audio audioduration (s) 0.02 20.5 | transcription stringlengths 3 119 | file_name stringlengths 12 12 |
|---|---|---|
धम्म!किच्चू ज़मीन पर गिर पड़ा।
| sample_50000 | |
सब अंक उसकी ओर हाथ हिला रहे होते।
| sample_50001 | |
पूरे 10 साल से मैं इस कुबड़ेपन को झेल रहा था|
| sample_50002 | |
इस घाट पर श्रद्धालु स्नान करते हैं।
| sample_50003 | |
छोटी मुनिया ने कुछ देर सोचा।
| sample_50004 | |
जो एक सरल हृदय और
| sample_50005 | |
उन्होंने एक तश्तरी नीचे फेंकी जो मुखर्जी के बक्से पर गिरी।
| sample_50006 | |
तुम्हें क्या हो गया है? तुम्हारे आगे बाल-बच्चे हैं।
| sample_50007 | |
इन्हीं में एक सरदार था कि सबको सँभाल लिया।
| sample_50008 | |
उसके हौसलों को पर दे दिए थे|
| sample_50009 | |
तो उनके लिए सबसे अच्छा अवसर वह था जब पंडित भृगुदत्त का स्वर्गवास हुआ था।
| sample_50010 | |
अपने कला को ऐसे ही व्यर्थ होने नहीं दिया|
| sample_50011 | |
न ही कोई उसे अपने मन का काम करने से रोक सकता था।
| sample_50012 | |
मैं जी भरकर हँसा।
| sample_50013 | |
शोरगुल सुन कर गाँव के भलेमानस जमा हो गये।
| sample_50014 | |
पुलिस जीप मेरे पास आकर रुकी।
| sample_50015 | |
चट मँगनी पट ब्याह हुआ और
| sample_50016 | |
इनकी बला से, ये तो सेवैयाँ खाएँगे.
| sample_50017 | |
ॠण आवेश हो जाता है।
| sample_50018 | |
उसने दुकानदार से पूछा,
| sample_50019 | |
मैंने उन्हें ता-हयात खाना-कपड़ा देना कबूल किया था।
| sample_50020 | |
हट जाओ।' -
| sample_50021 | |
वे सड़क की नारंगी रोशनी में किताब पढ़ रहे थे।
| sample_50022 | |
गांधी पढ़ने के लिए लंदन चले गए.
| sample_50023 | |
फिर उसकी दृष्टि ओसारे में अध-टूटे खटोले
| sample_50024 | |
हम राजनीतिक ध्रुवीकरण के एक युग में जी रहे हैं,
| sample_50025 | |
'हाँ, खा चुका।'
| sample_50026 | |
जब देश में थी दीवाली
| sample_50027 | |
वे बूढ़े और कमज़ोर थे लेकिन उनकी इच्छा शक्ति मज़बूत थी।
| sample_50028 | |
जो बाहर निकल गये थे, दौड़ कर आ गये।
| sample_50029 | |
बर्तनो का व्यापारी बोला
| sample_50030 | |
दुनिया की हर चीज पर पहले की तरह धडल्ले से बात करे।
| sample_50031 | |
आकाश में मोटर साइकिल चालकों का एक गुट है।
| sample_50032 | |
इंसान को भूल जाते हैं?
| sample_50033 | |
व अन्य सामग्री खरीदी जा सकती है।
| sample_50034 | |
वह गॉँव लिया तो था तुमने उन्हीं के रुपये से और उन्हीं के वास्ते?
| sample_50035 | |
आणंद में एक छोटे से गैराज
| sample_50036 | |
नालियों में बही चली जाती थी।
| sample_50037 | |
उनके गांव के साथ-साथ आस-पास के सभी गांव वालों ने उस दिन उन्हें सम्मानित करने की योजना बनाई।
| sample_50038 | |
अचानक उसकी आँखें भर आईं।
| sample_50039 | |
देखभाल में रखा गया उनकी सेहत काफी बेहतर थी.'
| sample_50040 | |
वह बहुत दूर तक सिंधु-जल में निमग्न थी।
| sample_50041 | |
'सर मुझे भी ऑडिशन का फॉर्म भरना है।'
| sample_50042 | |
फिर झट-से उठ बैठा।
| sample_50043 | |
बोलो चौधरी;
| sample_50044 | |
अंतिम यात्रा निकली,
| sample_50045 | |
वहां के नटाल सूबे में गांधी ने भारतीयों को
| sample_50046 | |
अन्न और नमकीन चीजों से तबीयत ऊब भी गई है।
| sample_50047 | |
मैं जीते-जी आपकी सेवा से मुँह न मोडूँगा।
| sample_50048 | |
और ज़िद पर उतर आते हैं,
| sample_50049 | |
केवल विचार मिलते थे।
| sample_50050 | |
कि पहला नगर कब छूटा?
| sample_50051 | |
राजा इन बातों पर विचार कर ही रहे थे कि तेनालीराम ने दरबार में आकर
| sample_50052 | |
तय करने वाली एक्सप्रेस गाड़ी है।
| sample_50053 | |
प्रकृति का पुरुष से लड़ने का साहस हुआ।
| sample_50054 | |
बड़ी जोखिम का काम है, पर करना ही पड़ेगा।
| sample_50055 | |
आशीर्वाद के फूलों और खीलों को बिखेर दिया।
| sample_50056 | |
यह सुनकर महाराज कृष्णदेव राय समझ गए कि
| sample_50057 | |
ऐसे न्यायप्रिय, दयालु, दीन-वत्सल पुरुष बहुत कम थे,
| sample_50058 | |
बाँस के साथ ऊँचे टाँग देती थी।
| sample_50059 | |
उसे हर घड़ी यही चिंता रहती थी कि
| sample_50060 | |
सब जल तरल है; सब पवन शीतल है।
| sample_50061 | |
इन्हें अपनाओ।
| sample_50062 | |
'देखो बच्चे, तुम इस पचड़े से दूर रहो।'
| sample_50063 | |
तथापि उनका मन कहता था कि सच्ची बात किसी से छिपी नहीं है।
| sample_50064 | |
धनी और बिन्नी लगातार उनके पीछे-पीछे चल रहे थे।
| sample_50065 | |
मां.. भगवान ने मुझे क्यों इतना काला बनाया है?
| sample_50066 | |
'सर मुझे भी ऑडिशन का फॉर्म भरना है।'
| sample_50067 | |
सोमवार की सुहानी सुबह थी।
| sample_50068 | |
से दो-दो चांटे और लगाए.
| sample_50069 | |
वे बड़ी उत्सुकता से दादाजी को देख रहे थे।
| sample_50070 | |
अपने पिता को भी इनके बीच देखकर धनी खुश हो गया।
| sample_50071 | |
उन्हीं की चाकरी में मरुँगा भी।
| sample_50072 | |
धूप अत्यंत तेज थी और कभी एक-दो व्यक्ति सिर पर
| sample_50073 | |
बुधगुप्त ने झुककर हाथ बढ़ाया।
| sample_50074 | |
लेकिन वह लड़की को फ़ोटो खींचने से रोक नहीं पाई।
| sample_50075 | |
कितने ही रईसों को भानुकुँवरि ने साथी बनाया था।
| sample_50076 | |
तुम स्वदेश लौट जाओ,
| sample_50077 | |
दूर से किसी आटे की चक्की की
| sample_50078 | |
अगली सर्दी की छुट्टियों में मैं या तो शिमला जाना चाहती हूँ
| sample_50079 | |
क्या सोचते हो मुन्ने राजा, तुम क्या सोचते हो?
| sample_50080 | |
बैलों की एक बहुत अच्छी गोई मोल लाये थे।
| sample_50081 | |
मीनू बड़ी होती गई।
| sample_50082 | |
उन्हें इस बुढ़ापे में मेहनत करते हुए देखकर गांव के कुछ लोग बोले
| sample_50083 | |
निन्दा-अपमान उनसे सहन नहीं हो सकता है।
| sample_50084 | |
वह थी - कोमलता!
| sample_50085 | |
समझू को उचित है कि बैल का पूरा दाम दें।
| sample_50086 | |
वह एक स्थानीय दैनिक समचार पत्र के दफ्तर में
| sample_50087 | |
राजा कृष्णदेव राय, तेनालीराम को आश्चर्य से देखते रहे|
| sample_50088 | |
चंद्रकांत मणि ही तरह द्रवित हुआ।
| sample_50089 | |
जैसे मिठाई की खुशबू का आनंद लेने मिठाई खाने के बराबर ही है,
| sample_50090 | |
जिसके नीचे सीढ़ियों वाला घाट है,
| sample_50091 | |
सब हलवाई मुंशी जी को पहचानते थे,
| sample_50092 | |
वह हत्या नहीं करने देंगे|
| sample_50093 | |
ईश्वर का दंड माना था.
| sample_50094 | |
दोनों के ही चेहरे कठोर लग रहे थे।
| sample_50095 | |
तालियों की गड़गड़ाहट कम नहीं हो रही थी।
| sample_50096 | |
वह उसके स्वामी की चीज समझी जाए।
| sample_50097 | |
सहसा उस बंदी ने कहा-
| sample_50098 | |
लेकिन यह भी बात थी कि
| sample_50099 |
End of preview. Expand in Data Studio
README.md exists but content is empty.
- Downloads last month
- 4