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वह बच्चों से डरता है।
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‘तो बताते क्यों नहीं, कै पैसे का है?’
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इस युद्ध में विजय नगर के महाराज कृष्णदेव राय की विजय हुई|
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हम सब सारी रात जागेंगे।
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मुझे घबराहट और चिंता से गुस्सा आने लगा।
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मैंने अदरक, इलायची डालकर चाय बनाई और सबको चाय और बिस्कुट दिए।
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लम्बे पुलिसवाले ने घूर कर मुझे देखा।
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महाराज ने उसकी बातों पर विश्वास करके उसे 5000 सोने के सिक्के दे दिए|
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वह किसान के पास गया और बोला,
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थोड़ी देर बाद जुम्मन अलगू के
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मोहन ने रोटी के एक बड़े
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उसने फिर कर कहा - 'बुधगुप्त!'
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कुरियन को भारत सरकार ने
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इसको बंद कर देना चाहिए।'
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उसकी परीक्षा लेकर देखो तो ।़कहो, चंपा!
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'सत्या, ठीक से सोना,' दादाजी की आवाज़ आई।
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फेस्लर बताते हैं,
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‘कै पैसे में?’
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जहाँ विचार सच्चाई की गहराई से उपजतें हों।
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महाराज कृष्णदेव राय को अपनी तरफ से कुछ न कुछ उपहार दे रहे थे|
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बालकों से कम उत्साही नहीं है.
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उसका पेट हंडिया की तरह फूला हुआ था।
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चौधरी के अशुभचिंतकों की कमी न थी।
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तब यहाँ भी पंचायत शुरू हुई।
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बोलती नहीं,
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शिक्षक धीरे-धीरे वहाँ से निकले।
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बुधगुप्त को आज्ञा देकर देखो तो,
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निगम ने वहाँ मकान बनाने के लिए ठेकेदार को पेड़
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मैंने दौड़कर सीढ़ी खड़ी की और तेज़ी से ऊपर चढ़ा।
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पर क्या आपने कभी अपने शरीर की बात सुनी है?
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हर वीर था भारतवासी
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यदि पूर्णमासी के दिन यहाँ की यात्रा की
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अपने कोष का एक तिहाई,
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भारत भूमि के सबसे दक्षिण बिंदु पर स्थित
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तिस पर भी बचाव की युक्ति निकल सकती है।
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जगदीश प्रसाद बच्चों को पढ़ाने के लिए शहर में रहने लगे थे ।
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कांता ने रोते हुए मुंह फेर लिया और
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इस मुकदमें के लिए बड़े होशियार वकील की जरुरत है।
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करने को तैयार नहीं था.
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वह काफ़ी खुश दिख रहे थे।
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कहो न दीदी, हूँ न मैं समझदार?
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कन्याकुमारी जाने से पूर्व पर्यटक यहाँ
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पोरबंदर रियासत में 2 अक्टूबर
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तो वह कितनी प्रसन्न होंगी!
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आँखों में धूल झोंक दी, सत्यानाशी बैल गले बाँध दिया,
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'जिस आत्मविश्वास से उसने कहा एक बार फिर तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी।
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हवा, और क्या?
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दिन मुश्किल से कटता था ।
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'तेनालीराम, क्या तुम्हें पता नहीं है कि आज हम सब लोग जंगल में तालाब
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इससे पहले कि मैं उन्हें चेतावनी दे पाता, वे सीढ़ी से उलझकर गिर गए।
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शोरोगुल और हँसी मज़ाक के बगैर स्कूल कुछ भुतहा सा लग रहा था।
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और गांधी को जेल से रिहा करने
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वह गॉँव लिया तो था तुमने उन्हीं के रुपये से और उन्हीं के वास्ते?
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वह कहती है कि यह साल का वह समय है जब फसलें पक जाती हैं और
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बड़ी जोखिम का काम है, पर करना ही पड़ेगा।
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तो यह सच भी हो सकता है, चंपा!
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वे एक-एक करके आए।
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इतने आदमियों के सामने असत्य बात मुँह से निकल न सकी।
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उसे कोई बीमारी न थी।
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अपने पिता को भी इनके बीच देखकर धनी खुश हो गया।
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आवाज होने पर भी न चेतते.
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सारे शहर में इस मुकदमें की धूम थी।
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जो हार निश्चित हो,
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भरी हुई गलियों में वे नंगे पॉँव, स्
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मनु बाँसुरी बजाना सीखना चाहता है।
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वे कहते थे-इसका नाम पंचायत है !
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उसके आदमियों की तस्वीरें खींच रहे हैं|
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ये हम सबके हौसलों की जीत है।
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का प्राइवेट इम्तहान देने की
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वो ही देस
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यदि हम और पेड़ नहीं उगा सकते तो हमें उन्हें नष्ट भी नहीं करना चाहिए।
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बुधगुप्त के पूछने पर उसने कहा -
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अब अपनी आत्मा की रक्षा कर सकता हूँ।
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जिसका गोटा काला पड़ गया है,
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यह उसी की पुण्य-स्मृति है।
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कि उन्हें भारत की आज़ादी का
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सपनों के पत्ते कुछ उड़ गए तूफ़ान में बिना परों के आसमान दे गया मुझे।
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हट जाओ।' -
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हमें बारिश का इंतज़ार करना चाहिए।
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सबसे छोटे बच्चे एक छोर पर और लम्बे वाले दूसरे छोर पर।
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मोहनदास उन्हें छोड़कर अपनी पत्नी
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वह भी दोपहर तक, किसी ने वह भी नहीं,
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टाइगर मेरे पैरों के पास लेटा था।
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वह कभी थक सकता है?
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सूर्योदय तो किसी भी मौसम में देखा जा सकता है
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जहाँ विवेक की निर्मल धारा अंधविश्वासों के मरुथल की नकारात्मक रेत में ना खो गयी हो।
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का निर्माण किया जाता था।
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सावधानी से उसका कृपाण निकालकर,
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खेतों में कौए पंचायत कर रहे थे।
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ये बंटवारा धार्मिक आधार पर हुआ था.
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यहाँ कोई धन और पद नहीं देखता.
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इसके बाद तेलानी राम ने सैनिकों को सब परियों को लाने का आदेश दिया|
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मैंने अदरक, इलायची डालकर चाय बनाई और सबको चाय और बिस्कुट दिए।
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अल्लाह के बन्दे हंस दे
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ऐसा करते है कल सुबह ही निकल चलते है।'
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‘यह चिमटा कहाँ था?’
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'अच्छा होता, बुधगुप्त!
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'तुम्हारा घर कहाँ है?'
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परन्तु ललकार सुन कर वह सचेत हो जाता है।
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वह बाजार में निकलते तो दूकानदारों में
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