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san_Deva | hin_Deva | क्षयति - क्षि-धातोः लटि प्रथमपुरुषैकवचने क्षयति इति रूपम्। | क्षयति - क्षि-धातु से लट् प्रथमपुरुष एकवचन में क्षयति यह रूप बना। |
kan_Knda | san_Deva | ಸೂತ್ರದ ವಿವರಣೆ - ಆರು ವಿಧದ ಪಾಣಿನೀಯಸೂತ್ರಗಳಲ್ಲಿ ಇದು ವಿಧಿಸೂತ್ರವಾಗಿದೆ. | सूत्रव्याख्या - संज्ञा-परिभाषा-विधि-नियम-अतिदेश-अधिकारात्मकेषु षड्विधेषु पाणिनीयसूत्रेषु इदं विधिसूत्रम्। |
san_Deva | kan_Knda | ' तन्मे वि चष्टे सवितायमर्यः ' ( १० - ३४ - १३ ) । | "ತನ್ಮೇ ವಿ ಚಷ್ಟೇ ಸವಿತಾಯಮರ್ಯಃ" (೧೦-೩೪-೧೩)। |
san_Deva | kan_Knda | तदेव अस्मिन् मन्त्रे उच्यते। | ಅದರ ವರ್ಣನೆಯನ್ನು ಈ ಮಂತ್ರದಲ್ಲಿ ಮಾಡಲಾಗಿದೆ. |
hin_Deva | kan_Knda | मृत्यु को भगाने के लिए एक विशिष्ट याग का ग्यारहवें अध्याय में विस्तृत विवरण दिया है। | ಮೃತ್ಯುವನ್ನು ಓಡಿಸಲು ಒಂದು ವಿಶಿಷ್ಟ ಯಾಗದ ಹನ್ನೆರಡನೆಯ ಅಧ್ಯಾಯದಲ್ಲಿ ವಿಸ್ತೃತವಾದ ವಿವರಣೆಯನ್ನು ಕೊಡಲಾಗಿದೆ. |
kan_Knda | san_Deva | ಯಾವಾಗ ಇದು ಕುರ್ಮಃ ಅಂಗಾನಿ ಎಂಬಂತೆ ಎಲ್ಲ ಇಂದ್ರಿಯಗಳ ಇಂದ್ರಿಯಾರ್ಥಗಳ ಸಂಹರಿಸುವಂತೆ ಅದರ ಪ್ರಜ್ಞೆಯು ಪ್ರತಿಷ್ಠಿತವಾಗುವುದು. | यदा अयं कुर्मः अङ्गानि इव सर्वशः इन्द्रियाणि इन्द्रियार्थभ्यः संहरते तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता भवति इति । |
san_Deva | hin_Deva | तिङ्प्रत्ययः येषाम् अन्ते अस्ति, तानि तिङन्तपदानि। | तिङय्रत्यय जिनके अन्त में है, वे तिङन्त पद है। |
san_Deva | kan_Knda | "नञस्तत्पुरुषात्" इति सूत्रमनुवर्तते। | "ನಜ್ಞ್ಸ್ತತ್ಪುರುಷಾತ್" ಸೂತ್ರದ ಅನುವೃತ್ತಿ ಬರುತ್ತದೆ. |
hin_Deva | san_Deva | 6. श्रद्धा को स्पष्ट कीजिए। | ६. श्रद्धाम् स्पष्ठीकुरुत। |
kan_Knda | san_Deva | ನಾಲ್ಕನೇ, ಐದನೇ ಮತ್ತು ಆರನೇ ಅಧ್ಯಾಯಗಳಲ್ಲಿ ಐತರೇಯ ಉಪನಿಷತ್ತುಗಳು ಇವೆ. | चतुर्थ, पञ्चम, षष्ठाध्यायेषु ऐतरेयोपनिषद् अस्ति। |
hin_Deva | san_Deva | सूत्र की व्याख्या- यह विधिसूत्र है। | सूत्रव्याख्या- इदं विधिसूत्रम्। |
kan_Knda | hin_Deva | ಈ ಶಬ್ದವು ಅಜ್ಞಂತವಾಗಿದೆ. | यह शब्द अञन्त है। |
kan_Knda | hin_Deva | ನಿರುಕ್ತಾದಿ ಗ್ರಂಥಗಳಲ್ಲಿ "ಇತಿ ವಿಜ್ಞಾಯತೆ" ಎಂದು ಹೇಳಿ ಬ್ರಾಹ್ಮಣ ಗ್ರಂಥಗಳ ಪ್ರಮಾಣರೂಒಅವಾಗಿ ನಿರ್ದೇಶವನ್ನು ಮಾಡಬೇಕು. | निरुक्त आदि ग्रन्थ इस प्रकार जाना जाता है ऐसा कहकर ब्राह्मण ग्रन्थों का ही प्रमाण रूप से निर्देश किया है। |
san_Deva | kan_Knda | तस्य सप्तम्येकवचने व्युष्टौ इति रूपम्। | ಅದರ ಏಳನೇ ವಿಭಕ್ತಿ ಏಕವಚನದಲ್ಲಿ ವ್ಯುಷ್ಟೌ ಎಂದು ರೂಪವು. |
hin_Deva | kan_Knda | केवल समास, अव्ययीभावसमास, तत्पुरुष समास, द्वन्द्व समास, बहुब्रीहि समास। | ಕೇವಲಸಮಾಸ, ಅವ್ಯಯೀಭಾವ ಸಮಾಸ , ತತ್ಪುರುಷ ಸಮಾಸ , ದ್ವಂದ್ವ ಸಮಾಸ, ಬಹಿವೀಹಿ ಸಮಾಸ. |
san_Deva | hin_Deva | ४.उपासना कर्महेतुः कः भवति। | 4. उपासना कर्म का हेतु क्या होता है? |
hin_Deva | kan_Knda | फिषोऽन्त उदात्तः इस सूत्र कौ व्याख्या कोजिए। | ಫಿಷೋಂತ ಉದಾತ್ತಃ ಈ ಸೂತ್ರವನ್ನು ವ್ಯಾಖ್ಯಾನಿಸಿ. |
san_Deva | kan_Knda | 13. तृतीया। | ೧೩. ತೃತೀಯಾ ವಿಭಕ್ತಿಯಲ್ಲಿ. |
hin_Deva | san_Deva | वो ही स्रष्टा और सृष्टि का आदिपुरुष है। | स एव हि स्रष्टा सृष्टेरादिपुरुषश्च। |
kan_Knda | hin_Deva | ಸೂತ್ರದ ಅವತರಣೆ - ಫಿಟ್ ರೂಪದ ಪ್ರಾತಿಪದಿಕದ ಅಂತ್ಯ ಉದಾತ್ತ ವಿಧಾನಕ್ಕಾಗಿ ಈ ಸೂತ್ರವನ್ನು ರಚಿಸಲಾಗಿದೆ . | सूत्र का अवतरण - फिट्-रूप प्रातिपदिक के अन्त्य का उदात्त विधान के लिए इस सूत्र की रचना कौ है। |
kan_Knda | san_Deva | ಅಮೋಘನಂದಿನೀಶಿಕ್ಷಾ - ಈ ಗ್ರಂಥದಲ್ಲಿ ನೂರಾಮೂವತ್ತು(೧೩೦)ಶ್ಲೋಕಗಳಿವೆ. | अमोघानन्दिनीशिक्षा- अस्मिन् ग्रन्थे त्रिंशदधिकशतं (१३०) श्लोकाः सन्ति। |
san_Deva | kan_Knda | अत एव हरिः तौ हन्तुम् आर्हत्। तदुक्तं सप्तशत्यां - तावप्यतिबलोन्मत्तौ महामायाविमोहितौ। | ಆದ್ದರಿಂದಲೇ ಹರಿಯು ಅವನನ್ನು ಕೊಲ್ಲಲು ಇಚ್ಛಿಸಿದನು ಮತ್ತು ಸಪ್ತಶತಿಯಲ್ಲಿ ಹೇಳಲಾಗಿದೆ - ತಾವಪ್ಯತಿಬಲೋನ್ಮತ್ತೌ ಮಹಾಮಾಯಾವಿಮೋಹಿತೌ । |
kan_Knda | san_Deva | ಯಜ್ಞಸ್ಯ ಕರ್ಮ ಯಜ್ಞಕರ್ಮ ಎಂದು ಷಷ್ಠೀತತ್ಪುರುಷಸಮಾಸ. ತಸ್ಮಿನ್ ಯಜ್ಞಕರ್ಮಣಿ ಎಂದು. | यज्ञस्य कर्म यज्ञकर्म इति षष्ठीतत्पुरुषसमासः, तस्मिन् यज्ञकर्मणि इति। |
san_Deva | hin_Deva | अथाश्वस्य वालोऽनायासेन मोक्षाकादीन्निवारयति तद्वत् वृत्रमगणयित्वा निराकृतवानित्यर्थः। | जैसे घोड़े की पूंछ के बाल मक्खी आदि को हटाने के लिए इधर उधर होती है, वैसे ही तुम ने भी वृत्रगण का निराकरण किया यह अर्थ है। |
hin_Deva | san_Deva | अर्थात् परिनिष्ठिततत्व के अभाव में जो विग्रह लोक में प्रयोग नहीं होता है वह अलौकिक विग्रह है। | अर्थात् परिनिष्ठितत्वाभावाद् यः विग्रहः लोके प्रयोगार्ह नास्ति सः अलौकिकविग्रहः। |
kan_Knda | san_Deva | ಅವ್ಯಯಸಂಜ್ಞಾ ಆದಾಗ "ಅವ್ಯಯಾದಾಪ್ಸುಪಃ" ಇದರಿಂದ ಸುಪ್ ಇದರ ಲುಕ್ ಆಗುತ್ತದೆ. | अव्ययसंज्ञायां सत्याम् "अव्ययादाप्सुपः" इत्यनेन सुपो लुक् प्राप्नोति। |
san_Deva | hin_Deva | सरलार्थः - अतिष्ठतः उपवेशनरहितस्य जलमध्ये पततः नामरहितस्य वृत्रस्य शरीरं जलम् अतिक्रामति। | सरलार्थ - किसी निश्चित स्थान के रहित जल के मध्य में गिरे हुए नामरहित वृत्र के शरीर को जल अतिक्रमण करता है। |
hin_Deva | san_Deva | शरवे - शृ-धातु से उ प्रत्यय करने पर शरु: हुआ इसके बाद चतुर्थी एकवचन में शरवे यह रूप बना। | शरवे- शृ-धातोः उप्रत्यये शरुः इति जाते चतुर्थ्येकवचने शरवे इति रूपम्। |
hin_Deva | kan_Knda | भ्रान्ति निमित्त तो सभी उपपादित होता है। | ಭ್ರಾಂತಿ ನಿಮಿತ್ತವು ಎಲ್ಲದರಲ್ಲಿಯು ಉಪಪಾದಿತವಾಗುತ್ತದೆ. |
hin_Deva | san_Deva | उसके गोत्रापत्यं स्त्री (कारीषगन्धि की पुत्री) कारीषगन्ध्या रूप बना। | तस्य गोत्रापत्यं स्त्री कारीषगन्ध्या इति। |
hin_Deva | san_Deva | अतः प्रकृत सूत्र से यूपदारु यहाँ पर यूप इस पूर्वपद में प्रकृति स्वर होता है। | अतः प्रकृतसूत्रे यूपदारु इत्यत्र यूप इति पूर्वपदे प्रकृतिस्वरः भवति। |
san_Deva | hin_Deva | देवानां पूजकः देवपूजकः, देवपूजकः ब्राह्मणः देवब्राह्मणः । | देवानां पूजकः देवपूजकः (देवताओं के पूजक) देवपूजक, देवपूजकः ब्राह्मणः देवब्राह्मणः। |
hin_Deva | san_Deva | उसके प्रति कहा गया है कि- न तो उसका समानजातीयत्व वाला और न ही भिन्न जातीयत्व वाला नियम है। | तावत्समानजातीयम् एवारभते, न भिन्नजातीयमिति नियमोऽस्ति । |
san_Deva | hin_Deva | मनसः शमः क्रियते। | मन का शम किया जाता है। |
hin_Deva | san_Deva | इस पाठ में निष्कामकर्मयोग की उपासना का विषय मुख्यरूप से वर्णित है। | अस्मिन् पाठे निष्कामकर्मयोगः उपासना चेति विषयः प्रामुख्येन वर्णितः। |
hin_Deva | kan_Knda | (अचाम् निर्धारणे षष्ठी) औरा सूत्र है जित् और गित् तद्धित पर में अचों में आदि अच की वृद्धि होती है। | (ಅಚಾಮ್ ನಿರ್ಧಾರಣೆ ಷಷ್ಠೀ) ಮತ್ತು ಸೂತ್ರದ ಅರ್ಥವಾಗುತ್ತದೆ - " ಞಿತಿ ಣಿತಿ ಮತ್ತು ತದ್ಧಿತದ ನಂತರದಲ್ಲಿ ಅಚಾಮ್ ಆದೇಃ ಅಚಃ ಇದರ ವೃದ್ಧಿಯು ಆಗುತ್ತದೆ. |
hin_Deva | kan_Knda | (क) मुमुक्षुत्व (ख) विवेक (ग) प्रयोजन (घ) वैराग्य 11. यह साधन चतुष्टय में अन्यतम होता हे? | (ಕ) ಮುಮುಕ್ಶುತ್ವ (ಖ) ವಿವೇಕ (ಗ) ಪ್ರಯೋಜನ (ಘ) ವೈರಾಗ್ಯ. ೧೧. ಇದು ಸಾಧನಚತುಷ್ಟಯಗಳಲ್ಲಿ ಒಂದು. |
san_Deva | hin_Deva | काष्ठादिगणे काष्ठा दारुण अमातापुत्र वेश अनाज्ञात अनुज्ञात अपुत्र अयुत अद्भुत भृश घोर सुख कल्याण अनुक्त इत्यादयः शब्दाः पठिताः। | काष्ठादिगण में काष्ठा, दारुण, अमातापुत्र, वेश, अनाज्ञात, अनुज्ञात, अपुत्र, अयुत, अद्भुत, भृश, घोर, सुख, कल्याण, अनुक्त, इत्यादि शब्द पढ़े गए। |
san_Deva | kan_Knda | अत एव यस्मिन् अनुदात्ते परे सति उदात्तस्य लोपः जायते, तस्य अनुदात्तस्य उदात्तः भवति इति सूत्रार्थः लभ्यते। | ಆದ್ದರಿಂದ ಯಾವ ಅನುದಾತ್ತದ ನಂತರವಿರುವ ಉದಾತ್ತದ ಲೋಪವಾಗುತ್ತದೆಯೋ, ಆ ಅನುದಾತ್ತಕ್ಕೆ ಉದಾತ್ತವಾಗುತ್ತದೆ ಈ ಸೂತ್ರಾರ್ಥವು ಲಭ್ಯವಾಗುತ್ತದೆ. |
san_Deva | kan_Knda | पशुम् उद्दिश्य अस्मिन् प्रसङ्गे ऋक्संहितायाः एकः ऋङ्मन्त्रः उल्लिख्यते - "न वा उ एतन्म्रियसे न रिष्यसि देवा - इदेसि पथिभिः सुगेभिः।" | ಪಶುವನ್ನು ಉದ್ದೇಶಿಸಿ ಈ ಪ್ರಸಂಗದಲ್ಲಿ ಋಕ್ಸಂಹಿತೆಯ ಒಂದು ಋಙ್ಮಂತ್ರವನ್ನು ಉಲ್ಲೇಖಿಸುತ್ತಾರೆ - "ನ ವಾ ಉ ಏತನ್ಮ್ರಿಯಸೇ ನ ರಿಷ್ಯಸಿ ದೇವಾ - ಇದೇಸಿ ಪಥಿಭಿಃ ಸುಗೇಭಿಃ". |
kan_Knda | san_Deva | ಏನಾದರು ನಿಧಿಧ್ಯಾಸನದ ಭೇದದಿಂದ ಸಮಾಧಿಯ ಉಪನ್ಯಾಸವಾದರೆ ದ್ರಷ್ಟವ್ಯಾದಿಗಳು ಶೃತಿಯ ಅಪಲಾಪವಾಗುತ್ತದೆ. | यदि च निदिध्यासनाद् भेदेन समाधेः उपन्यासो भवति तर्हि द्रष्टव्यादिश्रुतेः अपलापः स्यात्। |
san_Deva | hin_Deva | सूत्रावतरणम्- यस्य शतृप्रत्ययस्य नुमागमः न भवति तदन्तात् अन्तोदात्तात् परा या नदी अजादिश्च शसादिः विभक्तिः तस्य उदात्तत्वविधानार्थं सूत्रमिदं प्रणीतं महर्षिणा पाणिनिना। | सूत्र का अवतरण- जिस शतृ प्रत्यय को नुम आगम नहीं होता है, तदन्त अन्तोदात्त से परे जो नदी प्रत्यय और अजादि शस आदि विभक्ति उसको उदात्त विधान के लिए इस सूत्र की रचना की है महर्षि पाणिनि । |
san_Deva | hin_Deva | ब्राह्मणशब्दस्य अपरः अपि अर्थो भवति- यज्ञः। | ब्राह्मण शब्द का अन्य अर्थ भी होता है - यज्ञ। |
kan_Knda | hin_Deva | ಅನುಪಸರ್ಜನವಾಗಿದೆ ಮತ್ತು ಅದಂತವಾಗಿದೆ. | अनुपसर्जन है और अदन्त है। |
kan_Knda | hin_Deva | ಅಸಂಭಾವನೆಯು ಪ್ರಮಾಣ ಮತ್ತು ಪ್ರಮೇಯಗಳಿಂದ ದೃಢೀಕರಿಸುವಂಥವುಗಳಾಗಿದೆ. | असम्भावना प्रमाणगत तथा प्रमेयगत होता है। |
hin_Deva | san_Deva | और उसके बाद सूर्य को, उषःकाल को, और आकाश निर्माण किया। | दनन्तरं सूर्य, उषःकालम्, आकाशं च सृष्टवान्। |
kan_Knda | hin_Deva | ಅದ್ವೈತದಲ್ಲಿ ಮುಕ್ತಿಯು ಎರಡು ಪ್ರಕಾರವಾಗಿರುತ್ತದೆ. | अद्वैत में मुक्ति दो प्रकार की होती है। |
san_Deva | kan_Knda | तत्र पुष्करिण्यां मां पालयतु। | ಆ ಸರೋವರದಲ್ಲಿ ನನ್ನ ಪಾಲನೆಯನ್ನು ಮಾಡು. |
kan_Knda | san_Deva | ಹೀಗೆ ಜಪ-ನ್ಯೂಂಖ-ಸಾಮಭಿನ್ನವಾದ ಯಜ್ಞಸಂಬಂಧಿಮಂತ್ರಗಳಲ್ಲಿ ಏಕಶ್ರುತಿಸ್ವರವು ಆಗುತ್ತದೆ. | अत्रोच्यते यदि एतङद्भिन्ने यज्ञसम्बन्धिनि कर्मणि मन्त्राणां प्रयोगो भवति, तर्हि तेषां मन्त्राणाम् ऐकश्रुत्यं भवति इति। |
san_Deva | hin_Deva | समाधिद्वैविध्यम् समाधिः द्विविधः । | समाधि के दो प्रकार समाधि के दो प्रकार होते है। |
san_Deva | hin_Deva | अत एवाथर्वशब्दस्यार्थो भवति- अकुटिलवृत्त्या, अहिंसावृत्त्या च मनसः स्थैर्यस्य प्रापकः इति। | इसलिए ही अथर्व शब्द का अर्थ होता है - अकुटिल वृत्ति और अहिसावृत्ति से मन की स्थिरता को प्राप्त करने वाला। |
hin_Deva | kan_Knda | इन दोनों कल्पसूत्र के श्रौत गृह्य धर्म शुल्वसूत्र सभी ही हैं ये दोनों ग्रन्थ पूर्ण रूप में है। | ಈ ಎರಡು ಕಲ್ಪಸೂತ್ರಗಳ ಶ್ರೌತ ಗೃಹ್ಯ ಧರ್ಮ ಶುಲ್ಬಸೂತ್ರ ಎಲ್ಲವೂ ಈ ಎರಡು ಗ್ರಂಥ ಪೂರ್ಣ ರೂಪವಾಗಿದೆ. |
hin_Deva | san_Deva | प्रमाणभूत सूत्र है-''संख्या पूर्वोद्विगुः इति। 41. प्रादि समास के विधायक पाँच वार्तिकों का यहाँ उल्लेख किया गया है “'प्रादयोगताद्यर्थे प्रथमया '', “ अत्यादयः क्रान्ताद्यर्थे द्वितीयया”, “ अवादयः क्रुष्टाद्यर्थे तृतीयया'', “ पर्यादयो ग्लानाद्यर्थे चतुर्थ्या” “निरादयः क्रात्ताद्यर्थे पञ्चम्या। 42. “तत्पुरुषस्याङ्कुलेः सं... | प्रमाणभूतं सूत्रं हि संख्यापूर्वो द्विगुः इति। ४१. प्रादिसमासस्य विधायकानि पञ्च वार्तिकान्यपि समुल्लिखितानि - "प्रादयो गताद्यर्थे प्रथमया", "अत्यादयः क्रान्ताद्यर्थे द्वितीयया", "अवादयः क्रुष्टाद्यर्थ तृतीयया", "पर्यादयो ग्लानाद्यर्थ चतुर्थ्या", "निरादयः क्रान्ताद्यर्थे पञ्चम्या" इति। ४२. "तत्पुरुषस्याङ्कुलेः संख्याव्य... |
hin_Deva | san_Deva | विन्दते - विद्-धातु से लट्-लकार प्रथमपुरुष एकवचन का यह रूप है। | विन्दते - विद्-धातोः लट्-लकारस्य प्रथमपुरुषस्य एकवचने रूपम् इदम्। |
kan_Knda | san_Deva | ವೇದದಲ್ಲಿ ದ್ಯಾವಾ ಪೃಥ್ವೀ ಇದು ಒಂದು ಚರ್ಚಿಸುವ ದೇವತೆಯೇ ಯುಗಳವಾಗಿದೆ. | वेदे द्यावापृथिवी इत्येकं बहुचर्चितं देवतायुगलम्। |
san_Deva | kan_Knda | यज्ञकर्मणि अजपन्यूङ्कसामसु इति सूत्रगतपदच्छेदः। | ಯಜ್ಞಕರ್ಮಣಿ ಅಜಪನ್ಯೂಂಖಸಾಮಸು ಎಂದು ಸೂತ್ರದ ಪದವಿಭಾಗ. |
san_Deva | hin_Deva | केचित् जनाः अत्यधिकं कार्यं सम्पादयितुं शक्नुवन्ति, महति युद्धे निर्भयं सेनाधिपत्यं कुर्वन्ति, केचित् ध्यानादिना अतीन्द्रियं ज्ञानं लभन्ते। | कुछ मनुष्य अत्यधिक कार्य को पूर्ण कर सकते है, भयंकर युद्ध में निर्भय होकर सेना का संचालन करते है, कुछ ध्यान आदि से इन्द्रियों से परे का ज्ञान प्राप्त करता है। |
hin_Deva | kan_Knda | जिसका आश्रय लेकर ब्राह्मण ग्रन्थ की व्युत्पत्ति निर्मित हुई। | ಇದರ ಆಶ್ರಯವನ್ನು ತೆಗೆದುಕೊಂಡು ಆಧಾರದ ಮೇಲೆ ಬ್ರಾಹ್ಮಣ ಗ್ರಂಥಗಳ ವ್ಯುತ್ಪತ್ತಿಯು ನಿರ್ಮಿತವಾಗಿದೆ. |
hin_Deva | san_Deva | “पूर्वापरापरोन्तरमेकदेशिनैकाधिकरणे" इस सूत्र का एक उदाहरण दीजिये| | "पूर्वापराधरोत्तरमेकदेशिनैकाधिकरणे" इति सूत्रस्य उदाहरणम् एकं देयम्। |
hin_Deva | kan_Knda | अधिदैवत इसका देवतात्मक अर्थ होता है। | ಅಧಿದೈವತಮ್ ಎಂಬುದರ ದೇವತಾತ್ಮಕ ಎಂದರ್ಥ. |
kan_Knda | san_Deva | ಅಶ್ವಿನೌ ಇದರ ವೈದಿಕ ರೂಪವೇನು? | अश्विनौ इत्यस्य वैदिकं रूपं किम्। |
san_Deva | hin_Deva | अधुना केनोपनिषदं तथा छान्दोग्योपनिषदं संक्षेपेण अवगच्छामः। | अब केन उपनिषद् तथा छान्दोग्य उपनिषद् को संक्षेप से जानेंगे। |
hin_Deva | san_Deva | अर्थात् जो पुरुष विधि का अनुसरण करके शास्त्रोक्त कर्मो का आचरण करता है। | अर्थात् यः पुरुषः विधिम् अनुसृत्य शास्त्रोक्तकर्माणि आचरति। |
kan_Knda | hin_Deva | ಈಗ ಅಕ್ಷಸೂಕ್ತದಲ್ಲಿ ಆ ವಿಷಯದ ಆಲೋಚನೆಯನ್ನು ಮಾಡಲಾಗಿದೆ. | अब अक्षसूक्त में उस विषय की ही आलोचना करते हैं। |
kan_Knda | hin_Deva | ಅಗ್ನಿಷ್ಟೋಮದ ಅಂತಿಮ ಅನುಷ್ಠಾನ ಯಾವುದು? | अग्निष्टोम का अन्तिम अनुष्ठान क्या हे? |
san_Deva | kan_Knda | तस्मात् यज्ञात् अश्वाः पशवः गावः इत्यादयः अजायन्त। | ಆ ಯಜ್ಞದಿಂದ ಅಶ್ವ, ಪಶು, ಹಸು ಇತ್ಯಾದಿಗಳು ಉತ್ಪನ್ನವಾದವು. |
kan_Knda | san_Deva | ಆದ್ದರಿಂದ ಆ ಫಿಷಃ ಪ್ರಾತಿಪದಿಕದ ಅಥವಾ ಉಚ್ಚೈಃ ಇದರ ಅಂತ್ಯದಲ್ಲಿರುವ ಐಕಾರವು ಪ್ರಕೃತಸೂತ್ರದಿಂದ ಉದಾತ್ತವಾಗಿದೆ. | अतः तस्य फिषः प्रातिपदिकस्य वा उच्चैः इत्यस्य अन्त्यः ऐकारः प्रकृतसूत्रेण उदात्तः भवति। |
san_Deva | kan_Knda | यागानां समधिकमहत्त्वशालित्वेन अयम् एव ज्येष्ठयज्ञाभिधानेन मण्डितः अस्ति (ताण्ड्य. ६/३/८-९)। | ಯಜ್ಞಗಳ ಹೆಚ್ಚಿನ ಪ್ರಾಮುಖ್ಯತೆಯಿರಿವುದರಿಂದ ಇದು ಅತಿ ಜ್ಯೇಷ್ಠ ಯಜ್ಞದ ಹೆಸರಿನಲ್ಲಿ ಸುಶೋಭಿತವಾಗಿದೆ (ತಾಂಡ್ಯ.೬/೩/೮-೯). |
kan_Knda | hin_Deva | ನನ್ನ ಫಲಕ್ಕೆ ಈ ಕರ್ಮವನ್ನು ಮಾಡುತ್ತೇನೆ ಫಲದಲ್ಲಿ ಸರಿಯಾಗಿ ಹೇಳಿದೆ | | इसलिये तू युक्त हो अर्थात् उपर्युक्त निश्चय वाला हो यह अभिप्राय है। |
hin_Deva | san_Deva | इसका यह भाव है की जैसे सूर्य अपने आकर्षण से सभी भूगोलो को धारण करता है वैसे ही सूर्य आदि लोकों का कारण और जीव को जगदीश्वर धारण करते है जो इन असंख्यलोकों का निर्माण किया, जिसमे ये प्रलय को प्राप्त होते है, वह ही सबको उपासना करने योग्य है। | अस्य अयं भावः यत् यथा सूर्यः स्वाकर्षणेन सर्वान् भूगोलान् धरति तथा सूर्यादीन् लोकान् कारणं जीवांश्च जगदीश्वरो धत्ते य इमान् असंख्यलोकान् सद्यो निर्ममे यस्मिन् इमे प्रलीयन्ते च स एव सर्वेः उपास्यः। |
kan_Knda | san_Deva | ಬ್ರಾಹ್ಮಣನಿಗೆ ಇದು ನಿತ್ಯಕರ್ಮ. | ब्राह्मणस्य इदं नित्यं कर्म। |
san_Deva | kan_Knda | 13 अखण्डं ब्रह्म नाम किम्? | ೧೩. ಅಖಂಡ ಬ್ರಹ್ಮವೆಂದರೆ ಏನು? |
san_Deva | hin_Deva | ततः "प्रथमानिर्दिष्टं समास उपसर्जनम्" इत्यनेन समासविधायकसूत्रे सुबित्यस्य प्रथमानिर्दिष्टत्वात् तद्बोध्यस्य शाक ङस् इत्यस्य उपसर्जनसंज्ञायां तस्य पूर्वनिपाते शाक ङस् प्रति इति जाते, समासस्य प्रातिपदिकत्वात् तदवयवस्य सुपः ङस्प्रत्ययस्य लुकि निष्पन्नात् प्रातिपदिकात् शाकप्रति इत्यस्मात् प्रथमैकवचने सौ, अव्ययत्वात... | इसके बाद “प्रथमानिर्दिष्ट समास उपसर्जनम्'' इस समास विधायक सूत्र में सुबन्त का प्रथमानिर्दिष्ट होने पर उसके बोधक का ज्ञाक ङस् इसकी उपसर्मन संज्ञा होने पर उसका पूर्व नियात होने पर शाक ङस् प्रति ऐसा होने पर समास का प्रातिपदिक से अवयप का सुप का ङस् प्रत्यय का लोप होने से प्रातिपदिक से शाक प्रति इससे प्रथमा एकवचने सु हो... |
san_Deva | kan_Knda | एतदेव अध्यापोपापवादयोः प्रयोजनम्। | ಇದನ್ನೇ ಅಧ್ಯಾಪೋಪ ಅಪವಾದದ ಪ್ರಯೋಜನ ಎನ್ನುವರು. |
san_Deva | kan_Knda | तस्मात् समग्रसंसारस्य स एव एकः स्वामी। | ಆದ್ದರಿಂದ ಸಮಗ್ರ ಸಂಸಾರದ ಅವರೊಬ್ಬರೆ ಸ್ವಾಮಿಯಾಗಿರುತ್ತಾರೆ. |
kan_Knda | san_Deva | ಆ ಪರಮಾತ್ಮನು ಅಥವಾ ಪುರುಷನೇ ಸಮಸ್ತ ಜಗತ್ತಿನ ಸ್ವಾಮಿಯಾಗಿದ್ದಾನೆ ಮತ್ತೆ ಬೇರಾರು ಅಲ್ಲ. | स परमात्मा पुरुष एव जगतः सर्वम्, नान्यत्। |
kan_Knda | san_Deva | ಆ ’ಆಮ್ರೇಡಿತ’ಸಂಜ್ಞೆಯನ್ನು ಹೊಂದಿರುವ ಶಬ್ದಕ್ಕೆ ಪ್ರಕೃತಸೂತ್ರದಿಂದ ಅನುದಾತ್ತಸ್ವರವಾಗುತ್ತದೆ. | तस्य आम्रेडितसंज्ञकस्य अनेन सूत्रेण अनुदात्तस्वरः स्यात्। |
kan_Knda | san_Deva | ವಿವೇಕಚೂಡಾಮಣಿಯಲ್ಲಿ ಹೇಳಿದೆ. | विवेकचूडामणौ उक्तम् । |
san_Deva | hin_Deva | तस्थुषीः- स्था-धातोः क्वसुन्प्रत्यये स्त्रियाम् ङीप्प्रत्यये द्वितीयाबहुवचने तस्थुषीः इति रूपम्। | तस्थुषीः - स्था-धातु क्वसुन् प्रत्यय करने पर स्त्रियाम् ङीप्प्रत्यय करने पर द्वितीयाबहुवचन में तस्थुषी: यह रूप है। |
san_Deva | hin_Deva | इदं वर्णनं पठित्वा साधारणपाठकः समुद्वेलितो भवति, किञ्चैतेषु उद्वेजकविषयसमूहेषु यत्र तत्र अत्यन्तरोचकम् आकर्षकं महत्त्वपूर्ण च आख्यानम् अपि प्राप्यते। | इस वर्णन को पढ़कर साधारण पाठक प्रसन्न होते हैं, इनमें कुछ उद्ठिग्न करने वाले विषय समूह पर यहाँ वहाँ अत्यन्त रोचक, आकर्षक और महत्त्वपूर्ण आख्यान भी प्राप्त होते है। |
san_Deva | kan_Knda | सूत्रार्थसमन्वयः - रक्षणक्रियावाचिनः भ्वादिगणे पठितस्य गुपूधातोः पकारोत्तरस्य ऊकारस्य 'उपदेशेऽजनुनासिक इत्' इति सूत्रेण इत्संज्ञायां 'तस्य लोपः' इत्यनेन लोपे च कृते गुप् इति स्थिते 'धातोः' इति सूत्रेण गुप्-धातोः अन्त्यस्य अचः गकारोत्तरस्य उकारस्य उदात्तस्वरः विधीयते। | ಸೂತ್ರಾರ್ಥದ ಸಮನ್ವಯ - ರಕ್ಷಣ ಕ್ರಿಯಾವಾಚಿ ಭ್ವಾದಿಗಣದಲ್ಲಿ ಓದಿರುವ ಗುಪೂ ಧಾತುವಿನಿಂದ ಪಕಾರದ ನಂತರದಲ್ಲಿರುವ ಊ ಕಾರದ "ಉಪದೇಶಎಜನುನಾಸಿಕ ಇತ್" ಈ ಸೂತ್ರದಿಂದ ಇತ್ ಸಂಜ್ಞಾವಾಗುವ ಕಾರಣ ಮತ್ತು "ತಸ್ಯ ಲೋಪಃ" ಇದರಿಂದ ಲೋಪವಾಗುವ ಕಾರಣ ಗುಪ್ ಈ ಸ್ಥಿತಿಯಲ್ಲಿ "ಧಾತೋಃ" ಈ ಸೂತ್ರದಿಂದ ಗುಪ್ ಧಾತುವಿನ ಅಂತ್ಯದಲ್ಲಿರುವ ಅಚ್ ಗಕಾರದ ನಂತರವಿರುವ ಉಕಾರದ ಉದಾತ್ತ ಸ್ವರದ ವಿಧಾನವನ್ನು ಮಾಡಲಾಗುತ್ತದ... |
kan_Knda | hin_Deva | ಯಾರೋ ಹೇಗಾದರೂ ತೃಷೆಗಾಗಿ ಹೇಳಿದ್ದಾರೆ - ಸಮೀಪದಲ್ಲಿ ಕೂಪವಿದೆ ಎಂದು. ಅದರಲ್ಲಿ ನೀರಿದೆ. ಮಾಡಿದ ಪ್ರಯತ್ನಕ್ಕೆ ಸಿಗಬೇಕು ಎಂದು. | जैसै कोई प्यासे से कहता है की समीपस्थ कुएँ में जल है तथा कुछ परिश्रम करने पर वह प्राप्त भी हो सकता है। |
hin_Deva | kan_Knda | इस सूत्र से वाच आदि शब्दों के दोनों वर्ण उदात्त हो। | ಈ ಸೂತ್ರದಿಂದ ವಾಚಾದಿ ಶಬ್ದಗಳ ಎರಡು ವರ್ಣಗಳು ಉದಾತ್ತವಾಗಿರುತ್ತದೆ . |
hin_Deva | san_Deva | उच्चौस्तरां वा वषट्कारः ये तीन पद यहाँ है। | उच्चैस्तरां वा वषट्कारः इति त्रीणि पदानि अत्र सन्ति। |
hin_Deva | kan_Knda | कृष्णं श्रितः इस लौकिकविग्रह में कृष्ण अम् श्रित सु इस अलौकिक विग्रह में द्वितीया पद का प्रथमानिदिष्ट होने से उस बोध का कृष्ण अम् इसका “प्रथमानिर्दिष्टं समास उपर्जनम्'' इससे उपसर्जन संज्ञा होती है। | ಕೃಷ್ಣಂ ಶ್ರಿತಃ ಈ ಲೌಕಿಕವಿಗ್ರಹದಲ್ಲಿ ಕೃಷ್ಣ ಅಮ್ ಶ್ರಿತ ಸು ಈ ಅಲೌಕಿಕ ವಿಗ್ರಹದಲ್ಲಿ ದ್ವಿತೀಯಾ ಎಂಬ ಪದವು ಪ್ರಥಮಾ ನಿರ್ದಿಷ್ಟವಾಗಿರುವುದರಿಂದ ಆ ಬೋಧವಾದ ಕೃಷ್ಣ ಅಮ್ ಇದರ "ಪ್ರಥಮಾ ನಿರ್ದಿಷ್ಟಂ ಸಮಾಸ ಉಪಸರ್ಜನಮ್" ಇದರಿಂದ ಉಪಸರ್ಜನ ಸಂಜ್ಞೆಯು ಆಗುತ್ತದೆ. |
san_Deva | kan_Knda | प्रजापतिस्वरूपम् विविधदेवतानामस्मरणं हि एकस्यैव परमस्वरूपस्य स्तुत्यै क्रियमाणं भवति। | ಪ್ರಜಾಪತಿಯ ಸ್ವರೂಪ ವಿವಿಧ ದೇವತೆಗಳ ಸ್ಮರಣೆಯನ್ನು ಮಾಡುವುದೇ ಒಂದು ಪರಮಸ್ವರೂಪದ ಸ್ತುತಿಯಾಗಿದೆ. |
hin_Deva | kan_Knda | अविद्यमानवस्त्व के अभाव पक्ष में देवी: यह पद विद्यमान ही होता है। | ಅವಿದ್ಯಮಾನವದ್ಭಾವ ಇಲ್ಲದೆ ಇರುವ ಪಕ್ಷದಲ್ಲಿ ’ದೇವೀಃ’ ಎಂಬ ಪದವು ಅಸ್ತಿತ್ವದಲ್ಲಿ ಇದ್ದ ಹಾಗೆಯೇ ಇರುತ್ತದೆ. |
hin_Deva | san_Deva | “ण्यक्षत्रियार्षञितो यूनिलुगणिञोः'' इस सूत्र से लुक पद का अनुपर्तन होता है। | "ण्यक्षत्रियार्षञितो यूनि लुगणिञोः" इति सूत्रात् लुक् इति पदम् अत्र अनुवर्तते। |
hin_Deva | kan_Knda | ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद ये तीनो ही मन में प्रतिष्ठित है। | ಋಗ್ವೇದ, ಸಾಮವೇದ, ಯಜುರ್ವೇದ ಈ ಮೂರು ಮನಸ್ಸಿನಲ್ಲಿ ಪ್ರತಿಷ್ಠಿತವಾಗಿದೆ. |
kan_Knda | san_Deva | ಸ್ತವತೇ - ಸ್ತು ಪ್ರಶಂಸಾಯಾಮ್ ಎಂಬ ಧಾತುವಿನ ಕರ್ಮಾರ್ಥದಲ್ಲಿ ಆತ್ಮನೇಪದ ರೂಪವಾಗಿದೆ. | स्तवते - स्तु प्रशंसायाम् इति धातोः कर्मणि आत्मनेपदम् इदम्। |
kan_Knda | san_Deva | ಐದನೇ ಪ್ರಪಾಠಕದಲ್ಲಿ ಯಜ್ಞಗಳ ಸಂಕೇತದ ಹೆಸರು ಲಭ್ಯವಾಗುತ್ತದೆ. | पञ्चमे प्रपाठके यज्ञीयानां सङ्केतानाम् उपलब्धिः भवति। |
kan_Knda | hin_Deva | "ತತ್ತೇಜೋಽಸೃಜತ" ಎಂಬುದು ಸರಿಯಾಗಿ ಕೇಳಿಸಿಕೊಂಡಿದ್ದು ಸೃಷ್ಟಿಕರ್ತನ ಮತ್ತು ಸೃಷ್ಟಿಸುವ ಸಂಬಂಧಗಳೆರಡರಲ್ಲೂ ಸೇರುವುದಿಲ್ಲ. "ತತ್ತೇಜೋಽಸೃಜತ" "ತದಾಕಾಶಮಸೃಜತ" ಎಂಬುದಾಗಿ. | और 'तत्तेजोऽसृजत' इस प्रकार से एक बार श्रुत सृष्टा के स्रष्टव्य दो के द्वारा संबंध उचित नहीं है, 'तत्तेजोऽसृजतष्तदाकाशमसृजत' इस प्रकार से। |
kan_Knda | hin_Deva | ತಾತ್ಪರ್ಯ ನಿರ್ಣಾಯಕವು ಆರು ಲಿಂಗಗಳಲ್ಲಿ ಆಗುತ್ತದೆ ಇದು ಮೊದಲನೆಯದು. | तात्पर्य निर्णायक छः लिंगो में यह अन्यतम होता है। |
kan_Knda | hin_Deva | ಶೃತಿ - ತಮೇತಂ ವೇದಾನುವಚನೇನ ಬ್ರಾಹ್ಮಣಾ ವಿವಿದಿಷಂತಿ ಯಜ್ಞೇನ ಇತಿ | | इसलिए श्रुतियों में कहा हैं तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन इति। |
san_Deva | hin_Deva | बहुव्रीहेः इत्यपि प्रातिपदिकात् इत्यस्य विशेषणं भवति। | बहुव्रीहेः भी प्रातिपदिकात् पद का विशेषण है। |
san_Deva | hin_Deva | सामान्यतः सर्वेषां प्रत्ययानां आदिः स्वरः उदात्तो भवति। | सामान्य रूप से सभी प्रत्ययों का आदि स्वर उदात्त होता है। |
hin_Deva | san_Deva | प्रमेय जीव तथा ब्रह्म ऐक्य अर्थात् अभेद है। | प्रमेयं जीवब्रह्मणोः ऐक्यम्, अभेदः। |
san_Deva | hin_Deva | निघण्टुग्रन्थस्य सङ्ख्याविषये पर्याप्तः मतभेदः अस्ति। | निघण्टु ग्रन्थ की सङख्या विषय में पर्याप्त मतभेद है। |
san_Deva | kan_Knda | चेत् पुरुषः प्रवर्तते । | ಪುರುಷನು ಆಗುತ್ತಾನೆ. |
hin_Deva | kan_Knda | मण्डलों के अनुसार सूक्तों की व्यवस्था (१९१+४३+६२+५८+८७+१०४+९२+११४+१९१ ) इस प्रकार है। | ಮಂಡಲಗಳ ಅನುಸಾರ ಸೂಕ್ತಗಳ ವ್ಯವಸ್ಥೆ (191 + 43 + 62 + 58 + 87 + 104 + 92 + 114 + 191) ಈ ಕೆಳಗಿನಂತಿದೆ. |
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