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0.02
20.5
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12
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धम्म!किच्चू ज़मीन पर गिर पड़ा।
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सब अंक उसकी ओर हाथ हिला रहे होते।
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पूरे 10 साल से मैं इस कुबड़ेपन को झेल रहा था|
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इस घाट पर श्रद्धालु स्नान करते हैं।
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छोटी मुनिया ने कुछ देर सोचा।
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जो एक सरल हृदय और
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उन्होंने एक तश्तरी नीचे फेंकी जो मुखर्जी के बक्से पर गिरी।
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तुम्हें क्या हो गया है? तुम्हारे आगे बाल-बच्चे हैं।
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इन्हीं में एक सरदार था कि सबको सँभाल लिया।
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उसके हौसलों को पर दे दिए थे|
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तो उनके लिए सबसे अच्छा अवसर वह था जब पंडित भृगुदत्त का स्वर्गवास हुआ था।
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अपने कला को ऐसे ही व्यर्थ होने नहीं दिया|
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न ही कोई उसे अपने मन का काम करने से रोक सकता था।
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मैं जी भरकर हँसा।
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शोरगुल सुन कर गाँव के भलेमानस जमा हो गये।
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पुलिस जीप मेरे पास आकर रुकी।
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चट मँगनी पट ब्याह हुआ और
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इनकी बला से, ये तो सेवैयाँ खाएँगे.
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ॠण आवेश हो जाता है।
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उसने दुकानदार से पूछा,
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मैंने उन्हें ता-हयात खाना-कपड़ा देना कबूल किया था।
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हट जाओ।' -
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वे सड़क की नारंगी रोशनी में किताब पढ़ रहे थे।
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गांधी पढ़ने के लिए लंदन चले गए.
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फिर उसकी दृष्टि ओसारे में अध-टूटे खटोले
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हम राजनीतिक ध्रुवीकरण के एक युग में जी रहे हैं,
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'हाँ, खा चुका।'
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जब देश में थी दीवाली
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वे बूढ़े और कमज़ोर थे लेकिन उनकी इच्छा शक्ति मज़बूत थी।
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जो बाहर निकल गये थे, दौड़ कर आ गये।
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बर्तनो का व्यापारी बोला
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दुनिया की हर चीज पर पहले की तरह धडल्ले से बात करे।
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आकाश में मोटर साइकिल चालकों का एक गुट है।
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इंसान को भूल जाते हैं?
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व अन्य सामग्री खरीदी जा सकती है।
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वह गॉँव लिया तो था तुमने उन्हीं के रुपये से और उन्हीं के वास्ते?
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आणंद में एक छोटे से गैराज
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नालियों में बही चली जाती थी।
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उनके गांव के साथ-साथ आस-पास के सभी गांव वालों ने उस दिन उन्हें सम्मानित करने की योजना बनाई।
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अचानक उसकी आँखें भर आईं।
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देखभाल में रखा गया उनकी सेहत काफी बेहतर थी.'
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वह बहुत दूर तक सिंधु-जल में निमग्न थी।
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'सर मुझे भी ऑडिशन का फॉर्म भरना है।'
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फिर झट-से उठ बैठा।
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बोलो चौधरी;
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अंतिम यात्रा निकली,
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वहां के नटाल सूबे में गांधी ने भारतीयों को
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अन्न और नमकीन चीजों से तबीयत ऊब भी गई है।
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मैं जीते-जी आपकी सेवा से मुँह न मोडूँगा।
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और ज़िद पर उतर आते हैं,
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केवल विचार मिलते थे।
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कि पहला नगर कब छूटा?
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राजा इन बातों पर विचार कर ही रहे थे कि तेनालीराम ने दरबार में आकर
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तय करने वाली एक्सप्रेस गाड़ी है।
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प्रकृति का पुरुष से लड़ने का साहस हुआ।
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बड़ी जोखिम का काम है, पर करना ही पड़ेगा।
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आशीर्वाद के फूलों और खीलों को बिखेर दिया।
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यह सुनकर महाराज कृष्णदेव राय समझ गए कि
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ऐसे न्यायप्रिय, दयालु, दीन-वत्सल पुरुष बहुत कम थे,
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बाँस के साथ ऊँचे टाँग देती थी।
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उसे हर घड़ी यही चिंता रहती थी कि
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सब जल तरल है; सब पवन शीतल है।
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इन्हें अपनाओ।
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'देखो बच्चे, तुम इस पचड़े से दूर रहो।'
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तथापि उनका मन कहता था कि सच्ची बात किसी से छिपी नहीं है।
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धनी और बिन्नी लगातार उनके पीछे-पीछे चल रहे थे।
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मां.. भगवान ने मुझे क्यों इतना काला बनाया है?
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'सर मुझे भी ऑडिशन का फॉर्म भरना है।'
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सोमवार की सुहानी सुबह थी।
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से दो-दो चांटे और लगाए.
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वे बड़ी उत्सुकता से दादाजी को देख रहे थे।
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अपने पिता को भी इनके बीच देखकर धनी खुश हो गया।
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उन्हीं की चाकरी में मरुँगा भी।
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धूप अत्यंत तेज थी और कभी एक-दो व्यक्ति सिर पर
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बुधगुप्त ने झुककर हाथ बढ़ाया।
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लेकिन वह लड़की को फ़ोटो खींचने से रोक नहीं पाई।
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कितने ही रईसों को भानुकुँवरि ने साथी बनाया था।
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तुम स्वदेश लौट जाओ,
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दूर से किसी आटे की चक्की की
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अगली सर्दी की छुट्टियों में मैं या तो शिमला जाना चाहती हूँ
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क्या सोचते हो मुन्ने राजा, तुम क्या सोचते हो?
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बैलों की एक बहुत अच्छी गोई मोल लाये थे।
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मीनू बड़ी होती गई।
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उन्हें इस बुढ़ापे में मेहनत करते हुए देखकर गांव के कुछ लोग बोले
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निन्दा-अपमान उनसे सहन नहीं हो सकता है।
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वह थी - कोमलता!
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समझू को उचित है कि बैल का पूरा दाम दें।
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वह एक स्थानीय दैनिक समचार पत्र के दफ्तर में
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राजा कृष्णदेव राय, तेनालीराम को आश्चर्य से देखते रहे|
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चंद्रकांत मणि ही तरह द्रवित हुआ।
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जैसे मिठाई की खुशबू का आनंद लेने मिठाई खाने के बराबर ही है,
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जिसके नीचे सीढ़ियों वाला घाट है,
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सब हलवाई मुंशी जी को पहचानते थे,
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वह हत्या नहीं करने देंगे|
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ईश्वर का दंड माना था.
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दोनों के ही चेहरे कठोर लग रहे थे।
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तालियों की गड़गड़ाहट कम नहीं हो रही थी।
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वह उसके स्वामी की चीज समझी जाए।
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सहसा उस बंदी ने कहा-
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लेकिन यह भी बात थी कि
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