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18.6
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शान्ति और दृढ़ता से उन्होंने उनको चेतावनी दी यदि पुलिसवाले नहीं गए तो
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उसमें बिलकुल हरकत न हुई!
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लेकिन, इस दौरान कई जगह हिंसा भड़क उठी.
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ऐसा क्यों होता है-
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गालियाँ देने लगी-निगोडे़ ने ऐसा कुलच्छनी बैल दिया
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अंत में इधर-उधर देखने के बाद टुकड़े को मुँह में
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उतरा तिरे किनारे जब कारवाँ हमारा
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दो अंक एक के ऊपर एक ऐसे बैठ गये जैसे कोई ढुलमुल इमारत हो जो अपनी नींव भरने का इन्तज़ार कर रही हो।
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मत करो भैया नहीं हैं तो क्या हुआ मैं हूं ना।
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उर्मी उसकी परेशानी समझती थी लेकिन फिर भी कांता से उसे रश्क हो रहा था।
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आशा और आश्‍चर्य से मैंने बगीचे की तरफ़ देखा।
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भालू दादा ने गोद उठाया।
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तेरी कोशिशें ही कामयाब होंगी
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सब मिलकर कम पानी की फसल लगाने के साथ-साथ
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ज़रा याद करो क़ुरबानी
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पंडित जी हमें मँझधार में छोड़कर सुरपुर को सिधर गये,
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शरीर का चमड़ा झूलने लगा था,
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कृपया अब नीचे आ जाइये|
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वह नक्षत्रों की मधुर छाया '
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अब उससे कोई नहीं पूछता था कि वह उनके साथ क्यों नहीं आता।
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वर्षा ऋतु में बाढ़ आ जाने के कारण नाव का सहारा भी खत्म हो गया है|
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आप जाइए, उन्हें बुला लाइए।
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सिर रखकर शायद पैर की उँगलियाँ या
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भगवान हुनर किसी को रंग देखकर नहीं देता
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क्योंकि उस समय इसका विरोध करने वाला पूरे नगर में कोई भी नहीं होता|
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अपनी माँ की ओर देखा और
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को ब्रिटेन का समर्थन करने को कहा,
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आँसू की बड़ी-बड़ी बूँदें गिराती जाती थी.
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तो जुम्मन पर अपना घर छोड़ देते थे।
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हेयरपिन, ब्रुचेज, जाकेट आदि परमावश्यक चीजों का
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वहीं गांधी जी का स्मारक बनाया गया है।
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तो रिश्तों में लालच हम काहे सहे
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तू ही तो है अब जो ये बताए
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और जिस तरह बिल्ली चूहे पर झपटती है,
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बोला, बाबू जी देवता के समान हैं।'
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मुंशी जी सोचने लगे, अब मुझे धन-सम्पत्ति मिल जायगी,
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मैं मन ही मन प्रार्थना कर रहा था,
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उसके बोलते ही उसके साथी मुझे घेर कर खड़े हो गए।
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सबसे छोटे बच्चे एक छोर पर और लम्बे वाले दूसरे छोर पर।
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टूटी शमशीरें से ही हो..
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हम दोनो बगीचे मे गये.
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फिर दादाजी और मुखर्जी से आमने-सामने प्रश्‍न पूछे गए।
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थोड़ी देर बाद जुम्मन अलगू के
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दादाजी ने जवाब नहीं दिया।
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जो शहीद हुए हैं उनकी
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दोस्तों, हमारे यहां सभी लोग बड़ी-बड़ी बातें करते हैं की तन नहीं बल्कि
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नैन आंसू जो लिये हैं, ये राहों के दिये हैं
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मैं भी उनकी युक्ति का समर्थन करता हूँ।
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उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
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मामला राजा के दरबार में पहुंचा|
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बुलाकर चिमटा दे दिया.
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है-तुम डरना नहीं अम्मा,
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मैंने अखबार उठा कर देखा तो एक फ्लैश खबर थी, 'वृक्षों के लिए लड़ाई!
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वे दूसरों की चिंता करने और
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इन्हें मैं आपको सौंपती हूँ।
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वे बाहर घूम-फिर क्यों नहीं आते?
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वे उनको बहुत प्यार करते हैं|
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पूरे 10 साल से मैं इस कुबड़ेपन को झेल रहा था|
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इस पानी से दोनों के दिलों का मैल धुल गया।
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फिर आई अंकों वाली किताबें।
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मुकदमा शुरु होने के समय हजारों आदमियों की भीड़ हो जाती थी।
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इस ढंग से इस विषय को उठा कर भानुकुँवरि ने
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यह बात सुनकर रश्मि ने दो टूक जवाब दे दिया :-'
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मैंने दादाजी की तरफ़ देखा।
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किसी ने भी ध्यान नहीं दिया कि दादाजी पेड़ पर बैठे हैं।
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दोेनों ने भीतर पदार्पण किया था कि
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बिन्नी सुबह से मेरे पीछे क्यों घूम रहे हो?
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जिसने मुश्किल वक़्त में उसका साथ दिया और उनको भी जिन्होंने उसकी आलोचना की क्
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वह सिपाही आज सुबह तक इनका गुलाम था,
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वहाँ आप को क्या चाहिए?'
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'पागल नहीं हैं, बड़ा होशियार है।
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भारतवर्ष से कितनी दूर इन निरीह प्राणियों में इंद्र और
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गनीमत है मैं कूद कर एक तरफ़ को हो गया था नहीं तो
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अँधेरा होने जा रहा है।' मैं घर के अन्दर दौड़ा।
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शराब पीने और मांसाहार करने जैसे
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इन्हीं में एक सरदार था कि सबको सँभाल लिया।
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खोला और बुल्लु ने आग पर एक पानी का पतीला रख दिया।
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मैं अपनी नाक भी गरम कर लूँ। घबराना बिलकुल नहीं। समझे?'
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टूटा टूटा एक परिंदा ऐसे टूटा
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वह चुप न हुआ।
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तरह चौकी पर आकर बैठ गया।
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'ठीक है,' टुल्लु ने कहा।
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पंखे को जरा और जोर से घुमाती हुई बोली,
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भारीभरकम पुलिसवाले ने आगे बढ़कर कहा,
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उच्च स्थान ग्रहण करते ही अपनी जिम्मेदारी का भाव पैदा हुआ ।
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जो तुम्हारे लिए नए द्वीप की सृष्टि कर सकता है,
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इसके बाद त्रिभुवनदास ने
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कहकर जया ने हँस दिया।
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एक दीवार
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वह मतवाले की तरह उठी ओर गगरे से
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पिछले कई वर्षों के अपने
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बिरला ही कोई भला आदमी होगा,
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सारे शहर में इस मुकदमें की धूम थी।
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नायक! अब इस नौका का स्वामी मैं हूं।'
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उसके मन में एक संभ्रमपूर्ण श्रद्धा
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अमेरिका से लौटने के बाद गैराज में
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अब थोड़ी सर्दी होने लगी है।
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अँधेरी रात में जब सभी घर दियों और
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उसके आदमियों की तस्वीरें खींच रहे हैं|
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कितनी न्यायपरायण हो जाती है।
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