सब एक से लगे
मिलने गए किसी से मिल आए किसी से हम
अच्छे बुरे के फ़र्क़ ने बस्ती उजाड़ दी
मजबूर हो के मिलने लगे हर किसी से हम
शाइस्ता महफ़िलों की फ़ज़ाओं में ज़हर था
ज़िंदा बचे हैं ज़ेहन की आवारगी से हम
अच्छी भली थी दुनिया ... |
kabhii-kisii-ko-mukammal-jahaan-nahiin-miltaa-nida-fazli-ghazals |
कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
कहीं ज़मीन कहीं आसमाँ नहीं मिलता
तमाम शहर में ऐसा नहीं ख़ुलूस न हो
जहाँ उमीद हो इस की वहाँ नहीं मिलता
कहाँ चराग़ जलाएँ कहाँ गुलाब रखें
छतें तो मिलती हैं लेकिन मकाँ नहीं मिलता
ये क्या अज़ाब है सब अपने आप में गुम हैं
ज़बाँ मिली है मगर हम-ज़बाँ नहीं मिलता
चराग़ जलते ही बीनाई बु... |
ghar-se-nikle-to-ho-sochaa-bhii-kidhar-jaaoge-nida-fazli-ghazals |
घर से निकले तो हो सोचा भी किधर जाओगे
हर तरफ़ तेज़ हवाएँ हैं बिखर जाओगे
इतना आसाँ नहीं लफ़्ज़ों पे भरोसा करना
घर की दहलीज़ पुकारेगी जिधर जाओगे
शाम होते ही सिमट जाएँगे सारे रस्ते
बहते दरिया से जहाँ होगे ठहर जाओगे
हर नए शहर में कुछ रातें कड़ी होती हैं
छत से दीवारें जुदा होंगी तो डर जाओगे
पहले हर चीज़ नज़र आएगी बे... |
kath-putlii-hai-yaa-jiivan-hai-jiite-jaao-socho-mat-nida-fazli-ghazals |
कठ-पुतली है या जीवन है जीते जाओ सोचो मत
सोच से ही सारी उलझन है जीते जाओ सोचो मत
लिखा हुआ किरदार कहानी में ही चलता फिरता है
कभी है दूरी कभी मिलन है जीते जाओ सोचो मत
नाच सको तो नाचो जब थक जाओ तो आराम करो
टेढ़ा क्यूँ घर का आँगन है जीते जाओ सोचो मत
हर मज़हब का एक ही कहना जैसा मालिक रक्खे रहना
जब तक साँसों का बंधन ह... |
safar-men-dhuup-to-hogii-jo-chal-sako-to-chalo-nida-fazli-ghazals |
सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो
किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं
तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो
यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता
मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो
कहीं नहीं कोई सूरज धुआँ धुआँ है फ़ज़ा
ख़ुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो
यही है ज़िंदग... |
kuchh-tabiiat-hii-milii-thii-aisii-chain-se-jiine-kii-suurat-na-huii-nida-fazli-ghazals |
कुछ तबीअ'त ही मिली थी ऐसी चैन से जीने की सूरत न हुई
जिस को चाहा उसे अपना न सके जो मिला उस से मोहब्बत न हुई
जिस से जब तक मिले दिल ही से मिले दिल जो बदला तो फ़साना बदला
रस्म-ए-दुनिया को निभाने के लिए हम से रिश्तों की तिजारत न हुई
दूर से था वो कई चेहरों में पास से कोई भी वैसा न लगा
बेवफ़ाई भी उसी का था चलन फिर किसी ... |
girjaa-men-mandiron-men-azaanon-men-bat-gayaa-nida-fazli-ghazals |
गिरजा में मंदिरों में अज़ानों में बट गया
होते ही सुब्ह आदमी ख़ानों में बट गया
इक इश्क़ नाम का जो परिंदा ख़ला में था
उतरा जो शहर में तो दुकानों में बट गया
पहले तलाशा खेत फिर दरिया की खोज की
बाक़ी का वक़्त गेहूँ के दानों में बट गया
जब तक था आसमान में सूरज सभी का था
फिर यूँ हुआ वो चंद मकानों में बट गया
हैं ताक मे... |
dil-men-na-ho-jurat-to-mohabbat-nahiin-miltii-nida-fazli-ghazals |
दिल में न हो जुरअत तो मोहब्बत नहीं मिलती
ख़ैरात में इतनी बड़ी दौलत नहीं मिलती
कुछ लोग यूँही शहर में हम से भी ख़फ़ा हैं
हर एक से अपनी भी तबीअ'त नहीं मिलती
देखा है जिसे मैं ने कोई और था शायद
वो कौन था जिस से तिरी सूरत नहीं मिलती
हँसते हुए चेहरों से है बाज़ार की ज़ीनत
रोने की यहाँ वैसे भी फ़ुर्सत नहीं मिलती
निकला... |
aanii-jaanii-har-mohabbat-hai-chalo-yuun-hii-sahii-nida-fazli-ghazals |
आनी जानी हर मोहब्बत है चलो यूँ ही सही
जब तलक है ख़ूबसूरत है चलो यूँ ही सही
हम कहाँ के देवता हैं बेवफ़ा वो हैं तो क्या
घर में कोई घर की ज़ीनत है चलो यूँ ही सही
वो नहीं तो कोई तो होगा कहीं उस की तरह
जिस्म में जब तक हरारत है चलो यूँ ही सही
मैले हो जाते हैं रिश्ते भी लिबासों की तरह
दोस्ती हर दिन की मेहनत है चलो यूँ... |
na-jaane-kaun-saa-manzar-nazar-men-rahtaa-hai-nida-fazli-ghazals |
न जाने कौन सा मंज़र नज़र में रहता है
तमाम उम्र मुसाफ़िर सफ़र में रहता है
लड़ाई देखे हुए दुश्मनों से मुमकिन है
मगर वो ख़ौफ़ जो दीवार-ओ-दर में रहता है
ख़ुदा तो मालिक-ओ-मुख़्तार है कहीं भी रहे
कभी बशर में कभी जानवर में रहता है
अजीब दौर है ये तय-शुदा नहीं कुछ भी
न चाँद शब में न सूरज सहर में रहता है
जो मिलना चाहो त... |
koii-hinduu-koii-muslim-koii-iisaaii-hai-nida-fazli-ghazals |
कोई हिन्दू कोई मुस्लिम कोई ईसाई है
सब ने इंसान न बनने की क़सम खाई है
इतनी ख़ूँ-ख़ार न थीं पहले इबादत-गाहें
ये अक़ीदे हैं कि इंसान की तन्हाई है
तीन चौथाई से ज़ाइद हैं जो आबादी में
उन के ही वास्ते हर भूक है महँगाई है
देखे कब तलक बाक़ी रहे सज-धज उस की
आज जिस चेहरा से तस्वीर उतरवाई है
अब नज़र आता नहीं कुछ भी दुकान... |
apnaa-gam-le-ke-kahiin-aur-na-jaayaa-jaae-nida-fazli-ghazals |
अपना ग़म ले के कहीं और न जाया जाए
घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाए
जिन चराग़ों को हवाओं का कोई ख़ौफ़ नहीं
उन चराग़ों को हवाओं से बचाया जाए
ख़ुद-कुशी करने की हिम्मत नहीं होती सब में
और कुछ दिन अभी औरों को सताया जाए
बाग़ में जाने के आदाब हुआ करते हैं
किसी तितली को न फूलों से उड़ाया जाए
क्या हुआ शहर को कुछ भी... |
aaegaa-koii-chal-ke-khizaan-se-bahaar-men-nida-fazli-ghazals |
आएगा कोई चल के ख़िज़ाँ से बहार में
सदियाँ गुज़र गई हैं इसी इंतिज़ार में
छिड़ते ही साज़-ए-बज़्म में कोई न था कहीं
वो कौन था जो बोल रहा था सितार में
ये और बात है कोई महके कोई चुभे
गुलशन तो जितना गुल में है उतना है ख़ार में
अपनी तरह से दुनिया बदलने के वास्ते
मेरा ही एक घर है मिरे इख़्तियार में
तिश्ना-लबी ने रेत क... |
ye-kaisii-kashmakash-hai-zindagii-men-nida-fazli-ghazals |
ये कैसी कश्मकश है ज़िंदगी में
किसी को ढूँडते हैं हम किसी में
जो खो जाता है मिल कर ज़िंदगी में
ग़ज़ल है नाम उस का शाएरी में
निकल आते हैं आँसू हँसते हँसते
ये किस ग़म की कसक है हर ख़ुशी में
कहीं चेहरा कहीं आँखें कहीं लब
हमेशा एक मिलता है कई में
चमकती है अंधेरों में ख़मोशी
सितारे टूटते हैं रात ही में
सुलगती रेत ... |
ek-hii-dhartii-ham-sab-kaa-ghar-jitnaa-teraa-utnaa-meraa-nida-fazli-ghazals |
एक ही धरती हम सब का घर जितना तेरा उतना मेरा
दुख सुख का ये जंतर-मंतर जितना तेरा उतना मेरा
गेहूँ चावल बाँटने वाले झूटा तौलें तो क्या बोलें
यूँ तो सब कुछ अंदर बाहर जितना तेरा उतना मेरा
हर जीवन की वही विरासत आँसू सपना चाहत मेहनत
साँसों का हर बोझ बराबर जितना तेरा उतना मेरा
साँसें जितनी मौजें उतनी सब की अपनी अपनी गिनत... |
din-saliiqe-se-ugaa-raat-thikaane-se-rahii-nida-fazli-ghazals |
दिन सलीक़े से उगा रात ठिकाने से रही
दोस्ती अपनी भी कुछ रोज़ ज़माने से रही
चंद लम्हों को ही बनती हैं मुसव्विर आँखें
ज़िंदगी रोज़ तो तस्वीर बनाने से रही
इस अँधेरे में तो ठोकर ही उजाला देगी
रात जंगल में कोई शम्अ जलाने से रही
फ़ासला चाँद बना देता है हर पत्थर को
दूर की रौशनी नज़दीक तो आने से रही
शहर में सब को कहाँ ... |
dariyaa-ho-yaa-pahaad-ho-takraanaa-chaahiye-nida-fazli-ghazals |
दरिया हो या पहाड़ हो टकराना चाहिए
जब तक न साँस टूटे जिए जाना चाहिए
यूँ तो क़दम क़दम पे है दीवार सामने
कोई न हो तो ख़ुद से उलझ जाना चाहिए
झुकती हुई नज़र हो कि सिमटा हुआ बदन
हर रस-भरी घटा को बरस जाना चाहिए
चौराहे बाग़ बिल्डिंगें सब शहर तो नहीं
कुछ ऐसे वैसे लोगों से याराना चाहिए
अपनी तलाश अपनी नज़र अपना तजरबा
रस... |
gar-khaamushii-se-faaeda-ikhfaa-e-haal-hai-mirza-ghalib-ghazals |
गर ख़ामुशी से फ़ाएदा इख़्फ़ा-ए-हाल है
ख़ुश हूँ कि मेरी बात समझनी मुहाल है
किस को सुनाऊँ हसरत-ए-इज़हार का गिला
दिल फ़र्द-ए-जमा-ओ-ख़र्च ज़बाँ-हा-ए-लाल है
किस पर्दे में है आइना-पर्दाज़ ऐ ख़ुदा
रहमत कि उज़्र-ख़्वाह-ए-लब-ए-बे-सवाल है
है है ख़ुदा-न-ख़्वास्ता वो और दुश्मनी
ऐ शौक़-ए-मुन्फ़इल ये तुझे क्या ख़याल है
मुश्... |
shabnam-ba-gul-e-laala-na-khaalii-z-adaa-hai-mirza-ghalib-ghazals |
शबनम ब-गुल-ए-लाला न ख़ाली ज़-अदा है
दाग़-ए-दिल-ए-बेदर्द नज़र-गाह-ए-हया है
दिल ख़ूँ-शुदा-ए-कशमकश-ए-हसरत-ए-दीदार
आईना ब-दस्त-ए-बुत-ए-बद-मस्त हिना है
शोले से न होती हवस-ए-शोला ने जो की
जी किस क़दर अफ़्सुर्दगी-ए-दिल पे जला है
तिमसाल में तेरी है वो शोख़ी कि ब-सद-ज़ौक़
आईना ब-अंदाज़-ए-गुल आग़ोश-कुशा है
क़ुमरी कफ़-ए-... |
jis-bazm-men-tuu-naaz-se-guftaar-men-aave-mirza-ghalib-ghazals |
जिस बज़्म में तू नाज़ से गुफ़्तार में आवे
जाँ कालबद-ए-सूरत-ए-दीवार में आवे
साए की तरह साथ फिरें सर्व ओ सनोबर
तू इस क़द-ए-दिलकश से जो गुलज़ार में आवे
तब नाज़-ए-गिराँ माइगी-ए-अश्क बजा है
जब लख़्त-ए-जिगर दीदा-ए-ख़ूँ-बार में आवे
दे मुझ को शिकायत की इजाज़त कि सितमगर
कुछ तुझ को मज़ा भी मिरे आज़ार में आवे
उस चश्म-ए-फ... |
kal-ke-liye-kar-aaj-na-khissat-sharaab-men-mirza-ghalib-ghazals |
कल के लिए कर आज न ख़िस्सत शराब में
ये सू-ए-ज़न है साक़ी-ए-कौसर के बाब में
हैं आज क्यूँ ज़लील कि कल तक न थी पसंद
गुस्ताख़ी-ए-फ़रिश्ता हमारी जनाब में
जाँ क्यूँ निकलने लगती है तन से दम-ए-समा
गर वो सदा समाई है चंग ओ रबाब में
रौ में है रख़्श-ए-उम्र कहाँ देखिए थमे
ने हाथ बाग पर है न पा है रिकाब में
उतना ही मुझ को अप... |
hairaan-huun-dil-ko-rouun-ki-piituun-jigar-ko-main-mirza-ghalib-ghazals |
हैराँ हूँ दिल को रोऊँ कि पीटूँ जिगर को मैं
मक़्दूर हो तो साथ रखूँ नौहागर को मैं
छोड़ा न रश्क ने कि तिरे घर का नाम लूँ
हर इक से पूछता हूँ कि जाऊँ किधर को मैं
जाना पड़ा रक़ीब के दर पर हज़ार बार
ऐ काश जानता न तिरे रह-गुज़र को मैं
है क्या जो कस के बाँधिए मेरी बला डरे
क्या जानता नहीं हूँ तुम्हारी कमर को मैं
लो वो भ... |
masjid-ke-zer-e-saaya-kharaabaat-chaahiye-mirza-ghalib-ghazals |
मस्जिद के ज़ेर-ए-साया ख़राबात चाहिए
भौं पास आँख क़िबला-ए-हाजात चाहिए
आशिक़ हुए हैं आप भी एक और शख़्स पर
आख़िर सितम की कुछ तो मुकाफ़ात चाहिए
दे दाद ऐ फ़लक दिल-ए-हसरत-परस्त की
हाँ कुछ न कुछ तलाफ़ी-ए-माफ़ात चाहिए
सीखे हैं मह-रुख़ों के लिए हम मुसव्वरी
तक़रीब कुछ तो बहर-ए-मुलाक़ात चाहिए
मय से ग़रज़ नशात है किस रू-स... |
jahaan-teraa-naqsh-e-qadam-dekhte-hain-mirza-ghalib-ghazals |
जहाँ तेरा नक़्श-ए-क़दम देखते हैं
ख़याबाँ ख़याबाँ इरम देखते हैं
दिल-आशुफ़्तगाँ ख़ाल-ए-कुंज-ए-दहन के
सुवैदा में सैर-ए-अदम देखते हैं
तिरे सर्व-क़ामत से इक क़द्द-ए-आदम
क़यामत के फ़ित्ने को कम देखते हैं
तमाशा कि ऐ महव-ए-आईना-दारी
तुझे किस तमन्ना से हम देखते हैं
सुराग़-ए-तफ़-ए-नाला ले दाग़-ए-दिल से
कि शब-रौ का नक़्... |
donon-jahaan-de-ke-vo-samjhe-ye-khush-rahaa-mirza-ghalib-ghazals |
दोनों जहान दे के वो समझे ये ख़ुश रहा
याँ आ पड़ी ये शर्म कि तकरार क्या करें
थक थक के हर मक़ाम पे दो चार रह गए
तेरा पता न पाएँ तो नाचार क्या करें
क्या शम्अ' के नहीं हैं हवा-ख़्वाह बज़्म में
हो ग़म ही जाँ-गुदाज़ तो ग़म-ख़्वार क्या करें |
dar-khur-e-qahr-o-gazab-jab-koii-ham-saa-na-huaa-mirza-ghalib-ghazals |
दर-ख़ुर-ए-क़हर-ओ-ग़ज़ब जब कोई हम सा न हुआ
फिर ग़लत क्या है कि हम सा कोई पैदा न हुआ
बंदगी में भी वो आज़ादा ओ ख़ुद-बीं हैं कि हम
उल्टे फिर आए दर-ए-का'बा अगर वा न हुआ
सब को मक़्बूल है दा'वा तिरी यकताई का
रू-ब-रू कोई बुत-ए-आइना-सीमा न हुआ
कम नहीं नाज़िश-ए-हमनामी-ए-चश्म-ए-ख़ूबाँ
तेरा बीमार बुरा क्या है गर अच्छा न हु... |
phir-is-andaaz-se-bahaar-aaii-mirza-ghalib-ghazals |
फिर इस अंदाज़ से बहार आई
कि हुए मेहर-ओ-मह तमाशाई
देखो ऐ साकिनान-ए-ख़ित्ता-ए-ख़ाक
इस को कहते हैं आलम-आराई
कि ज़मीं हो गई है सर-ता-सर
रू-कश-ए-सतह-ए-चर्ख़-ए-मीनाई
सब्ज़ा को जब कहीं जगह न मिली
बन गया रू-ए-आब पर काई
सब्ज़ा ओ गुल के देखने के लिए
चश्म-ए-नर्गिस को दी है बीनाई
है हवा में शराब की तासीर
बादा-नोशी है ब... |
vaan-pahunch-kar-jo-gash-aataa-pae-ham-hai-ham-ko-mirza-ghalib-ghazals |
वाँ पहुँच कर जो ग़श आता पए-हम है हम को
सद-रह आहंग-ए-ज़मीं बोस-ए-क़दम है हम को
दिल को मैं और मुझे दिल महव-ए-वफ़ा रखता है
किस क़दर ज़ौक़-ए-गिरफ़्तारी-ए-हम है हम को
ज़ोफ़ से नक़्श-ए-प-ए-मोर है तौक़-ए-गर्दन
तिरे कूचे से कहाँ ताक़त-ए-रम है हम को
जान कर कीजे तग़ाफ़ुल कि कुछ उम्मीद भी हो
ये निगाह-ए-ग़लत-अंदाज़ तो सम ह... |
rahm-kar-zaalim-ki-kyaa-buud-e-charaag-e-kushta-hai-mirza-ghalib-ghazals |
रहम कर ज़ालिम कि क्या बूद-ए-चराग़-ए-कुश्ता है
नब्ज़-ए-बीमार-ए-वफ़ा दूद-ए-चराग़-ए-कुश्ता है
दिल-लगी की आरज़ू बेचैन रखती है हमें
वर्ना याँ बे-रौनक़ी सूद-ए-चराग़-ए-कुश्ता है
नश्शा-ए-मय बे-चमन दूद-ए-चराग़-ए-कुश्ता है
जाम दाग़-ए-अंदूद-ए-चराग़-ए-कुश्ता है
दाग़-ए-रब्त-ए-हम हैं अहल-ए-बाग़ गर गुल हो शहीद
लाला चश्म-ए-हसर... |
gaii-vo-baat-ki-ho-guftuguu-to-kyuunkar-ho-mirza-ghalib-ghazals |
गई वो बात कि हो गुफ़्तुगू तो क्यूँकर हो
कहे से कुछ न हुआ फिर कहो तो क्यूँकर हो
हमारे ज़ेहन में उस फ़िक्र का है नाम विसाल
कि गर न हो तो कहाँ जाएँ हो तो क्यूँकर हो
अदब है और यही कश्मकश तो क्या कीजे
हया है और यही गू-मगू तो क्यूँकर हो
तुम्हीं कहो कि गुज़ारा सनम-परस्तों का
बुतों की हो अगर ऐसी ही ख़ू तो क्यूँकर हो
उ... |
har-qadam-duurii-e-manzil-hai-numaayaan-mujh-se-mirza-ghalib-ghazals |
हर क़दम दूरी-ए-मंज़िल है नुमायाँ मुझ से
मेरी रफ़्तार से भागे है बयाबाँ मुझ से
दर्स-ए-उनवान-ए-तमाशा ब-तग़ाफ़ुल ख़ुश-तर
है निगह रिश्ता-ए-शीराज़ा-ए-मिज़्गाँ मुझ से
वहशत-ए-आतिश-ए-दिल से शब-ए-तन्हाई में
सूरत-ए-दूद रहा साया गुरेज़ाँ मुझ से
ग़म-ए-उश्शाक़ न हो सादगी-आमोज़-ए-बुताँ
किस क़दर ख़ाना-ए-आईना है वीराँ मुझ से
... |
dil-e-naadaan-tujhe-huaa-kyaa-hai-mirza-ghalib-ghazals |
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है
हम हैं मुश्ताक़ और वो बे-ज़ार
या इलाही ये माजरा क्या है
मैं भी मुँह में ज़बान रखता हूँ
काश पूछो कि मुद्दआ' क्या है
जब कि तुझ बिन नहीं कोई मौजूद
फिर ये हंगामा ऐ ख़ुदा क्या है
ये परी-चेहरा लोग कैसे हैं
ग़म्ज़ा ओ इश्वा ओ अदा क्या है
शिकन-ए-ज़ुल्फ़-ए-अंबर... |
raundii-huii-hai-kaukaba-e-shahryaar-kii-mirza-ghalib-ghazals |
रौंदी हुई है कौकबा-ए-शहरयार की
इतराए क्यूँ न ख़ाक सर-ए-रहगुज़ार की
जब उस के देखने के लिए आएँ बादशाह
लोगों में क्यूँ नुमूद न हो लाला-ज़ार की
भूके नहीं हैं सैर-ए-गुलिस्ताँ के हम वले
क्यूँकर न खाइए कि हवा है बहार की |
hariif-e-matlab-e-mushkil-nahiin-fusuun-e-niyaaz-mirza-ghalib-ghazals |
हरीफ़-ए-मतलब-ए-मुश्किल नहीं फ़ुसून-ए-नियाज़
दुआ क़ुबूल हो या रब कि उम्र-ए-ख़िज़्र दराज़
न हो ब-हर्ज़ा बयाबाँ-नवर्द-ए-वहम-ए-वजूद
हनूज़ तेरे तसव्वुर में है नशेब-ओ-फ़राज़
विसाल जल्वा तमाशा है पर दिमाग़ कहाँ
कि दीजे आइना-ए-इन्तिज़ार को पर्दाज़
हर एक ज़र्रा-ए-आशिक़ है आफ़ताब-परस्त
गई न ख़ाक हुए पर हवा-ए-जल्वा-ए-नाज़... |
ghar-hamaaraa-jo-na-rote-bhii-to-viiraan-hotaa-mirza-ghalib-ghazals |
घर हमारा जो न रोते भी तो वीराँ होता
बहर गर बहर न होता तो बयाबाँ होता
तंगी-ए-दिल का गिला क्या ये वो काफ़िर-दिल है
कि अगर तंग न होता तो परेशाँ होता
बाद यक-उम्र-ए-वरा' बार तो देता बारे
काश रिज़वाँ ही दर-ए-यार का दरबाँ होता |
zamaana-sakht-kam-aazaar-hai-ba-jaan-e-asad-mirza-ghalib-ghazals |
ज़माना सख़्त कम-आज़ार है ब-जान-ए-असद
वगर्ना हम तो तवक़्क़ो ज़ियादा रखते हैं
तन-ए-ब-बंद-ए-हवस दर नदादा रखते हैं
दिल-ए-ज़-कार-ए-जहाँ ऊफ़्तादा रखते हैं
तमीज़-ए-ज़िश्ती-ओ-नेकी में लाख बातें हैं
ब-अक्स-ए-आइना यक-फ़र्द-ए-सादा रखते हैं
ब-रंग-ए-साया हमें बंदगी में है तस्लीम
कि दाग़-ए-दिल ब-जाबीन-ए-कुशादा रखते हैं
ब-ज़... |
hai-vasl-hijr-aalam-e-tamkiin-o-zabt-men-mirza-ghalib-ghazals |
है वस्ल हिज्र आलम-ए-तमकीन-ओ-ज़ब्त में
माशूक़-ए-शोख़ ओ आशिक़-ए-दीवाना चाहिए
उस लब से मिल ही जाएगा बोसा कभी तो हाँ
शौक़-ए-फ़ुज़ूल ओ जुरअत-ए-रिंदाना चाहिए
आशिक़ नाक़ाब-ए-जल्वा-ए-जानाना चाहिए
फ़ानूस-ए-शम्अ' को पर-ए-परवाना चाहिए |
us-bazm-men-mujhe-nahiin-bantii-hayaa-kiye-mirza-ghalib-ghazals |
उस बज़्म में मुझे नहीं बनती हया किए
बैठा रहा अगरचे इशारे हुआ किए
दिल ही तो है सियासत-ए-दरबाँ से डर गया
मैं और जाऊँ दर से तिरे बिन सदा किए
रखता फिरूँ हूँ ख़िर्क़ा ओ सज्जादा रहन-ए-मय
मुद्दत हुई है दावत आब-ओ-हवा किए
बे-सर्फ़ा ही गुज़रती है हो गरचे उम्र-ए-ख़िज़्र
हज़रत भी कल कहेंगे कि हम क्या किया किए
मक़्दूर हो त... |
chaahiye-achchhon-ko-jitnaa-chaahiye-mirza-ghalib-ghazals |
चाहिए अच्छों को जितना चाहिए
ये अगर चाहें तो फिर क्या चाहिए
सोहबत-ए-रिंदाँ से वाजिब है हज़र
जा-ए-मय अपने को खींचा चाहिए
चाहने को तेरे क्या समझा था दिल
बारे अब इस से भी समझा चाहिए
चाक मत कर जैब बे-अय्याम-ए-गुल
कुछ उधर का भी इशारा चाहिए
दोस्ती का पर्दा है बेगानगी
मुँह छुपाना हम से छोड़ा चाहिए
दुश्मनी ने मेरी खो... |
hai-bazm-e-butaan-men-sukhan-aazurda-labon-se-mirza-ghalib-ghazals |
है बज़्म-ए-बुताँ में सुख़न आज़ुर्दा-लबों से
तंग आए हैं हम ऐसे ख़ुशामद-तलबों से
है दौर-ए-क़दह वज्ह-ए-परेशानी-ए-सहबा
यक-बार लगा दो ख़ुम-ए-मय मेरे लबों से
रिंदाना-ए-दर-ए-मय-कदा गुस्ताख़ हैं ज़ाहिद
ज़िन्हार न होना तरफ़ इन बे-अदबों से
बेदाद-ए-वफ़ा देख कि जाती रही आख़िर
हर-चंद मिरी जान को था रब्त लबों से
क्या पूछे ह... |
na-gul-e-nagma-huun-na-parda-e-saaz-mirza-ghalib-ghazals |
न गुल-ए-नग़्मा हूँ न पर्दा-ए-साज़
मैं हूँ अपनी शिकस्त की आवाज़
तू और आराइश-ए-ख़म-ए-काकुल
मैं और अंदेशा-हा-ए-दूर-दराज़
लाफ़-ए-तमकीं फ़रेब-ए-सादा-दिली
हम हैं और राज़-हा-ए-सीना-गुदाज़
हूँ गिरफ़्तार-ए-उल्फ़त-ए-सय्याद
वर्ना बाक़ी है ताक़त-ए-परवाज़
वो भी दिन हो कि उस सितमगर से
नाज़ खींचूँ बजाए हसरत-ए-नाज़
नहीं दिल... |
saraapaa-rehn-e-ishq-o-naa-guziir-e-ulfat-e-hastii-mirza-ghalib-ghazals |
सरापा रेहन-इश्क़-ओ-ना-गुज़ीर-उल्फ़त-हस्ती
इबादत बर्क़ की करता हूँ और अफ़्सोस हासिल का
ब-क़द्र-ए-ज़र्फ़ है साक़ी ख़ुमार-ए-तिश्ना-कामी भी
जो तू दरिया-ए-मै है तो मैं ख़म्याज़ा हूँ साहिल का
ज़ि-बस खूँ-गश्त-ए-रश्क-ए-वफ़ा था वहम बिस्मिल का
चुराया ज़ख़्म-हा-ए-दिल ने पानी तेग़-ए-क़ातिल का
निगाह-ए-चश्म-ए-हासिद वाम ले ऐ ज... |
koii-din-gar-zindagaanii-aur-hai-mirza-ghalib-ghazals |
कोई दिन गर ज़िंदगानी और है
अपने जी में हम ने ठानी और है
आतिश-ए-दोज़ख़ में ये गर्मी कहाँ
सोज़-ए-ग़म-हा-ए-निहानी और है
बार-हा देखी हैं उन की रंजिशें
पर कुछ अब के सरगिरानी और है
दे के ख़त मुँह देखता है नामा-बर
कुछ तो पैग़ाम-ए-ज़बानी और है
क़ाता-ए-एमार है अक्सर नुजूम
वो बला-ए-आसमानी और है
हो चुकीं 'ग़ालिब' बलाएँ... |
sataaish-gar-hai-zaahid-is-qadar-jis-baag-e-rizvaan-kaa-mirza-ghalib-ghazals |
सताइश-गर है ज़ाहिद इस क़दर जिस बाग़-ए-रिज़वाँ का
वो इक गुलदस्ता है हम बे-ख़ुदों के ताक़-ए-निस्याँ का
बयाँ क्या कीजिए बेदाद-ए-काविश-हा-ए-मिज़गाँ का
कि हर यक क़तरा-ए-ख़ूँ दाना है तस्बीह-ए-मरजाँ का
न आई सतवत-ए-क़ातिल भी माने मेरे नालों को
लिया दाँतों में जो तिनका हुआ रेशा नियस्ताँ का
दिखाऊँगा तमाशा दी अगर फ़ुर्सत ज... |
rashk-kahtaa-hai-ki-us-kaa-gair-se-ikhlaas-haif-mirza-ghalib-ghazals |
रश्क कहता है कि उस का ग़ैर से इख़्लास हैफ़
अक़्ल कहती है कि वो बे-मेहर किस का आश्ना
ज़र्रा ज़र्रा साग़र-ए-मै-ख़ाना-ए-नै-रंग है
गर्दिश-ए-मजनूँ ब-चश्मक-हा-ए-लैला आश्ना
शौक़ है सामाँ-तराज़-ए-नाज़िश-ए-अरबाब-ए-अज्ज़
ज़र्रा सहरा-दस्त-गाह ओ क़तरा दरिया-आश्ना
मैं और एक आफ़त का टुकड़ा वो दिल-ए-वहशी कि है
आफ़ियत का दुश्म... |
rone-se-aur-ishq-men-bebaak-ho-gae-mirza-ghalib-ghazals |
रोने से और इश्क़ में बेबाक हो गए
धोए गए हम इतने कि बस पाक हो गए
सर्फ़-ए-बहा-ए-मय हुए आलात-ए-मय-कशी
थे ये ही दो हिसाब सो यूँ पाक हो गए
रुस्वा-ए-दहर गो हुए आवारगी से तुम
बारे तबीअतों के तो चालाक हो गए
कहता है कौन नाला-ए-बुलबुल को बे-असर
पर्दे में गुल के लाख जिगर चाक हो गए
पूछे है क्या वजूद ओ अदम अहल-ए-शौक़ का
आ... |
saadgii-par-us-kii-mar-jaane-kii-hasrat-dil-men-hai-mirza-ghalib-ghazals |
सादगी पर उस की मर जाने की हसरत दिल में है
बस नहीं चलता कि फिर ख़ंजर कफ़-ए-क़ातिल में है
देखना तक़रीर की लज़्ज़त कि जो उस ने कहा
मैं ने ये जाना कि गोया ये भी मेरे दिल में है
गरचे है किस किस बुराई से वले बाईं-हमा
ज़िक्र मेरा मुझ से बेहतर है कि उस महफ़िल में है
बस हुजूम-ए-ना-उमीदी ख़ाक में मिल जाएगी
ये जो इक लज़्ज... |
dhamkii-men-mar-gayaa-jo-na-baab-e-nabard-thaa-mirza-ghalib-ghazals |
धमकी में मर गया जो न बाब-ए-नबर्द था
इश्क़-ए-नबर्द-पेशा तलबगार-ए-मर्द था
था ज़िंदगी में मर्ग का खटका लगा हुआ
उड़ने से पेश-तर भी मिरा रंग ज़र्द था
तालीफ़ नुस्ख़ा-हा-ए-वफ़ा कर रहा था मैं
मजमुआ-ए-ख़याल अभी फ़र्द फ़र्द था
दिल ता जिगर कि साहिल-ए-दरिया-ए-ख़ूँ है अब
इस रहगुज़र में जल्वा-ए-गुल आगे गर्द था
जाती है कोई क... |
gam-khaane-men-buudaa-dil-e-naakaam-bahut-hai-mirza-ghalib-ghazals |
ग़म खाने में बूदा दिल-ए-नाकाम बहुत है
ये रंज कि कम है मय-ए-गुलफ़ाम बहुत है
कहते हुए साक़ी से हया आती है वर्ना
है यूँ कि मुझे दुर्द-ए-तह-ए-जाम बहुत है
ने तीर कमाँ में है न सय्याद कमीं में
गोशे में क़फ़स के मुझे आराम बहुत है
क्या ज़ोहद को मानूँ कि न हो गरचे रियाई
पादाश-ए-अमल की तमा-ए-ख़ाम बहुत है
हैं अहल-ए-ख़िरद... |
haasil-se-haath-dho-baith-ai-aarzuu-khiraamii-mirza-ghalib-ghazals |
हासिल से हाथ धो बैठ ऐ आरज़ू-ख़िरामी
दिल जोश-ए-गिर्या में है डूबी हुई असामी
उस शम्अ' की तरह से जिस को कोई बुझा दे
मैं भी जले-हुओं में हूँ दाग़-ए-ना-तमामी
करते हो शिकवा किस का तुम और बेवफ़ाई
सर पीटते हैं अपना हम और नेक-नामी
सद-रंग-ए-गुल कतरना दर-पर्दा क़त्ल करना
तेग़-ए-अदा नहीं है पाबंद-ए-बे-नियामी
तर्फ़-ए-सुख़न... |
maze-jahaan-ke-apnii-nazar-men-khaak-nahiin-mirza-ghalib-ghazals |
मज़े जहान के अपनी नज़र में ख़ाक नहीं
सिवाए ख़ून-ए-जिगर सो जिगर में ख़ाक नहीं
मगर ग़ुबार हुए पर हवा उड़ा ले जाए
वगरना ताब ओ तवाँ बाल-ओ-पर में ख़ाक नहीं
ये किस बहिश्त-शमाइल की आमद आमद है
कि ग़ैर-ए-जल्वा-ए-गुल रहगुज़र में ख़ाक नहीं
भला उसे न सही कुछ मुझी को रहम आता
असर मिरे नफ़स-ए-बे-असर में ख़ाक नहीं
ख़याल-ए-जल्... |
miltii-hai-khuu-e-yaar-se-naar-iltihaab-men-mirza-ghalib-ghazals |
मिलती है ख़ू-ए-यार से नार इल्तिहाब में
काफ़िर हूँ गर न मिलती हो राहत अज़ाब में
कब से हूँ क्या बताऊँ जहान-ए-ख़राब में
शब-हा-ए-हिज्र को भी रखूँ गर हिसाब में
ता फिर न इंतिज़ार में नींद आए उम्र भर
आने का अहद कर गए आए जो ख़्वाब में
क़ासिद के आते आते ख़त इक और लिख रखूँ
मैं जानता हूँ जो वो लिखेंगे जवाब में
मुझ तक कब ... |
ishq-taasiir-se-naumiid-nahiin-mirza-ghalib-ghazals |
इश्क़ तासीर से नौमेद नहीं
जाँ-सिपारी शजर-ए-बेद नहीं
सल्तनत दस्त-ब-दस्त आई है
जाम-ए-मय ख़ातम-ए-जमशेद नहीं
है तजल्ली तिरी सामान-ए-वजूद
ज़र्रा बे-परतव-ए-ख़ुर्शेद नहीं
राज़-ए-माशूक़ न रुस्वा हो जाए
वर्ना मर जाने में कुछ भेद नहीं
गर्दिश-ए-रंग-ए-तरब से डर है
ग़म-ए-महरूमी-ए-जावेद नहीं
कहते हैं जीते हैं उम्मेद पे लो... |
manzuur-thii-ye-shakl-tajallii-ko-nuur-kii-mirza-ghalib-ghazals |
मंज़ूर थी ये शक्ल तजल्ली को नूर की
क़िस्मत खुली तिरे क़द-ओ-रुख़ से ज़ुहूर की
इक ख़ूँ-चकाँ कफ़न में करोड़ों बनाओ हैं
पड़ती है आँख तेरे शहीदों पे हूर की
वाइ'ज़ न तुम पियो न किसी को पिला सको
क्या बात है तुम्हारी शराब-ए-तहूर की
लड़ता है मुझ से हश्र में क़ातिल कि क्यूँ उठा
गोया अभी सुनी नहीं आवाज़ सूर की
आमद बहार क... |
qatra-e-mai-bas-ki-hairat-se-nafas-parvar-huaa-mirza-ghalib-ghazals |
क़तरा-ए-मय बस-कि हैरत से नफ़स-परवर हुआ
ख़त्त-ए-जाम-ए-मै सरासर रिश्ता-ए-गौहर हुआ
ए'तिबार-ए-इश्क़ की ख़ाना-ख़राबी देखना
ग़ैर ने की आह लेकिन वो ख़फ़ा मुझ पर हुआ
गरमी-ए-दौलत हुइ आतिश-ज़न-ए-नाम-ए-निको
ख़ाना-ए-ख़ातिम में याक़ूत-ए-नगीं अख़्तर हुआ
नश्शा में गुम-कर्दा-राह आया वो मस्त-ए-फ़ित्ना-ख़ू
आज रंग-रफ़्ता दौर-ए-गर... |
faarig-mujhe-na-jaan-ki-maanind-e-subh-o-mehr-mirza-ghalib-ghazals |
फ़ारिग़ मुझे न जान कि मानिंद-ए-सुब्ह-ओ-मेहर
है दाग़-ए-इश्क़ ज़ीनत-ए-जेब-ए-कफ़न हुनूज़
है नाज़-ए-मुफ़्लिसाँ ज़र-ए-अज़-दस्त-रफ़्ता पर
हूँ गुल-फ़रोश-ए-शोख़ी-ए-दाग़-ए-कोहन हुनूज़
मै-ख़ाना-ए-जिगर में यहाँ ख़ाक भी नहीं
ख़म्याज़ा खींचे है बुत-ए-बे-दाद-फ़न हुनूज़
जूँ जादा सर-ब-कू-ए-तमन्ना-ए-बे-दिली
ज़ंजीर-ए-पा है रिश्त... |
gulshan-men-bandobast-ba-rang-e-digar-hai-aaj-mirza-ghalib-ghazals |
गुलशन में बंदोबस्त ब-रंग-ए-दिगर है आज
क़ुमरी का तौक़ हल्क़ा-ए-बैरून-ए-दर है आज
आता है एक पारा-ए-दिल हर फ़ुग़ाँ के साथ
तार-ए-नफ़स कमंद-ए-शिकार-ए-असर है आज
ऐ आफ़ियत किनारा कर ऐ इंतिज़ाम चल
सैलाब-ए-गिर्या दरपय-ए-दीवार-ओ-दर है आज
माज़ूली-ए-तपिश हुई इफ़रात-ए-इंतिज़ार
चश्म-ए-कुशादा हल्क़ा-ए-बैरून-ए-दर है आज
हैरत-फ़र... |
juz-qais-aur-koii-na-aayaa-ba-ruu-e-kaar-mirza-ghalib-ghazals |
जुज़ क़ैस और कोई न आया ब-रू-ए-कार
सहरा मगर ब-तंगी-ए-चश्म-ए-हसूद था
आशुफ़्तगी ने नक़्श-ए-सुवैदा किया दुरुस्त
ज़ाहिर हुआ कि दाग़ का सरमाया दूद था
था ख़्वाब में ख़याल को तुझ से मुआ'मला
जब आँख खुल गई न ज़ियाँ था न सूद था
लेता हूँ मकतब-ए-ग़म-ए-दिल में सबक़ हनूज़
लेकिन यही कि रफ़्त गया और बूद था
ढाँपा कफ़न ने दाग़-ए... |
lab-e-khushk-dar-tishnagii-murdagaan-kaa-mirza-ghalib-ghazals |
लब-ए-ख़ुश्क दर-तिश्नगी-मुर्दगाँ का
ज़ियारत-कदा हूँ दिल-आज़ुर्दगाँ का
हमा ना-उमीदी हमा बद-गुमानी
मैं दिल हूँ फ़रेब-ए-वफ़ा-ख़ुर्दगाँ का
शगुफ़्तन कमीं-गाह-ए-तक़रीब-जूई
तसव्वुर हूँ बे-मोजिब आज़ुर्दगाँ का
ग़रीब-ए-सितम-दीदा-ए-बाज़-गश्तन
सुख़न हूँ सुख़न बर लब-आवुर्दगाँ का
सरापा यक-आईना-दार-ए-शिकस्तन
इरादा हूँ यक-आलम... |
laraztaa-hai-miraa-dil-zahmat-e-mehr-e-darakhshaan-par-mirza-ghalib-ghazals |
लरज़ता है मिरा दिल ज़हमत-ए-मेहर-ए-दरख़्शाँ पर
मैं हूँ वो क़तरा-ए-शबनम कि हो ख़ार-ए-बयाबाँ पर
न छोड़ी हज़रत-ए-यूसुफ़ ने याँ भी ख़ाना-आराई
सफ़ेदी दीदा-ए-याक़ूब की फिरती है ज़िंदाँ पर
फ़ना तालीम-ए-दर्स-ए-बे-ख़ुदी हूँ उस ज़माने से
कि मजनूँ लाम अलिफ़ लिखता था दीवार-ए-दबिस्ताँ पर
फ़राग़त किस क़दर रहती मुझे तश्वीश-ए-मर... |
aa-ki-mirii-jaan-ko-qaraar-nahiin-hai-mirza-ghalib-ghazals |
आ कि मिरी जान को क़रार नहीं है
ताक़त-ए-बेदाद-ए-इंतिज़ार नहीं है
देते हैं जन्नत हयात-ए-दहर के बदले
नश्शा ब-अंदाज़ा-ए-ख़ुमार नहीं है
गिर्या निकाले है तेरी बज़्म से मुझ को
हाए कि रोने पे इख़्तियार नहीं है
हम से अबस है गुमान-ए-रंजिश-ए-ख़ातिर
ख़ाक में उश्शाक़ की ग़ुबार नहीं है
दिल से उठा लुत्फ़-ए-जल्वा-हा-ए-मआनी
ग... |
naqsh-fariyaadii-hai-kis-kii-shokhi-e-tahriir-kaa-mirza-ghalib-ghazals |
नक़्श फ़रियादी है किस की शोख़ी-ए-तहरीर का
काग़ज़ी है पैरहन हर पैकर-ए-तस्वीर का
काव काव-ए-सख़्त-जानी हाए-तन्हाई न पूछ
सुब्ह करना शाम का लाना है जू-ए-शीर का
जज़्बा-ए-बे-इख़्तियार-ए-शौक़ देखा चाहिए
सीना-ए-शमशीर से बाहर है दम शमशीर का
आगही दाम-ए-शुनीदन जिस क़दर चाहे बिछाए
मुद्दआ अन्क़ा है अपने आलम-ए-तक़रीर का
बस-क... |
mund-gaiin-kholte-hii-kholte-aankhen-gaalib-mirza-ghalib-ghazals |
मुँद गईं खोलते ही खोलते आँखें 'ग़ालिब'
यार लाए मिरी बालीं पे उसे पर किस वक़्त |
muzhda-ai-zauq-e-asiirii-ki-nazar-aataa-hai-mirza-ghalib-ghazals |
मुज़्दा ऐ ज़ौक़-ए-असीरी कि नज़र आता है
दाम-ए-ख़ाली क़फ़स-ए-मुर्ग़-ए-गिरफ़्तार के पास
जिगर-ए-तिश्ना-ए-आज़ार तसल्ली न हुआ
जू-ए-ख़ूँ हम ने बहाई बुन-ए-हर ख़ार के पास
मुँद गईं खोलते ही खोलते आँखें है है
ख़ूब वक़्त आए तुम इस आशिक़-ए-बीमार के पास
मैं भी रुक रुक के न मरता जो ज़बाँ के बदले
दशना इक तेज़ सा होता मिरे ग़म-... |
na-hogaa-yak-bayaabaan-maandgii-se-zauq-kam-meraa-mirza-ghalib-ghazals |
न होगा यक-बयाबाँ माँदगी से ज़ौक़ कम मेरा
हबाब-ए-मौजा-ए-रफ़्तार है नक़्श-ए-क़दम मेरा
मोहब्बत थी चमन से लेकिन अब ये बे-दिमाग़ी है
कि मौज-ए-बू-ए-गुल से नाक में आता है दम मेरा
रह-ए-ख़्वाबीदा थी गर्दन-कश-ए-यक-दर्स-ए-आगाही
ज़मीं को सैली-ए-उस्ताद है नक़्श-ए-क़दम मेरा
सुराग़-आवारा-ए-अर्ज़-ए-दो-आलम शोर-ए-महशर हूँ
पर-अफ़... |
daaim-padaa-huaa-tire-dar-par-nahiin-huun-main-mirza-ghalib-ghazals |
दाइम पड़ा हुआ तिरे दर पर नहीं हूँ मैं
ख़ाक ऐसी ज़िंदगी पे कि पत्थर नहीं हूँ मैं
क्यूँ गर्दिश-ए-मुदाम से घबरा न जाए दिल
इंसान हूँ पियाला ओ साग़र नहीं हूँ मैं
या-रब ज़माना मुझ को मिटाता है किस लिए
लौह-ए-जहाँ पे हर्फ़-ए-मुकर्रर नहीं हूँ मैं
हद चाहिए सज़ा में उक़ूबत के वास्ते
आख़िर गुनाहगार हूँ काफ़र नहीं हूँ मैं
... |
jaada-e-rah-khur-ko-vaqt-e-shaam-hai-taar-e-shuaaa-mirza-ghalib-ghazals |
जादा-ए-रह ख़ुर को वक़्त-ए-शाम है तार-ए-शुआअ'
चर्ख़ वा करता है माह-ए-नौ से आग़ोश-ए-विदा'अ
शम्अ' से है बज़्म-ए-अंगुश्त-ए-तहय्युर दर दहन
शोला-ए-आवाज़-ए-ख़ूबाँ पर ब-हंगाम-ए-सिमाअ'
जूँ पर-ए-ताऊस जौहर तख़्ता मश्क़-ए-रंग है
बस-कि है वो क़िबला-ए-आईना महव-ए-इख़तिराअ'
रंजिश-ए-हैरत-सरिश्ताँ सीना-साफ़ी पेशकश
जौहर-ए-आईना है... |
shauq-har-rang-raqiib-e-sar-o-saamaan-niklaa-mirza-ghalib-ghazals |
शौक़ हर रंग रक़ीब-ए-सर-ओ-सामाँ निकला
क़ैस तस्वीर के पर्दे में भी उर्यां निकला
ज़ख़्म ने दाद न दी तंगी-ए-दिल की या रब
तीर भी सीना-ए-बिस्मिल से पर-अफ़्शाँ निकला
बू-ए-गुल नाला-ए-दिल दूद-ए-चराग़-ए-महफ़िल
जो तिरी बज़्म से निकला सो परेशाँ निकला
दिल-ए-हसरत-ज़दा था माइदा-ए-लज़्ज़त-ए-दर्द
काम यारों का ब-क़दर-ए-लब-ओ-दंदा... |
koii-ummiid-bar-nahiin-aatii-mirza-ghalib-ghazals |
कोई उम्मीद बर नहीं आती
कोई सूरत नज़र नहीं आती
मौत का एक दिन मुअय्यन है
नींद क्यूँ रात भर नहीं आती
आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी
अब किसी बात पर नहीं आती
जानता हूँ सवाब-ए-ताअत-ओ-ज़ोहद
पर तबीअत इधर नहीं आती
है कुछ ऐसी ही बात जो चुप हूँ
वर्ना क्या बात कर नहीं आती
क्यूँ न चीख़ूँ कि याद करते हैं
मेरी आवाज़ गर नहीं... |
aamad-e-khat-se-huaa-hai-sard-jo-baazaar-e-dost-mirza-ghalib-ghazals |
आमद-ए-ख़त से हुआ है सर्द जो बाज़ार-ए-दोस्त
दूद-ए-शम-ए-कुश्ता था शायद ख़त-ए-रुख़्सार-ए-दोस्त
ऐ दिल-ए-ना-आक़िबत-अंदेश ज़ब्त-ए-शौक़ कर
कौन ला सकता है ताब-ए-जल्वा-ए-दीदार-ए-दोस्त
ख़ाना-वीराँ-साज़ी-ए-हैरत तमाशा कीजिए
सूरत-ए-नक़्श-ए-क़दम हूँ रफ़्ता-ए-रफ़्तार-ए-दोस्त
इश्क़ में बेदाद-ए-रश्क-ए-ग़ैर ने मारा मुझे
कुश्ता-ए... |
khatar-hai-rishta-e-ulfat-rag-e-gardan-na-ho-jaave-mirza-ghalib-ghazals |
ख़तर है रिश्ता-ए-उल्फ़त रग-ए-गर्दन न हो जावे
ग़ुरूर-ए-दोस्ती आफ़त है तू दुश्मन न हो जावे
समझ इस फ़स्ल में कोताही-ए-नश्व-ओ-नुमा 'ग़ालिब'
अगर गुल सर्व के क़ामत पे पैराहन न हो जावे |
vo-mirii-chiin-e-jabiin-se-gam-e-pinhaan-samjhaa-mirza-ghalib-ghazals |
वो मिरी चीन-ए-जबीं से ग़म-ए-पिन्हाँ समझा
राज़-ए-मक्तूब ब-बे-रब्ती-ए-उनवाँ समझा
यक अलिफ़ बेश नहीं सैक़ल-ए-आईना हनूज़
चाक करता हूँ मैं जब से कि गरेबाँ समझा
शरह-ए-असबाब-ए-गिरफ़्तारी-ए-ख़ातिर मत पूछ
इस क़दर तंग हुआ दिल कि मैं ज़िंदाँ समझा
बद-गुमानी ने न चाहा उसे सरगर्म-ए-ख़िराम
रुख़ पे हर क़तरा अरक़ दीदा-ए-हैराँ सम... |
kii-vafaa-ham-se-to-gair-is-ko-jafaa-kahte-hain-mirza-ghalib-ghazals |
की वफ़ा हम से तो ग़ैर इस को जफ़ा कहते हैं
होती आई है कि अच्छों को बुरा कहते हैं
आज हम अपनी परेशानी-ए-ख़ातिर उन से
कहने जाते तो हैं पर देखिए क्या कहते हैं
अगले वक़्तों के हैं ये लोग इन्हें कुछ न कहो
जो मय ओ नग़्मा को अंदोह-रुबा कहते हैं
दिल में आ जाए है होती है जो फ़ुर्सत ग़श से
और फिर कौन से नाले को रसा कहते है... |
siimaab-pusht-garmi-e-aaiina-de-hai-ham-mirza-ghalib-ghazals |
सीमाब-पुश्त गर्मी-ए-आईना दे है हम
हैराँ किए हुए हैं दिल-ए-बे-क़रार के
आग़ोश-ए-गुल कुशूदा बरा-ए-विदा है
ऐ अंदलीब चल कि चले दिन बहार के
यूँ बाद-ए-ज़ब्त-ए-अश्क फिरूँ गिर्द यार के
पानी पिए किसू पे कोई जैसे वार के
बाद-अज़-विदा-ए-यार ब-ख़ूँ दर तपीदा हैं
नक़्श-ए-क़दम हैं हम कफ़-ए-पा-ए-निगार के
हम मश्क़-ए-फ़िक्र-ए-वस्... |
sad-jalva-ruu-ba-ruu-hai-jo-mizhgaan-uthaaiye-mirza-ghalib-ghazals |
सद जल्वा रू-ब-रू है जो मिज़्गाँ उठाइए
ताक़त कहाँ कि दीद का एहसाँ उठाइए
है संग पर बरात-ए-मआश-ए-जुनून-ए-इश्क़
या'नी हुनूज़ मिन्नत-ए-तिफ़्लाँ उठाइए
दीवार बार-ए-मिन्नत-ए-मज़दूर से है ख़म
ऐ ख़ानुमाँ-ख़राब न एहसाँ उठाइए
या मेरे ज़ख़्म-ए-रश्क को रुस्वा न कीजिए
या पर्दा-ए-तबस्सुम-ए-पिन्हाँ उठाइए
हस्ती फ़रेब-नामा-ए-मौज... |
dost-gam-khvaarii-men-merii-saii-farmaavenge-kyaa-mirza-ghalib-ghazals |
दोस्त ग़म-ख़्वारी में मेरी सई फ़रमावेंगे क्या
ज़ख़्म के भरते तलक नाख़ुन न बढ़ जावेंगे क्या
बे-नियाज़ी हद से गुज़री बंदा-परवर कब तलक
हम कहेंगे हाल-ए-दिल और आप फ़रमावेंगे क्या
हज़रत-ए-नासेह गर आवें दीदा ओ दिल फ़र्श-ए-राह
कोई मुझ को ये तो समझा दो कि समझावेंगे क्या
आज वाँ तेग़ ओ कफ़न बाँधे हुए जाता हूँ मैं
उज़्र मे... |
arz-e-niyaaz-e-ishq-ke-qaabil-nahiin-rahaa-mirza-ghalib-ghazals |
अर्ज़-ए-नियाज़-ए-इश्क़ के क़ाबिल नहीं रहा
जिस दिल पे नाज़ था मुझे वो दिल नहीं रहा
जाता हूँ दाग़-ए-हसरत-ए-हस्ती लिए हुए
हूँ शम-ए-कुश्ता दर-ख़ुर-ए-महफ़िल नहीं रहा
मरने की ऐ दिल और ही तदबीर कर कि मैं
शायान-ए-दस्त-ओ-बाज़ु-ए-क़ातिल नहीं रहा
बर-रू-ए-शश-जहत दर-ए-आईना बाज़ है
याँ इम्तियाज़-ए-नाक़िस-ओ-कामिल नहीं रहा
वा ... |
bazm-e-shaahanshaah-men-ashaar-kaa-daftar-khulaa-mirza-ghalib-ghazals |
बज़्म-ए-शाहंशाह में अशआ'र का दफ़्तर खुला
रखियो या रब ये दर-ए-गंजीना-ए-गौहर खुला
शब हुई फिर अंजुम-ए-रख़्शन्दा का मंज़र खुला
इस तकल्लुफ़ से कि गोया बुत-कदे का दर खुला
गरचे हूँ दीवाना पर क्यूँ दोस्त का खाऊँ फ़रेब
आस्तीं में दशना पिन्हाँ हाथ में नश्तर खुला
गो न समझूँ उस की बातें गो न पाऊँ उस का भेद
पर ये क्या कम है... |
kyuun-na-ho-chashm-e-butaan-mahv-e-tagaaful-kyuun-na-ho-mirza-ghalib-ghazals |
क्यूँ न हो चश्म-ए-बुताँ महव-ए-तग़ाफ़ुल क्यूँ न हो
या'नी उस बीमार को नज़्ज़ारे से परहेज़ है
मरते मरते देखने की आरज़ू रह जाएगी
वाए नाकामी कि उस काफ़िर का ख़ंजर तेज़ है
आरिज़-ए-गुल देख रू-ए-यार याद आया 'असद'
जोशिश-ए-फ़स्ल-ए-बहारी इश्तियाक़-अंगेज़ है |
jis-zakhm-kii-ho-saktii-ho-tadbiir-rafuu-kii-mirza-ghalib-ghazals |
जिस ज़ख़्म की हो सकती हो तदबीर रफ़ू की
लिख दीजियो या रब उसे क़िस्मत में अदू की
अच्छा है सर-अंगुश्त-ए-हिनाई का तसव्वुर
दिल में नज़र आती तो है इक बूँद लहू की
क्यूँ डरते हो उश्शाक़ की बे-हौसलगी से
याँ तो कोई सुनता नहीं फ़रियाद किसू की
दशने ने कभी मुँह न लगाया हो जिगर को
ख़ंजर ने कभी बात न पूछी हो गुलू की
सद-हैफ़ ... |
vaarasta-us-se-hain-ki-mohabbat-hii-kyuun-na-ho-mirza-ghalib-ghazals |
वारस्ता उस से हैं कि मोहब्बत ही क्यूँ न हो
कीजे हमारे साथ अदावत ही क्यूँ न हो
छोड़ा न मुझ में ज़ोफ़ ने रंग इख़्तिलात का
है दिल पे बार नक़्श-ए-मोहब्बत ही क्यूँ न हो
है मुझ को तुझ से तज़्किरा-ए-ग़ैर का गिला
हर-चंद बर-सबील-ए-शिकायत ही क्यूँ न हो
पैदा हुई है कहते हैं हर दर्द की दवा
यूँ हो तो चारा-ए-ग़म-ए-उल्फ़त ही ... |
mahram-nahiin-hai-tuu-hii-navaa-haa-e-raaz-kaa-mirza-ghalib-ghazals |
महरम नहीं है तू ही नवा-हा-ए-राज़ का
याँ वर्ना जो हिजाब है पर्दा है साज़ का
रंग-ए-शिकस्ता सुब्ह-ए-बहार-ए-नज़ारा है
ये वक़्त है शगुफ़्तन-ए-गुल-हा-ए-नाज़ का
तू और सू-ए-ग़ैर नज़र-हा-ए-तेज़ तेज़
मैं और दुख तिरी मिज़ा-हा-ए-दराज़ का
सर्फ़ा है ज़ब्त-ए-आह में मेरा वगर्ना में
तोमा हूँ एक ही नफ़स-ए-जाँ-गुदाज़ का
हैं बस-क... |
aah-ko-chaahiye-ik-umr-asar-hote-tak-mirza-ghalib-ghazals |
आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक
कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक
दाम-ए-हर-मौज में है हल्क़ा-ए-सद-काम-ए-नहंग
देखें क्या गुज़रे है क़तरे पे गुहर होते तक
आशिक़ी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब
दिल का क्या रंग करूँ ख़ून-ए-जिगर होते तक
ता-क़यामत शब-ए-फ़ुर्क़त में गुज़र जाएगी उम्र
सात दिन हम पे भी भारी हैं सहर होते तक... |
bisaat-e-ijz-men-thaa-ek-dil-yak-qatra-khuun-vo-bhii-mirza-ghalib-ghazals |
बिसात-ए-इज्ज़ में था एक दिल यक क़तरा ख़ूँ वो भी
सो रहता है ब-अंदाज़-ए-चकीदन सर-निगूँ वो भी
रहे उस शोख़ से आज़ुर्दा हम चंदे तकल्लुफ़ से
तकल्लुफ़ बरतरफ़ था एक अंदाज़-ए-जुनूँ वो भी
ख़याल-ए-मर्ग कब तस्कीं दिल-ए-आज़ुर्दा को बख़्शे
मिरे दाम-ए-तमन्ना में है इक सैद-ए-ज़बूँ वो भी
न करता काश नाला मुझ को क्या मालूम था हमदम... |
az-mehr-taa-ba-zarra-dil-o-dil-hai-aaina-mirza-ghalib-ghazals |
अज़-मेहर ता-ब-ज़र्रा दिल-ओ-दिल है आइना
तूती को शश-जिहत से मुक़ाबिल है आइना
हैरत हुजूम-ए-लज़्ज़त-ए-ग़लतानी-ए-तपिश
सीमाब-ए-बालिश ओ कमर-ए-दिल है आइना
ग़फ़लत ब-बाल-ए-जौहर-ए-शमशीर पर-फ़िशाँ
याँ पुश्त-ए-चश्म-ए-शोख़ी-ए-क़ातिल है आइना
हैरत-निगाह-ए-बर्क़-ए-तमाशा बहार-ए-शोख़
दर-पर्दा-ए-हवा पर-ए-बिस्मिल है आइना
याँ रह गए... |
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