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ऊपर इमली के घने वृक्षों की छाया है.
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राजा इन बातों पर विचार कर ही रहे थे कि तेनालीराम ने दरबार में आकर
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यदि आज हमारे पास बही-खाते मौजूद होते,
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फूँक दे नाउमीदियाँ, नाउमीदियाँ
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जो पर्यटक एक से अधिक दिन कन्याकुमारी ठहरते हैं
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मैं अपने दोस्तों के बारे में सोच रहा था।
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ऐसा कौन था, जो उसको शत्रु बनाने का साहस कर सके ?
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वह उसके स्वामी की चीज समझी जाए।
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मैं अपने कमरे में चला गया।
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और स्नेह भी वह नहीं,
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'रोटी? रहने दो, पेट काफी भर चुका है।
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लपक कर एक अँधेरी गली में घुस गये।
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तेनालीराम ने बताया कि-
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प्रश्नोत्तर होते-होते हाथापाई की नौबत आ पहुँची।
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सबके साथ वह स्कूल चला जायेगा।
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रामचंद्र आकर धम-से चौंकी पर बैठ गया और
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क्योंकि प्रत्येक चिलम अलगू को आध घंटे तक
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'बड़े हमेशा क्यों कहते रहते हैं, अभी नहीं, अभी नहीं?'
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न वे बॉडी पहनती थी, न मोजे-जूते,
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तमाम शहरों में विरोध-प्रदर्शन हुए.
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तब यहाँ भी पंचायत शुरू हुई।
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शहर भर के लोगों ने यह कमाल का कोलम देखा।
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चर्खी है, लकड़ी के हाथी, घोड़े, ऊँट,
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किस तरह चीजों को बदल सकता है।
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समान उसके दाँत हँसते ही रहते।
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गाँव के कुत्ते इस जमाव को भोज समझ कर झुंड के झुंड जमा हो गये थे।
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दयालुता आपके लिए क्या कर सकती है?
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केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों का
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एकदम मेरी नई फ़्रोक जैसी.
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एक समय की बात है कि तेनालीराम को पता चला कि
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वह थोड़ी-थोड़ी देर में साँस ले रहे थे।
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फिर रुककर बोला, 'मैं नगर निगम की तरफ़ से हूँ, मेरा नाम मुखर्जी है।'
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क्लर्की से उनकी छँटनी न हुई हो और
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नए आने वाले आकर पीछे की कतार में खड़े हो जाते हैं.
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मेरे पीछे मेरे बच्चे चैन उड़ायेंगे।
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रहा तहसील-वसूल का खर्च, यह सब मैंने अपने पास से दिया है।
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'बहू जी! हमने बाजार में एक बात सुनी है।
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अब धन आवेश वाले आयन हल्के होने की वजह से ऊपर उठते हैं और
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पानी गरम हो रहा था। उन्होंने दरवाज़ा थोड़ा-सा और खोला।
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फ़िर टुल्लु ने दरवाज़े को थोड़ा सा और
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सुंदर घने बाल बस जो उसके पास नहीं था वह था उजला रंग।
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अब गुब्बारे को दीवार पर रखें ओर देखें कि
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'तो चंपा! अब उससे भी अच्छे ढंग से
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और, जब यही चालक अपनी मोटर साइकिल
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भैया क्या उठ गये,
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'महाराज! मेरा कोई ऐसा इरादा नहीं था जैसा आप सोच रहे हैं|
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कुछ देर बाद राजा के सिपाही एक हाथी लेकर पहुंच गए|
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धीरे-धीरे मुंशी जी का विश्वास इतना बढ़ा कि
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देखकर उसकी वो मुस्कान गायब ही हो गयी।
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करते तो वह उन पर नज़र डाल लेते।
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देश के अन्य भागों से वैसे तो अनेक रेलगाड़ियाँ हैं,
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शायद मोरू ने भी ऐसा ही किया। वह और बहुत कुछ करने लगा।
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'नमस्ते, बड़े मियाँ,' उसने नक्की सुर में पुकारा।
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दादाजी बोले।
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लगा कि दादाजी पेड़ की लड़ाई जीत गए।
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एक को दूसरे पर अटल विश्वास था।
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मज़दूरों को एकजुट किया
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कागजों में हाथ तक न लगाने देगी।
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जब कभी ऐसे कोई मस्ताना
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'मां तुम झूठी हो, तुम झूठ बोलती हो, मैं कोई परी नहीं हूं।
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क्योंकि उस समय इसका विरोध करने वाला पूरे नगर में कोई भी नहीं होता|
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अम्बर पनाहे मांगे
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पिछले साल अलगू चौधरी बटेसर से
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वह मनुष्य की मनोवृत्तियों से परिचित न थी।
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उसे कुछ आता ही नहीं था।
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लेकिन वे पेड़ से नीचे नहीं उतरे।
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कहीं से एक कंबल डालकर कोई शीत से मुक्त करता।'
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अब मुश्किल नहीं कुछ भी
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पेड़ पर 'पेड़ों को बचाओ!' का बोर्ड लटक रहा था।
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पर अबकी बार शक्ति ने जवाब दे दिया।
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मैंने अज्जा से पूछा, 'क्या मैं अपने दोस्तों के साथ खेलने जाऊँ?'
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पले-बड़े, मीनू.
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मुखर्जी ने बुरा सा मुँह बनाते हुए बक्सा खोला, 'मेरे पास एक कागज़ है,'
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उस रात मैं ग़ुस्से में सो गया।
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काश मैं भी दादाजी की तरह पेड़ पर सुरक्षित होता।
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पर आज मुझे ज्ञात हुआ कि
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कोई नहीं तो तेरे अपने हैं सपने ये प्यार के
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वह खुद भी वैसा व्यवहार करने के लिए प्रेरित होते हैं.
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अलग-अलग धर्मों के चलते संघर्ष बढ़ रहा है.'
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'कोई ऐसा करतब दिखाओ कि जो अब तक किसी ने ना दिखाया हो और
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नये-नये मनसूबे सोचते; पर फिर अपने ही तर्को से काट देते।
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गाँधी जी की तरह, वे सब भी भारत की स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे थे।
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जितना दुष्कर समझते थे,
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तुम मेरी प्राणदात्री हो,
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वह भी हँसने लगा।
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हम चारों ने मज़े से कॉफ़ी पी।
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उसका दिल खून केआँसू रो रहा था।
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याद रखो जो प्रकृति के बदलाव के साथ खुद को जोड़ नहीं पाते वो एक दिन विलुप्त हो जाते है'
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हामिद ने कलेजा मजबूत करके कहा-तीन पैसे लोगे?
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उसे अपने बीते दिन याद आए।
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इन्हीं अनगिनती पैसों में अनगिनती
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दीदी, क्या उसकी अम्मी उसकी पिटाई नहीं करतीं?
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लेकिन मैं कल तक रुकना नहीं चाहता।
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अब तुम क्या करोगी?'
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उनकी आँखें आधी बंद थीं।
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टाइगर चिंचिंयाता अंदर भागा।
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समान उसके दाँत हँसते ही रहते।
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तुम अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए पेड़ों की हत्या नहीं कर सकते।
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छोड़कर शेष रास्ता सड़क के दोनों तरफ़ दुकानों
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जिस बात को सारी दुनिया जानती है,
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