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आज गाँव में जश्न का माहौल था।
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एक घण्टे बाद एक नीली कार पेड़ के पास आकर रुकी।
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अकेला सा लगता था तो 100 मोटा और अमीर सा।
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वकीलों और मुख्तारों की पलटन भी जमा थी।
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वो कहता रहा मगर
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इस घटना को हुए कई महीने बीत गये।
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दस-पंद्रह मिनट तक वह उसी तरह खड़ी रही,
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गांव की चौपाल पर शाम की बैठक जमी थी।
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वह कहीं भी नहीं मिल रहा था|
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मोहन ने अपनी माँ को गौर से देखा,
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अचानक दादाजी धीरे-धीरे बोले,
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माँ हँस दीं।
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उनकी बात का गांव के लोगों पर गहरा असर हुआ।
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रामधन अलगू के मित्र थे।
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इस सिद्धांत के अनुसार हमारी गवर्नमेंट को
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बाजार का सौदा बेचनेवालियॉँ भी
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हम-तुम परिश्रम से थककर पालों में शरीर लपेटकर
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जानिए कि अंत में वृक्षों का क्या हुआ?
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मेरी सर्वस्व हो।'
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नहीं तो यह दोगुना बड़ा हो जाएगा और तुम्हारी मेहनत बेकार हो जाएगी|
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उसके जैसे और बच्चे जिन्होंने स्कूल छोड़ दिया था,
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मुझे वह स्मृति नित्य आकर्षित करती है;
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मैंने तो सत्यवादियों को सदा दु:ख झेलते ही देखा है।
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सफ़र कर रहे थे,
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डाल पर बैठे दादाजी को देख कर आश्चर्यचकित रह गया।
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सिद्धेश्वरी की समझ में नहीं आया कि वह क्या करे।
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कोई आपस में गाली-गलौज करते और कोई रोते थे।
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राजा ने पागल आदमी को तो छोड़ दिया परंतु तेनालीराम को साधु की मौत का जिम्मेदार ठहरा कर
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पढ़ाई करने जाने का प्रस्ताव मिला.
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खो के अपने पर ही तो
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वह एक पुस्तक पढ़ रहीं थी।
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नहीं .वह बदसूरत नहीं है, बहुत सुंदर है, वह परी है और
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इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं,
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ये जो देस है तेरा
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इन्सान सब्र भले ही कर जाय, पर खुदा नेक-बद सब देखता है।
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वह देववाणी के सदृश है-और देववाणी में मेरे मनोविकारों का
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रजनी ने यह भी बताया कि वहाँ बर्फ़ के पुतले बनाने की प्रतियोगिता होती है|
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आशाएं ...
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वह कहते थे कि विद्या पढ़ने से नहीं आती;
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अब तक लोग उन्हें विवेकशील और
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उर्मी चिंतित स्वर में कांता से बोली,' पोहा बनाया है चाय के साथ दे दूं?
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मैं उनको पेड़ की डाल पर बैठा इन्तज़ार करते हुए देख रहा था।
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तीन साल हुए खालाजान ने अपनी जायदाद मेरे नाम हिब्बा कर दी थी।
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मगर दुष्टों की विपत्ति ईश्वर के न्याय को सिद्ध करती है।
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ये वो बंधन है जो कभी टूट नही सकता
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अब मैं अपने जबड़ों को चबाते हुए सुनना चाहती हूँ।
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फिर रोटियाँ तूने ऐसी बनाई हैं कि खाई नहीं जातीं।
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मुंशी ने झुँझला कर कहा-तुम लोगों की बुद्वि तो भॉँग खा गयी है।
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अल्लाह के बन्दे हंस दे
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और हमारे टी.वी. में, एक ही बटन दबाने पर,
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लम्हों से आँख मिला के
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अस्तबल में चमारों के यहाँ नाच हो रहा था।
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वो उछलता रहा जितना वो उछल सकता था.
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'साध्वी! तेरी प्रार्थना से भगवान् ने संकटों में मेरी रक्षा की है।'
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वह बूढ़े भी हो चुके थे।
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वह अनमनी होकर उठ खड़ी हुई।
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मेरे दादाजी को गुस्सा आ रहा है।
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उन सबों ने चंपा को वनदेवी-सा सजाया था।
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रामचंद्र बिगड़ उठा,
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उन्हें दयालु कैसे बनाया जा सकता है.
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गॉँव मेरा है।
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9 कितना इकहरा और
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मैंने अपने नाम से जो गॉँव लिया था,
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कृपा दृष्टि पाने हेतु आने लगे.
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तभी बादलों से गड़गड़ाहट की आवाज़ आती है।
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उन्माद की रोगिणी की भांति बड़बड़ाने लगी,
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और थोड़ी देर बाद सो गए।
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हाथ से छीन लिया और
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जुम्मन ने अपने गाँव में बसा लिया था,
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फिर वे तीनों चले गए।
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पंचायत की तैयारियाँ होने लगीं।
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मैंने तो आपको नीम का पौधा यह सोचकर भिजवाया था
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दीदी, दीदी, कभी-कभी मैं सोचता हूँ…
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वे भी तो मनुष्य ही होते हैं।
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जिन्होंने अंग्रेज़ों की हुकूमत से भारत को आज़ाद कराने
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वे बड़ी उत्सुकता से दादाजी को देख रहे थे।
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'बेकार की बात मत करो धनी!
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दस मिनट के बाद भेड़िया बोला, 'मज़ा आ गया! प्
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स्थिति काबू से बाहर हो रही थी।
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इन गर्दिशों के बादलों पे चढ़ के
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एक अजीब सी सिहरन सारे शरीर में दौड़ जाती है।
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जब वह थक जाता तो खुद को सीढ़ियों के जंगले पर फिसलते हुए देखता और
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'मैं भी बहुत अच्छे से चलता हूँ,' धनी भी अड़ गया।
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उसकी स्लेट टूट गई थी और
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एक-दो क्षण बाद रोटी के टुकड़े को धीरे-से हाथ से
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राजकीय सम्मान के साथ सुहास को मुखाग्नि दी गई थी।
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पढ़ने-लिखनेवालों में बड़ा आदर होता है और
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डर के मारे, जले हुए भेड़िए की जान निकल गई।
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उन्होंने दीवार पर झाँका जहाँ वह रोज़ टाँगें झुलाए बैठा रहता था
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गांधी पढ़ने के लिए लंदन चले गए.
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राजा ने आज्ञा दी कि तेनालीराम को हाथी के पांव से कुचलवाया जाए|
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साथ मिलकर 'खेड़ा जिला सहकारी समिति' शुरू की।
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तो उनकी दृष्टि तेनालीराम पर पड़ी जो अपने कुर्ते की जेब से
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तो अब तक पंडिताइन का कहीं पता न लगता।
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बधाई और बिदाई के अवसरों ही में नजर आया करते हैं।
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कलकत्ता से गांधी दिल्ली लौटे ताकि
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देखो तो आकाश कितना नीला दिखता है।
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उनमें तेल डालने के लिए तेली के घर भागा जाता है.
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क़रीब एक करोड़ लोगों को
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भैया क्या उठ गये,
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