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दिन भर सोचकर गुजार दिए,गार्डन में बैठे हुए।
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स्कूल के अहाते के अन्दर खेल का मैदान उसे अच्छा लगता था।
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पास जाकर पुकारा - 'बड़कू, बड़कू!'
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उसे पीटा।
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एक-एक पग चलना दूभर था। हड्डियाँ निकल आयी थीं;
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क्या मैं तुम्हारी कुछ सहायता कर सकता हूं|
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अधर्म उनको क्यों नहीं खा जाता,
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और जब मैं परेशान हो जाता हूँ तो दूसरों को परेशान कर देता हूँ।'
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गांव के एक युवक ने कहा 'मैंने रेडियो पर सुना है
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डर्नेल हंट बताते हैं कि
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घर में रहकर बेचैन हो जाते हैं,
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शान्ति और दृढ़ता से उन्होंने उनको चेतावनी दी यदि पुलिसवाले नहीं गए तो
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रसोई से माँ के तले पकौड़ों की सुगन्ध आ रही है।
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कि मोरू उन्हें परेशान करेगा।
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मैंने भी बचपन से परियों की कल्पना की थी।
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ब्रिटिश साम्राज्य, भारत को आज़ाद
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वे कितने मज़े से शाम बिता रहे होंगे!
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एक दिन मीनू ने पेपर में एड देखा।
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जो भी हो कल फिर आएगा
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'मैं आपके साथ आ रहा हूँ।'
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'तो बुरा क्या हुआ, इस द्वीप की अधीश्वरी चंपारानी!'
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एक संवाददाता सीढ़ी को खड़ा करने लगा।
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जैसे ही मैं सोने की कोशिश करता, मुझे दादाजी का बिस्कुट चबाना और
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अचानक दादाजी धीरे-धीरे बोले,
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मैकेनिकल इंजीनियरिंग में
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मैं लौटकर सामान सँभालने लगा।
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काफी आगे बढ़ाकर गली के छोर की तरफ निहारा,
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जिनमें अधिकांश आस-पास के देहातों के जमींदार थे।
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'चंपा।'
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और कौतूहलपूर्वक भानुकुँवरि की तरफ ताकने लगे।
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कुछ याद उन्हें भी कर लो
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सब मिलकर कम पानी की फसल लगाने के साथ-साथ
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मुखर्जी ज़्यादा देर नहीं रुका।
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एक अजीब सी सिहरन सारे शरीर में दौड़ जाती है।
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दबी दबी आहों में
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जाओ एक पेन्सिल और कागज़ ले आओ।'
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अब बस्ती घनी होने लगी थी.
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जरा सोच कर बोले-इरादा तो मेरा कई बार हुआ,
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तौलिया या गमछा रखे हुए या मजबूती से
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जीप पेड़ की जड़ पर आकर रुकी।
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लिए अनेक गाड़ियाँ हैं,
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'ये भूरा वाला ले लेते हैं!' अनिल ने कहा।
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इसलिए हमेशा सकारात्मक बोलें.
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'कितने दिनों में हम लोग वहाँ पहुँचेंगे?'
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हिंदी हैं हम, वतन है हिन्दोसिताँ हमारा
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जब तक दानपत्र की रजिस्ट्री न हुई थी,
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दो संदर्भों में वहाँ के लोगों की किंवदंतियों
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बुरे का फल बुरा होता है।
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मैं लौटकर सामान सँभालने लगा।
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सामने शैलमाला की चोटी पर हरियाली में
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वह मोरू की माँ की तरफ़ देख कर हल्के से मुस्कराये।
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दादाजी ने मेरी बुद्धिमानी की प्रशंसा की।
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भक्तजन किसी अलौकिक शक्ति से
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लपक कर एक अँधेरी गली में घुस गये।
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जब हम बैठे थे घरों में
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रास्ते में ही एक हलवाई की दुकान थी।
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मुखर्जी ज़्यादा देर नहीं रुका।
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मन को समझाने लगे-मैं कैसा बौखल हूँ
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अपनी खुशी। जुम्मन मेरा पुराना मित्र है।
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यथार्थ बात यह है कि मुंशी सत्यनाराण ने
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अचानक उसकी आँखें भर आईं।
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मैंने दौड़कर सीढ़ी खड़ी की और तेज़ी से ऊपर चढ़ा।
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अनिल ने बड़े प्यार से वहाँ पिल्लों के ढेर से भूरा वाला पिल्ला उठाया।
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यह सोच वो शहर के सबसे बड़े हीरे के व्यापारी के पास गया।
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पर काम करती रहती है।
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तवे से रोटियाँ उतारती हैं,
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तालियों की गड़गड़ाहट कम नहीं हो रही थी।
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इसे आप लोग जानते ही होंगे।
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इसलिए मेरे लिए योजनाएँ बनाने में अपना समय व्यर्थ न करो।'
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सत्यनाराण को यह बड़ा नेकनीयत आदमी समझते थे।
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बिजली चमकी, बादल आए,
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एक बार की बात है कि राजा कृष्णदेव राय ने दरबार में जादू का खेल देखने की इच्छा प्रकट की|
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तो शायद मुझे शीघ्र ही अपने पद से पृथक होना पड़े,
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मुझे क्या उज्र होगा ?
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तो बहुत से लोग पुल बनवाने का ठेका पाने की जुगत में लग गए|
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तो आपने उसकी बात पर विश्वास करके उसे 5000 सोने के सिक्के कैसे दे दिए|
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वे एक गुण-सम्पन्न महिला हैं;
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स्त्रियॉँ क्रोध के बाद किसी न किसी बहाने रोया करती हैं।
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‘तीन पैसे दिए.’
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धक, धक, धक …
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जिन्होंने उस अबला के दुखड़े को
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अपने पिता की मौत के वक़्त
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अम्मा ज़ोर से बोलीं, 'मुझे वो वाला चाहिए! वो काला वाला।'
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जो प्रगल्भ होता है और
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तेनालीराम समझ गया कि यह घोषणा राजा ने उसे ढूंढने के लिए कराई है|
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तो उनकी दृष्टि तेनालीराम पर पड़ी जो अपने कुर्ते की जेब से
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जैसा मुंशी जी ने अनुमान किया था, पहरेदार का पता न था।
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वह दुखी मन से कांता को चाय पोहा दे रही थी
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कि हम एक ऐसे समय में रह रहे हैं,
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यही नहीं, भारतीय लोगों को नमक बनाने की मनाही है।
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अचानक दादाजी धीरे-धीरे बोले,
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कुछ खाया, न पिया.
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निशा बचपन से ही अपने माँ रश्मि के कष्टों को देखती चली आ रही थी।
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ना आज तक ऐसा करतब किसी ने देखा हो'|
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उन सबों ने चंपा को वनदेवी-सा सजाया था।
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लेकिन उस दिन उसके पास ज्यादा पैसे नहीं थे,
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गुडुब! चोरू पानी में गिर गया।
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टहनी हिली पत्ते हिले,
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शादी कस्तूरबा से कर दी गई.
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पानी गरम हो रहा था। उन्होंने दरवाज़ा थोड़ा-सा और खोला।
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