src_lang stringclasses 3
values | tgt_lang stringclasses 3
values | src_text stringlengths 5 1.61k | tgt_text stringlengths 5 1.61k |
|---|---|---|---|
san_Deva | kan_Knda | सूत्रव्याख्या-विधिसूत्रमिदम्। | ಸೂತ್ರದ ವ್ಯಾಖ್ಯಾನ - ಇದು ವಿಧಿ ಸೂತ್ರವಾಗಿದೆ. |
hin_Deva | san_Deva | इस प्रकार इस सूत्र का अर्थ होता है यहाँ पर जहाँ उदात्त स्वर नहीं है, उस प्रकार के लसार्वधातुक के परे अभ्यस्त संज्ञक धातुओं के आदि अच् उदात्त होता है। | एवम् अस्य सूत्रस्य अर्थः भवति यत्र उदात्तस्वरः नास्ति तादृशे लसार्वधातुके परे अभ्यस्तसंज्ञकानां धातूनाम् आदिः अच् उदात्तः भवति। |
hin_Deva | kan_Knda | जितना अर्थ समाप्त मन्त्रों के समूह को अर्थ सूक्त कहते है। | ಅರ್ಥಸಮಾಪ್ತವಾಗಿರುವಂತಹ ಮಂತ್ರಗಳ ಸಮೂಹಗಳಿಗೆ ಅರ್ಥಸೂಕ್ತವೆಂದು ಹೇಳುತ್ತಾರೆ. |
kan_Knda | san_Deva | ಅಂತಿಮ ಮಂತ್ರವು ದಂಪತಿಗೆ ಹೀಗೆ ಹೇಳುತ್ತದೆಃ ಹೇ ದಂಪತಿಗಳೇ, ನಿಮ್ಮ ಪ್ರಸಿದ್ಧ ಸಂತೋಷಕ್ಕೆ ಯೋಗ್ಯವಾದ ಸ್ಥಳವನ್ನು ನಾವು ಬಯಸುತ್ತೇವೆ, ಅದಕ್ಕಾಗಿ ವಿಷ್ಣುವನ್ನು ಪ್ರಾರ್ಥಿಸುತ್ತೇವೆ. | अन्तिममन्त्रे दम्पतिं प्रति उच्यते अहे दम्पती (यागकर्मणः यजमानौ) युष्मभ्यं प्रसिद्धानि सुखेन उषितुं योग्यानि स्थानानि कामयामहे, तदर्थं विष्णुं प्रार्थयामहे। |
kan_Knda | hin_Deva | ನಿರ್-ಉಪಸರ್ಗಪೂರ್ವಕ ನಿಜ್-ಧಾತುವಿನ ಕ್ವಿಪ್-ಪ್ರತ್ಯಯಾಂತದ ಪ್ರಥಮಪುರುಷ ಏಕವಚನದ ರೂಪವಾಗಿದೆ. | निर् पूर्वकनिज्-धातु से क्विप्प्रत्यय करने पर प्रथमा एकवचन में। |
hin_Deva | san_Deva | ' *केवलाघो भवति केवलादी' यह हि त्याग मूलक वैदिक संस्कृति का महामन्त्र है। | 'केवलाघो भवति केवलादी' अयं हि त्यागमूलकवैदिकसंस्कृतेः महामन्त्रोऽस्ति। |
kan_Knda | san_Deva | ಇಂದ್ರನನ್ನು ಸ್ತುತಿಗೈಯ್ಯುವ ಸೂಕ್ತಗಳು ಯಾವ ಛಂದಸ್ಸಿನಲ್ಲಿ ರಚಿಸಲ್ಪಟ್ಟಿವೆ ? | इन्द्रस्य स्तुतिपरकाणि सूक्तानि केन छन्दसा रचितानि ? |
hin_Deva | san_Deva | वि इदम् इस स्थिति में “एकः पूर्वपरयोः' इस अधिकार में पढ़ा हुआ ' अकः सवर्णे दीर्घः' इस सूत्र से पूर्व पर इकार, इकार के स्थान में ईकार रूप सवर्ण दीर्घ एकादेश होने पर वीदम् यह रूप सिद्ध होता है। | वि इदम् इति स्थिते 'एकः पूर्वपरयोः' इत्यधिकारे पठितेन 'अकः सवर्णे दीर्घः' इति सूत्रेण पूर्वपरयोः इकारेकारयोः स्थाने ईकाररूपसवर्णदीर्घेकादेशे वीदम् इति रूपं सिध्यति। |
kan_Knda | san_Deva | ಇಂದ್ರನ ಸ್ವರೂಪವು ಇದಿ-ಧಾತುವಿನಿಂದ ನಿಷ್ಪನ್ನವಾದ ಇಂದ್ರಶಬ್ದವು ಪರಮೇಶ್ವರವಾಚಕ. | इन्द्रशब्दः इदि-धातोः निष्पन्नः इन्द्रशब्दः परमेश्वरवाचकः। |
san_Deva | hin_Deva | इन्द्रस्य सूक्तानि सर्वाणि त्रिष्टुपि एव ग्रथितानि। | इन्द्र के सभी सूक्त त्रिष्ठुप में ही हैं। |
san_Deva | hin_Deva | "ऋक्पूरब्धूः पथामानक्षे" इति सूत्रेण किं विधीयते? | "ऋक्पूरब्धूपथामानक्षे" इस सूत्र से क्या विधान है? |
kan_Knda | san_Deva | ಕಾರಕಮ್ ಇದು ಪ್ರಥಮಾ ಏಕವಚನಾಂತ ಪದವಾಗಿದೆ. | कारकम् इति प्रथमैकवचनान्तं पदम्। |
san_Deva | hin_Deva | सुबन्तम् इत्यस्य विशेषणत्वाद् द्वितीया इत्यस्य तदन्तविधौ द्वितीयान्तं सुबन्तम् इति भवति। | सुबन्त के विशेषण से द्वितीया इसका तदन्तविधि में द्वितीयान्त सुबन्त को तत्पुरुष समास होता है। |
hin_Deva | san_Deva | और स्वरित स्थान में जो यण् विहित है, उस यणू से पर वर्तमान अनुदात्त के स्थान में स्वरित होता है। | स्वरितस्थाने च यः यण् विहितः तस्मात् यणः परं वर्तमानस्य अनुदात्तस्य स्वरितः भवति। |
san_Deva | kan_Knda | द्विविधः, मन्त्ररूपो ब्राह्मणरूपश्चेति। | ಎರಡು ಪ್ರಕಾರಗಳು, ಮಂತ್ರ ರೂಪ ಮತ್ತು ಬ್ರಾಹ್ಮಣ ರೂಪ. |
hin_Deva | san_Deva | सगुणब्रह्म की उपासना के अभ्यास से मन उसी ब्रह्म में एकाग्र होने पर वह उसमें उपाधि कल्पना करने पर वह निरुपाधिक ब्रह्म भी सोपाधिक होकर प्रकट हो जाता है। | सगुणब्रह्मोपासनाभ्यासात् मनसि वशीकृते ब्रह्मणि एव एकाग्रे सति तदेव परं ब्रह्म अपेतोपाधिकल्पनम् अपेता उपाधिकल्पना यस्मात् तन्निरुपाधिकं सत् साक्षात् आविर्भवति इति। |
san_Deva | hin_Deva | तद्गता असम्भावना। | उनमें असम्भावना होती है। |
kan_Knda | san_Deva | ವ್ಯಪದೇಶಿವದ್ಭಾವದಿಂದ ’ಷಟ್’ ಎಂಬ ಪದಕ್ಕೆ ಆಮಂತ್ರಿತಸಂಜ್ಞೆ ಕೂಡ ಸಿಗುತ್ತದೆ. | व्यपदेशिवद्भावम् आश्रित्य षट् इति पदस्य अपि आमन्त्रितान्तत्वं सिध्यति। |
san_Deva | hin_Deva | अस्माभिः वैदिकी रीतिः ध्रुवमेव रक्षणीया वर्तते। | हमें वैदिक रीति की अवश्य ही रक्षा करनी चाहिए। |
kan_Knda | san_Deva | ಆಗ ಗಾಳಿಯಿಲ್ಲದೆ ಉಸಿರಾಡುತ್ತಿದ್ದ ಏಕೈಕ ಅಂಶವಿತ್ತು, ಮತ್ತು ಆ ಅಂಶವು ತನ್ನ ಸ್ವಾಭಾವಿಕ ಶಕ್ತಿಯಿಂದ ಜೀವಿಸುತ್ತಿತ್ತು. | तदा एकम् एव तत्त्वमासीत्, यद् विना वातं श्वासग्रहणमकरोत् तथा स्वस्य स्वाभाविकशक्त्या जीवितमासीत् तत् तत्त्वम्। |
kan_Knda | hin_Deva | ಶಿಕ್ಷಾದ ಅನ್ಯ ವಿಷಯಗಳ ಅಭಾವವು ಇಲ್ಲಿ ಕಾಣುತ್ತದೆ. | शिक्षा के अन्य विषयों का यहाँ पर अभाव है। |
kan_Knda | san_Deva | ಮತ್ತು ಅವ್ಯಯ ಪದವಾಗಿದೆ. | चेत्यव्ययपदम्। |
hin_Deva | kan_Knda | इसके बाद ग्यारह अनुयाज और पत्नी संयाज अनुष्ठीत किये जाते हैं। | ಇದರ ನಂತರ, ಹನ್ನೊಂದು ಅನುಯಾಜಗಳನ್ನು ಮತ್ತು ಪತ್ನೀಸಂಯಾಜಗಳನ್ನು ಅನುಷ್ಠಾನ ಮಾಡುತ್ತಾರೆ. |
hin_Deva | san_Deva | दन्तोष्ठम् यहाँ अन्य पदार्थ के समाहार की प्राधान्य है और उभय पदार्थ का प्राधान्य नहीं है। | दन्तोष्ठम् इत्यत्र अन्यपदार्थस्य समाहारस्य प्राधान्यमस्ति, उभयपदार्थस्य च प्राधान्यं नास्ति। |
hin_Deva | kan_Knda | इस प्रकार वैदिकदेवो में भी अत्यधिकमहानता को धारण किये हुए यह विष्णु प्रसीद्ध ही है। | ಆದ್ದರಿಂದ ವೈದಿಕ ದೇವತೆಗಳಲ್ಲಿ ಅತಿ ಕಡಿಮೆ ಮಹತ್ವವನ್ನು ಹೊಂದಿರುವ ವಿಷ್ಣುವು ಇದು ಪ್ರಸಿದ್ಧನಾಗಿದ್ದಾನೆ. |
san_Deva | kan_Knda | तस्मात् स्त्रीत्वे द्योत्ये ऋन्नेभ्यो ङीप् इति सूत्रेण ङीप्प्रत्ययो भवति। | ಅದರಿಂದ ಸ್ತ್ರೀತ್ವ ದ್ಯೋತಿಸಿದಾಗ ಋನ್ನೇಭ್ಯೋ ಜ್ಞೀಪ್ ಸೂತ್ರದಿಂದ ಜ್ಞೀಪ್ ಆಗುತ್ತದೆ. |
san_Deva | kan_Knda | ८. वेदान्तसारे अधिकारिलक्षणं किमुक्तम्। | ೮. ವೇದಾಂತಸಾರದಲ್ಲಿ ಅಧಿಕಾರಿಲಕ್ಷಣವು ಏನು ಹೇಳಿದೆ. |
kan_Knda | san_Deva | ಚ ಇದು ಅವ್ಯಯವಾಗಿದೆ. | च इति अव्ययपदम्। |
san_Deva | hin_Deva | सूत्रव्याख्या - इदं विधिसूत्रम्। | सूत्र व्याख्या-यह विधि सूत्र है। |
san_Deva | kan_Knda | श्रद्धाविषयः गुरूपदिष्टवेदान्तवाक्यम्। | ಶ್ರದ್ಧಾ ವಿಷಯವೇ ಗುರುವಿನಿಂದ ಉಪದಿಷ್ಟವಾಗಿರುವ ವೇದಾಂತವಾಕ್ಯವಾಗಿದೆ. |
kan_Knda | san_Deva | ಈ ಪ್ರಕಾರವಾದ ಮೋಕ್ಷದ ಪ್ರಾಪ್ತಿಗಾಗಿ ಕೆಲವು ಉಪಾಯಗಳನ್ನು ಉಪನಿಷತ್ತುಗಳಲ್ಲಿ ಹೇಳಲಾಗಿದೆ- ಬೃಹದಾರಣ್ಯಕ ಉಪನಿಷತ್ತಿನಲ್ಲಿ ಈ ಪ್ರಕಾರವಾಗಿ ಹೇಳಲಾಗಿದೆ- "ಆತ್ಮಾ ವಾಽರೆ ದ್ರಷ್ಟವ್ಯಃ ಶ್ರೋತವ್ಯೋ ಮಂತವ್ಯೋ ನಿಧಿಧ್ಯಾಸಿತವ್ಯಃ" ಈ ಪ್ರಕಾರವಾಗಿ. | एवंविधस्य मोक्षस्य प्राप्तये केचन उपायाः उपनिषत्सु समुपनिबद्धाः।आम्नातं च बृहदारण्यकोपनिषदि - “आत्मा वाऽरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः” इति। |
san_Deva | hin_Deva | "तद्धितार्थोत्तरपदसमाहारे च" इति सूत्रस्य समाहारे वाच्ये किमुदाहरणम् ? | “तद्धितार्थोत्तरपदसमाहारे च" सूत्र के समाहार होने पर वाच्य का क्या उदाहरण है? |
kan_Knda | hin_Deva | ಸಾವೇಕಾಚಸ್ ತೃತೀಯಾದಿರ್ವಿಭಕ್ತಿಃ (೬.೧.೧೮೬) ಸೂತ್ರದ ಅರ್ಥ - ಸು ವಿನ ನಂತರವಿರುವ ಒಂದು ಅಚ್ ಶಬ್ದವು , ಅದರ ನಂತರವಿರುವ ತೃತೀಯಾ ವಿಭಕ್ತಿಯಿಂದ ಪ್ರಾರಂಭಿಸಿ ನಂತರವಿರುವ ವಿಭಕ್ತಿಗಳ ಸ್ವರವು ಉದಾತ್ತವಾಗಿರುತ್ತದೆ. | सावेकाचस्तृतीयादिर्विभक्तिः ( ६.१.१८६ ) सूत्र का अर्थ- सु के परे रहते जो एक अच् वाला शब्द, उससे परे जो तृतीय विभक्ति से लेकर आगे की विभक्तियाँ, उनको उदात्त हो। |
san_Deva | kan_Knda | प्रातिपदिकेनैव तेषां प्रतीतिः भवति। | ಪ್ರಾತಿಪದಿಕದಿಂದ ಅವುಗಳ ಪ್ರತೀತಿ ಇರುತ್ತದೆ. |
kan_Knda | san_Deva | "ಪ್ರತ್ಯಯ ಗ್ರಹಣೆ ಯಸ್ಮಾತ್ಸ್ಯ ವಿಹಿತಸ್ತದಾದೆಸದಂತಸ್ಯ ಚ ಗ್ರಹಣಮ್" ಈ ಪರಿಭಾಷಾದಿಂದ ಸುಪ್ ಪ್ರತ್ಯಯ ಬೋಧಕ ಪ್ರತ್ಯಾಹಾರ ಗ್ರಹಣೆಯಿಂದ ತದಂತ ವಿಧಿ ಇದೆ. | "प्रत्ययग्रहणे यस्मात्स विहितस्तदादेस्तदन्तस्य च ग्रहणम्" इति परिभाषया सुप् इति प्रत्ययबोधकस्य प्रत्याहारस्य ग्रहणात् तत्र तदन्तविधिः। |
san_Deva | hin_Deva | इन्द्रशब्दः इदि-धातोः निष्पन्नः इन्द्रशब्दः परमेश्वरवाचकः। | इन्द्र का स्वरूप इदि-धातु से निष्पन्न इन्द्र शब्द परमेश्वर वाचक है। |
hin_Deva | kan_Knda | किस प्रकार की। | ಯಾವ ರೀತಿಯ? |
hin_Deva | kan_Knda | जो हमें दुःख रूपी सागर को पार करने के लिए मिली है। | ದುಃಖಾಸಾಗರವನ್ನು ಈಜಲು ಸಿಕ್ಕಿರುವುದು. |
san_Deva | hin_Deva | किञ्च प्रजानां सर्वं चित्तं ज्ञानं सर्वपदार्थविषयिज्ञानं यस्मिन् मनसि ओतं निक्षिप्तं तन्तुसन्ततिः पटे इव सर्वं ज्ञानं मनसि निहितम्। | और जिसमे प्राणियों के सम्पूर्ण सभी पदार्थविषयज्ञान धागे में मणियों के समान युक्त रहता है। |
hin_Deva | kan_Knda | उसका स्पष्ट रूप से उल्लेख करते हैं। | ಅದನ್ನು ಸ್ಪಷ್ಟ ರೂಪದಿಂದ ಉಲ್ಲೇಖವನ್ನು ಮಾಡುತ್ತಾರೆ. |
hin_Deva | san_Deva | सूत्र अर्थ का समन्वय- यहाँ पश्य यह तिङन्त लोडन्त है। | सूत्रार्थसमन्वयः- अत्र पश्य इति तिङन्तं लोडन्तमस्ति। |
hin_Deva | san_Deva | सरलार्थ - इस मन्त्र में प्रजापति के बारे में कहा है कि हे प्रजापति ! | सरलार्थः- अस्मिन् मन्त्रे प्रजापतिं प्रति उच्यते यत् हे प्रजापते । |
hin_Deva | san_Deva | अड़तालीस अध्यायो में यह ग्रन्थ सम्पूर्ण होता है। | अष्टचत्वारिंशदध्याये ग्रन्थोऽयं सम्पूर्णो भवति। |
hin_Deva | kan_Knda | अतः वेदान्त अचार्यो के द्वारा निदिध्यासन महान यत्न के द्वारा प्रतिपादित किया जाता है। | ಆದ್ದರಿಂದ ವೇದಾಂತಾಚಾರ್ಯರಿಂದ ನಿಧಿಧ್ಯಾಸದ ಮಹಾಪ್ರಯತ್ನದಿಂದ ಪ್ರತಿಪಾದಿಸಲಾಗಿದೆ. |
san_Deva | hin_Deva | यज्ञे कस्य विधानं निषिद्धम्? | यज्ञ में किसके विधान का निषेद्ध है? |
kan_Knda | hin_Deva | ಇದು ನಿಷಿದ್ಧರ್ಮಗಳಲ್ಲಿ ಪ್ರೇರಣೆಗಳು ಮತ್ತು ಮುಂದೆ ಆಗುವ ಪಾಪಗಳು ಇವುಗಳನ್ನು ಮನಸ್ಸಿನ ವಿಕ್ಷೇಪ ಎನ್ನುವರು. | यह निषिद्ध कर्म प्रेरणा भी आगे पाप को जन्म देती है जिसके कारण मन में विक्षेप होने लगता है। |
san_Deva | hin_Deva | तन्मते इतालीया ग्रीसदेशीयाश्च अग्नौ एव विविधान् देवान् उद्दिश्य होममकुर्वन्। | उनके मत में इतालीय और ग्रीसदेश के निवासी अग्नि को ही विविध देवों को उद्दिश्य करके होम करते थे। |
san_Deva | kan_Knda | अव्ययीभावादिति पञ्चम्येकवचनान्तं पदम्। | ಅವ್ಯಯೀಭಾವಾತ್ ಇದು ಪಂಚಮೀ ಏಕವಚನಾಂತ ಪದವಾಗಿದೆ. |
san_Deva | kan_Knda | अतः स्वर्गफलम् अनित्यम्। | ಆದ್ದರಿಂದ ಸ್ವರ್ಗದ ಫಲವು ಅನಿತ್ಯವಾಗಿರುತ್ತದೆ. |
hin_Deva | kan_Knda | मन्त्र और ब्राह्मण के भेद से वेद के दो भेद हैं। | ಮಂತ್ರ ಮತ್ತು ಬ್ರಾಹ್ಮಣ ಎಂಬ ಭೇದಗಳಿಂದ ವೇದ ಎರಡು ವಿಧ. |
san_Deva | kan_Knda | चित्तमलस्य नाशाय अर्थात् चित्तस्य शुद्धये नित्यादीनि कर्माणि अनुष्ठेयानि। | ಚಿತ್ತಮಲದ ನಾಶಕ್ಕೆ ಅಂದರೆ ಮನಸ್ಸಿನ ಶುದ್ಧಿಗಾಗಿ ನಿತ್ಯಕರ್ಮಗಳ ಅನುಷ್ಠಾನವನ್ನು ಮಾಡಲೇಬೇಕು. |
hin_Deva | san_Deva | ऋग्वेद में ऋतु वर्णन पर अनेक मन्त्र प्राप्त होते हैं। | ऋग्वेदे ऋतुवर्णनपराः अनेके मन्त्रा प्राप्यन्ते। |
hin_Deva | san_Deva | इस सूत्र में दो पद है। | अस्मिन् स्त्रे द्वे पदे स्तः। |
hin_Deva | kan_Knda | संहिता ही मन्त्र का पर्यायवाची शब्द है। | ಸಂಹಿತೆ ಎಂಬುದು ಮಂತ್ರದ ಪರ್ಯಾಯವಾಗಿದೆ. |
san_Deva | hin_Deva | पृथिवीं द्विलोकं च स दधार। | जिसने इन पृथिवी और द्विलोक को धारण किया है। |
san_Deva | hin_Deva | अर्थात् नपुंसकलिङ्गविशिष्टार्थस्य वाचकः अस्ति। | अर्थात् नपुंसकलिङ्ग विशिष्ट अर्थ का वाचक है। |
san_Deva | hin_Deva | पञ्चम्याः स्तोकादिभ्यः॥ (६.३.२) सूत्रार्थः - स्तोकान्तिकदूरार्थवाचकेभ्यः कृच्छ्रशब्दाच्च विहितायाः पञ्चम्याः उत्तरपदे परे लुक् न भवति। | “पञ्चम्याः स्तोकादिभ्यः" ( 6.3.2 ) सूत्रार्थ-रतोकान्तिक इरार्थवाचकों से और कृच्छर शब्द से विहित पञ्चमी के उत्तरपद पर में लोप नहीं होता है। |
hin_Deva | san_Deva | ईश्वर भी सृष्टिकरण में बेद ज्ञान को आश्रित करके जगत् की सृजना करता है। | ईश्वरोऽपि सृष्टिकरणे वेदज्ञानम् आश्रित्य जगत् सृजति। |
hin_Deva | san_Deva | जो जुआरी प्रातःकाल घोडे पर बैठकर जाता है वही शाम को कपड़ो के अभाव में व्याकुल होकर अग्नि के समीप रात्री व्यतीत करता है। | प्रातः अक्षान् युयुजे । सायं च अग्नेः समीपे शयानः रात्रिं यापयति । |
hin_Deva | kan_Knda | सरलार्थ - पर्वत में रहने योग्य आश्रित मेघों को इन्द्र ने मारा। | ಸರಳಾರ್ಥ - ಇಂದ್ರನು ಪರ್ವತದಲ್ಲಿ ವಾಸಿಸಲು ಯೋಗ್ಯವಾದ ಆಶ್ರಿತ ಮೋಡಗಳನ್ನು ಇಂದ್ರನು ಕೊಂದನು. |
hin_Deva | san_Deva | और उसको “विभक्तिविपरिणामेन कुत्सनैः'' इस विशेषण से समानाधिकरणों के द्वारा होता है। | तच्च विभक्तिविपरिणामेन कुत्सनैः इत्यस्य विशेषणत्वात् समानाधिकरणैः इति भवति । |
san_Deva | kan_Knda | ६. मोक्षसाधननिर्देशिका श्रुतिः का? | ೬. ಮೋಕ್ಷ ಸಾಧನ ನಿರ್ದೇಶಕವು ಯಾವುದು? |
san_Deva | kan_Knda | एषु पञ्चमन्त्रेषु यत् साररूपेण कथितं तदेव अधुना साररूपेण कथ्यते। | ಈ ಐದು ಮಂತ್ರಗಳಲ್ಲಿ ಯಾವ ಸಾರರೂಪದಿಂದಲೇ ಹೇಳಲಾಗಿದೆ ಅದನ್ನು ಇಲ್ಲಿ ಸಾರರೂಪದಿಂದ ಹೇಳುತ್ತಾರೆ. |
hin_Deva | kan_Knda | उदात्त स्थान में यण् उदात्तयण् यहाँ मध्य पद के लोप होने पर कर्मधारय समास है, उस उदात्तयण का। | ಉದಾತ್ತಸ್ಥಾನದಲ್ಲಿ ಯಣ್ ಉದಾತ್ತಾಯಣ್ ಎಂಬ ಮಧ್ಯಪದಲೋಪೀ ಕರ್ಮಧಾರಯಸಮಾಸಃ ಅದರ ಉದಾತ್ತಾಯಣಃ |
hin_Deva | kan_Knda | यहाँ दो पद है। | ಇಲ್ಲಿ ಎರಡು ಪದಗಳಿವೆ. |
san_Deva | hin_Deva | व्याकरणज्ञानं विना तु वेदमन्त्रस्य का कथा। | व्याकरण ज्ञान के विना तो वेद मन्त्र का क्या कहना है। |
kan_Knda | hin_Deva | ಆದರೆ ಪುರುಷ ಪ್ರಾಣಿಗಳ ಕರ್ಮಫಲಾನುಭೋಗದ ಕಾರಣದಿಂದಾಗಿ ತನ್ನ ಕಾರಣಾವಸ್ಥಾ ಇದನ್ನು ಬಿಟ್ಟು ಪರಿದುಶ್ಯಮಾನ ಜಗತ್ತಿನ ಅವಸ್ಥೆಯನ್ನು ಪಡೆದುಕೊಂಡು ಹೈದ್ಯ ಈ ಪುರುಷ ಪ್ರಾಣಿಗಳ ಕರ್ಮಫಲಭೋಗಕ್ಕಾಗಿ ಜಗದವಸ್ಥೆಯನ್ನು ಪಡೆದುಕೊಳ್ಳುತ್ತಾನೆ ಆದ್ದರಿಂದ ಇದು ಅದರ ವಾಸ್ತವಿಕ ರೂಪವು ಆಗಿಲ್ಲ. | लेकिन पुरुष प्राणियों के कर्मफल भोग के कारण अपनी कारणावस्था को छोड़कर परिदुश्यमान जगदवस्था को प्राप्त करता हैद्य ये पुरुष प्राणियों के कर्मफलभोग के लिए जगदवस्था को प्राप्त करता है इसलिए ये उसका वास्तविक रूप नहीं है। |
hin_Deva | san_Deva | ऋतशब्द के अनेक अर्थ वेद में ही प्राप्त होता है। | ऋतशब्दस्य नैके अर्थाः वेदे एव परिलक्ष्यन्ते। |
hin_Deva | san_Deva | ` अनुदात्तं पदमेकवर्जम्' इस सूत्र की व्याख्या कीजिए। | 'अनुदात्तं पदमेकवर्जम्' इति सूत्रं व्याख्यात। |
san_Deva | kan_Knda | अत एव गोष्ठजः पशुः इत्यादौ गोष्ठजशब्दस्य ब्राह्मणस्य नामधेयत्वाभावात् प्रकृतसूत्रेण तत्र स्वराः उदात्ताः न भवन्ति। | ಆದ್ದರಿಂದ ಗೋಷ್ಠಜಃ ಪಶುಃ ಇತ್ಯಾದಿಗಳಲ್ಲಿ ಬ್ರಾಹ್ಮಣ ನಾಮಧೇಯದ ಕೊರತೆಯಿಂದಾಗಿ ಪ್ರಕೃತಸೂತ್ರದಿಂದ ಅಲ್ಲಿ ಸ್ವರಗಳು ಉದಾತ್ತವಾಗುವುದಿಲ್ಲ. |
san_Deva | hin_Deva | २) प्रजापतिः सृष्ट्यर्थं कामयते। | २. प्रजापति सृष्टी के लिए कामयमान है। |
san_Deva | kan_Knda | तस्मात् प्रज्ञानं ब्रह्म” इति। | ಅದರಿಂದಲೇ ಇದು ಪ್ರಜ್ಞಾನಂ ಬ್ರಹ್ಮ ಎಂದಾಗುತ್ತದೆ. |
kan_Knda | san_Deva | ವಿಜಾತೀಯದೇಹಾದಿಗಳ ಪ್ರತ್ಯಯರಹಿತ ಅದ್ವಿತೀಯ ವಸ್ತು ಸಜಾತೀಯ ಪ್ರತ್ಯಯ ಪ್ರವಾಹ ನಿಧಿಧ್ಯಾಸನವೇ ಆಗಿರುತ್ತದೆ. | ६१. विजातीयदेहादिप्रत्ययरहित-अद्वितीयवस्तुसजातीयप्रत्ययप्रवाहः निदिध्यासनम् इति। |
hin_Deva | san_Deva | व्याख्या - इन दोनों का रथ सोने का बना हुआ है। | व्याख्या- अनयोः रथौ हिरण्यनिर्णिक् हिरण्यरूपः। |
san_Deva | kan_Knda | अत्र च अनुवाकेषु सूक्तानि, सूक्तेषु मन्त्राश्च परिश्रमपूर्वकं निर्धारिताः सन्ति। | ಇಲ್ಲಿ ಅನುವಾಕಗಳಲ್ಲಿ ಸೂಕ್ತಗಳು ಮತ್ತು ಸೂಕ್ತಗಳಲ್ಲಿ ಮಂತ್ರಗಳನ್ನು ಪರಿಶ್ರಮದಿಂದ ನಿರ್ಧರಿಸಲಾಗಿದೆ. |
san_Deva | kan_Knda | स्कन्दस्वामिमतेन तदर्थो हि यज्ञः प्रकृते मन्त्रे। | ಸ್ಕಂದಸ್ವಾಮಿಯ ಅನುಸಾರ ಅದರ ಅರ್ಥವು ಯಜ್ಞದ ಪ್ರಕೃತ ಮಂತ್ರದಲ್ಲಿಯೇ ಇದೆ. |
kan_Knda | san_Deva | ಇವುಗಳು ಸತ್ವಾದಿ ಗುಣಸಹಿತವಾದವುಗಳು ಅಪಂಚೀಕೃತ ಭೂತಗಳು ಈ ಕಾರಣದಿಂದ ಅಜ್ಞಾನದಿಂದಾದ ಚೈತನ್ಯಮಾತ್ರವಾಗಿರುತ್ತದೆ. | एतानि सत्त्वादिगुणसहितानि अपञ्चीकृतानि भूतानि एतत्कारणभूतम् अज्ञानोपहितचैतन्यमात्रं भवति। |
hin_Deva | kan_Knda | जो जुआरी की स्त्री होती है, वह यद्यपि अक्षक्रोडा से पूर्व झगडा नही करती थी, कितव मित्रो के लिए अनुकूल ही था। | ಯಾರು ಜೂಜುಗಾರನ ಹೆಂಡತಿಯಾಗಿರುತ್ತಾಳೆಯೋ, ಅವಳು ಈ ಅಕ್ಷಕ್ರೀಡೆಯ ಮೊದಲು ಜಗಳವಾಡುತ್ತಿರಲಿಲ್ಲ, ಕಿತವಾ ಮಿತ್ರರಿಗೆ ಅನ್ವಯವೇ ಆಗಿತ್ತು. |
san_Deva | hin_Deva | खादति इत्यस्मात् परम् अगतिसंज्ञकः चकारः अस्ति। | खादति इससे परे अगति संज्ञक चकार है। |
kan_Knda | hin_Deva | ಅಲ್ಲಿ ಕ್ರಾಂತಪ್ರಜ್ಞ ಅಥವಾ ಕ್ರಾಂತಕರ್ಮ ಆಗಿರುತ್ತದೆ. | वहाँ पर क्रान्तप्रज्ञ अथवा क्रान्तकर्मा है। |
san_Deva | kan_Knda | ३९. कर्मधारयसंज्ञा "तत्पुरुषः समानाधिकरणः कर्मधारयः" इति सूत्रेण भवति। | ೩೭. ಕರ್ಮಧಾರಯ ಸಂಜ್ಞಾ, "ತತ್ಪುರುಷ ಸಮಾನಾಧಿಕರಣಃ ಕರ್ಮಧಾರಯಃ" ಈ ಸೂತ್ರದಿಂದ ಆಗುತ್ತದೆ. |
hin_Deva | san_Deva | उससे बैद ङीन् यह स्थिति होती है। | तेन बैद ङीन् इति स्थितिः भवति। |
san_Deva | kan_Knda | ततः अपरोक्षज्ञाननिष्ठा, ततः विदेहकैवल्यात्मको मोक्षः इति। | ಅಲ್ಲಿಂದ ಅಪರೋಕ್ಷಜ್ಞಾನನಿಷ್ಠೆಯು, ತದನಂತರ ವಿದೇಹಕೈವಲ್ಯಾತ್ಮಕ ಮೋಕ್ಷವು. |
san_Deva | hin_Deva | रजःशब्दो लोकवाची, “लोका रजांस्युच्यन्ते' इति यास्केनोक्तत्वात्। | रज्: शब्द लोकवाची, “लोका रजांस्युच्यन्ते' ये यास्क ने कहा। |
san_Deva | kan_Knda | पूरणार्थशब्देन पुरणार्थकप्रत्ययान्तानां शब्दानां ग्रहणम्। | ಪೂರಣಾರ್ಥ ಶಬ್ದದಿಂದ ಪೂರಣಾರ್ಥಕ ಪ್ರತ್ಯಯಗಳ ಶಬ್ದಗಳ ಗ್ರಹಣವಾಗುತ್ತದೆ. |
hin_Deva | kan_Knda | किस प्रकार उनका घर का वैभव होता है इत्यादि चौदह मन्त्रो में कहा गया है। | ಯಾವ ಪ್ರಕಾರವಾಗಿ ಅವರ ಮನೆಯ ವೈಭವವಿರುತ್ತದೆ ಇತ್ಯಾದಿಗಳು ಹದಿನಾಲ್ಕು ಮಂತ್ರಗಳಲ್ಲಿ ಹೇಳಲಾಗಿದೆ. |
hin_Deva | kan_Knda | यहाँ द्वितीयान्त को समर्थ से सुबन्त से समास होता है। | ಇಲ್ಲಿ ದ್ವಿತೀಯಾಂತವು ಸಮರ್ಥ ಸುಬಂತದಿಂದ ಸಮಾಸವಾಗುತ್ತದೆ. |
kan_Knda | san_Deva | ಛಂದ ಅಭಿದಾನದಿಂದ ಈ ಅಂಗದಿಂದ ಎಲ್ಲಾ ಉಚ್ಚಾರಣಾ ವಿಧಿ , ಅವುಗಳ ಪ್ರಕಾರ ಮತ್ತು ಅದರ ಸಂಖ್ಯೆಯ ಜ್ಞಾನವು ಇರುತ್ತದೆ. | छन्दोभिधेन एतेन अङ्गेन छन्दसां सर्वेषाम् उच्चारणविधिः तद्गतिप्रकारः तद्गानरीतिश्च विदिता भवति। |
kan_Knda | hin_Deva | ಒಂಭತ್ತನೇ ಅಧ್ಯಾಯದಲ್ಲಿ ಪ್ರಾಣದ ಶ್ರೇಷ್ಠತೆಯನ್ನು ವರ್ಣಿಸಲಾಗಿದೆ. | नौवें अध्याय में प्राण की श्रेष्ठता का वर्णन है। |
hin_Deva | kan_Knda | इसी प्रकार अन्य भी अपभाषण, दुष्ट शब्द, अर्थज्ञान, धर्मलाभ नामकरण आदि प्रयोजनों की व्याख्या महाभाष्य में की है। | ಇದೇ ರೀತಿಯಾಗಿ ಅನ್ಯವಾದ ಅಪಭಾಷಣ, ದುಷ್ಟಶಬ್ದ, ಅರ್ಥಜ್ಞಾನ, ಧರ್ಮಲಾಭ, ನಾಮಕರಣ ಆದಿ ಪ್ರಯೋಜನಗಳ ವ್ಯಾಖ್ಯಾನ ಮಹಾಭಾಷ್ಯದಲ್ಲಿ ಮಾಡಲಾಗಿದೆ. |
hin_Deva | kan_Knda | वेदान्त वाक्यों के द्वारा भी इसी प्रकार का ऐक्य विविक्षित है। | ವೇದಾಂತವಾಕ್ಯಗಳಲ್ಲಿ ಇಂತ ಐಕ್ಯತೆಯನ್ನು ಹೇಳಲಾಗಿದೆ. |
kan_Knda | san_Deva | ಇಲ್ಲಿ ಯಾವುದರ ವೇತ್ತಾ ಇರುವುದಿಲ್ಲ. | न तस्यास्ति वेत्ता, कस्य ? |
hin_Deva | san_Deva | इससे स्वरित स्वर का विधान करते है। | अनेन स्वरितस्वरः विधीयते। |
kan_Knda | hin_Deva | ಇಲ್ಲಿ ಪಂಚಮೀ ಎನ್ನುವುದು ಪ್ರಥಮಾ ಏಕವಚನಾಂತ ಮತ್ತು ಭಯೇನ ಇದು ತೃತೀಯಾ ಏಕವಚನಾಂತ ಶಬ್ದವಾಗಿದೆ. | यहाँ पञ्चमी इस प्रथमा एकवचनान्त तथा भयेन यह तृतीया एक वचनान्त पद हैं। |
san_Deva | kan_Knda | नित्यादीनां फलं संगृह्णीत। | ನಿತ್ಯದಿಗಳ ಫಲವನ್ನು ಸಂಗ್ರಹಿಸಿ. |
hin_Deva | san_Deva | 'वृषों अग्निः समि॑ध्यते' यहाँ पर वकार से उत्तर ऋकार का किस सूत्र से उदात्त स्वर है? | 'वृषौ अग्निः समिध्यते' इत्यत्र वकारोत्तरस्य ऋकारस्य केन सूत्रेण उदात्तस्वरः? |
san_Deva | kan_Knda | तदुभयं यथा स्यात्तथा स्वयमेव विविधो भूत्वा व्याप्तवानित्यर्थः॥ | ಇವೆರಡು ಹೇಗೆ ಆದವೋ ಹಾಗೆಯೇ ಆ ಬ್ರಹ್ಮನು ತಾನೇ ವಿವಿಧ ಪ್ರಕಾರವಾಗಿ ಅವುಗಳಲ್ಲಿ ವ್ಯಾಪ್ತನಾಗುತ್ತಾನೆ. |
kan_Knda | hin_Deva | ಮಹಾವ್ರತನ ಅನುಷ್ಠಾನವು ಯಾವಾಗ ಆಗುತ್ತದೆ? | महाव्रत अनुष्ठान कब होता है? |
kan_Knda | hin_Deva | ಶಕ್ತಿಯಿಂದ ಮಾಡುವ ಸ್ತುತಿಗೆ ಒಂದು ಉದಾಹರಣೆ ಇಲ್ಲಿದೆ. | शक्ति से स्तुति करते है यहाँ पर उदाहरण दिया गया है। |
san_Deva | kan_Knda | ऋषिर्नारायणः ऋचामासाम् ईक्षिता। | ಈ ಮಂತ್ರಗಳನ್ನು ನೋಡಿದ ಋಷಿಗಳು ನಾರಾಯಣರಾಗಿದ್ದಾರೆ. |
Subsets and Splits
No community queries yet
The top public SQL queries from the community will appear here once available.