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hin_Deva | san_Deva | जैसा अग्नि और सूर्य यथाक्रम पृथिवीलोक में और द्युलोक में स्वामी हैं, वैसे ही इन्द्र भी अन्तरिक्षलोक में स्वामी है। | यथा अग्निः सूर्यश्च यथाक्रमं पृथिवीलोके किञ्च द्युलोके अधिपती स्तः तथैव इन्द्रः अपि अन्तरिक्षलोके अधिपतिः अस्ति। |
kan_Knda | hin_Deva | ಅಥವಾ ಹಿರಣ್ಮಯ ಮೊಟ್ಟೆಯ ಯಾವ ಗರ್ಭರೂಪದಿಂದ ಅದರ ಉದರದಲ್ಲಿ , ಅದು ಸೂತ್ರಾತ್ಮ ಹಿರಣ್ಯಗರ್ಭವಾಗಿರುತ್ತದೆ. | या फिर हिरण्मय अण्ड जो गर्भरूप से जिसके उदर में है, वो सूत्रात्मा हिरण्यगर्भ है। |
hin_Deva | san_Deva | इस पुरुषसूक्त में प्रारम्भ में पुरुष स्वरूप वर्णित है। | अस्मिन् पुरुषसूक्ते आदौ पुरुषस्वरूपं वर्णितम्। |
kan_Knda | hin_Deva | ಈ ಸೂಕ್ತದಲ್ಲಿ ಪರಮಾತ್ಮನೇ ಜಗನ್ನಿಯಾಮಕನಾಗಿದ್ದಾನೆ, ಈ ಸ್ತುತಿಯನ್ನು ಮಾಡಲಾಗಿದೆ. | इस सूक्त में परमात्मा ही जगन्नियामक है, यह स्तुति की गई है। |
hin_Deva | kan_Knda | ब्राह्मणों का मुख्य विषय है विधि- किसका विधान कब होना चाहिए। | ಬ್ರಾಹ್ಮಣಗಳ ಮುಖ್ಯ ವಿಷಯವೆಂದರೆ ವಿಧಿ-ಯಾವುದರ ವಿಧಾನ ಯಾವಾಗ ಆಗಬೇಕು. |
san_Deva | hin_Deva | व्याख्या-पणिनामकोऽसुरो गाः अपहृत्य बिले स्थापयित्वा बिलद्वारमाच्छाद्य यथा निरुद्धवान् तथा इत्यर्थः। अपां यत् बिलं प्रवहणद्वारम् अपिहितं वृत्रेण निरुद्धम् आसीत्। तत् बिलं प्रवहणद्वारं वृत्रं जघन्वान्, हतवान् इन्द्रः अपववार अपवृत्रमकरोत् वृत्रकृतम् अपां निरोधं परिहृतवान्। | व्याख्या - जिस प्रकार पणी नामक असुर ने गायों को गुफा में बंद कर दिया था, उसी प्रकार वृत्र द्वारा रक्षित उसकी जल रूपी पत्नियां भी निरुद्ध थी जल बहने का मार्ग भी रुका हुआ था, इन्द्र ने वृत्र को मारकर वह द्वार खोला। |
san_Deva | hin_Deva | पूर्वम् एव कथितं यद् ब्राह्मणग्रन्थानां विस्तारः अतीव विशालः व्यापकः च आसीत् इति। | पूर्व ही कहा है कि ब्राह्मण ग्रन्थों का विस्तार अत्यधिक विशाल और व्यापक था। |
san_Deva | kan_Knda | १७. काम्यानां त्यागे को हेतुः। | ೧೭. ಕಾಮ್ಯಗಳ ತ್ಯಾಗದಲ್ಲಿ ಕಾರಣವೇನು ? |
hin_Deva | san_Deva | 8. धृति इसका क्या अर्थ है? | ८. धृतिः इत्यस्य कः अर्थः? |
san_Deva | kan_Knda | एवं कितवस्य जीवनं चलति । | ಈ ಪ್ರಕಾರವಾಗಿ ಜೂಜುಗಾರನ ಜೀವನವು ನಡೆಯುತ್ತದೆ. |
san_Deva | kan_Knda | अयं गवामयनयागः हि सोमयागे अन्तर्गतः। | ಈ ಗವಾಮಯನ ಯಾಗವು ಸೋಮಯಾಗದ ಅಂತರ್ಗತವಾಗಿದೆ. |
kan_Knda | hin_Deva | ಯಾವ ಎರಡು ಪದಗಳ ಅರ್ಥದಲ್ಲಿ ಪರಸ್ಪರ ಸಂಬಂಧವಿರುವುದಿಲ್ಲವೋ ಆ ಎರಡು ಪದಗಳ ಮಧ್ಯೆ ಸಮಾನತೆಯಿರುವುದಿಲ್ಲ. | जिन दो पदों के अर्थो में परस्पर सम्बन्ध नहीं होता है उन पदों के मध्ये समान नहीं होता है। |
san_Deva | hin_Deva | १८.४.५) विज्ञानमयकोशस्य आत्मत्वनिरासः सुषुप्तौ लयं प्राप्य जाग्रति नखशिखान्तं व्याप्य शरीरे वर्तमाना निश्चयात्मिका बुद्धिःविज्ञानमयकोशः भवति। | 18.4.5 ) विज्ञानमयकोश का आत्मत्व निरास सुषुप्ति में लय को प्राप्त करने वाले तथा जाग्रत में नखशिखापर्यन्त व्याप्य शरीर में जो बुद्धि है वह निश्चयात्मिका बुद्धि विज्ञानमय कोश कहलाती है। |
kan_Knda | hin_Deva | ಶಕ್ಯ ಸಾಕ್ಷಾತ್ ಸಂಬಂಧವ್ನ್ನೇ ಕೇವಲ ಲಕ್ಷಣವೆಂದು ಕರೆಯುತ್ತಾರೆ. | शक्यसाक्षात्सम्बन्ध वाली लक्षणा केवललक्षणा कहलाती है। |
kan_Knda | hin_Deva | ಸೂತ್ರಾರ್ಥದ ಸಮನ್ವಯ - ’ವೀದಮ್’ ಇದು ಸ್ವರಿತದ ಉದಾಹರಣೆ. | सूत्र अर्थ का समन्वयः- वींदम् यह स्वरित का उदाहरण है। |
kan_Knda | hin_Deva | ಈ ಸೂತ್ರದಿಂದ ಅನುದಾತ್ತ ಸ್ವರವನ್ನು ನಿಷೇಧಿಸಲಾಗಿದೆ. | इस सूत्र से अनुदात्त स्वर का निषेध होता है। |
san_Deva | kan_Knda | कारणं हि तत्त्वमसि इत्यत्र परोक्षत्वसर्वज्ञत्वापरोक्षत्वकिञ्चिज्ज्ञत्वादिविशिष्टचैतन्यैकत्वस्य वाक्यार्थस्य विरुद्धत्वात् परोक्षत्वसर्वज्ञत्वापरोक्षत्वकिञ्चिज्ज्ञत्वादिविशिष्टांशापरित्यागेन तत्सम्बन्धयुक्तस्य यस्य कस्यापि लक्षितत्वे सत्यपि परोक्षत्वसर्वज्ञत्वापरोक्षत्वाल्पज्ञत्वादिविशिष्टांशानां विरोधः परिहर्तुं नैव ... | ಕಾರಣವು ತತ್ವಮಸಿ ಎಂಬಲ್ಲಿ ಪರೋಕ್ಷತ್ವ ಸರ್ವಜ್ಞತ್ವ ಅಪರೋಕ್ಷತ್ವ ಕಿಂಚಿದ್ ಜ್ಞಾತ್ವಾದಿ ವಿಶಿಷ್ಟ ಚೈತನ್ಯದ ಏಕತ್ವ ವಾಕ್ಯಾರ್ಥದ ವಿರುದ್ಧವಾಗಿ ಪರೋಕ್ಷತ್ವ ಸರ್ವಜ್ಞತ್ವ ಪರೋಕ್ಷತ್ವ ಕಿಂಚಿದ್ ಜ್ಞಾತ್ವಾದಿ ವಿಶಿಷ್ಟ ಅಂಶಗಳ ಪರಿತ್ಯಾಗದಿಂದ ಅದಕ್ಕೆ ಸಂಬಂಧಿಸಿದ ಯಾವ ಲಕ್ಷಿತವು ಇದ್ದಾಗ ಪರೋಕ್ಷತ್ವ ಸರ್ವಜ್ಞತ್ವ ಪರೋಕ್ಷತ್ವ ಅಲ್ಪಜ್ಞತ್ವ ವಿಶಿಷ್ಟ ಅಂಶಗಳ ವಿರೋಧದ ಪರಿಹಾರವನ್ನು ಕೊಡಲಾಗುವುದಿಲ... |
kan_Knda | hin_Deva | ಅನುದಾತ್ತ ಎಂಬುದು ಪ್ರಥಮಾವಿಭಕ್ತಿಯ ಏಕವಚನಾಂತಪದವಾಗಿದೆ. | और अनुदात्तः यह प्रथमा एकवचनान्त पद है। |
kan_Knda | san_Deva | ಈ ಶಿಕ್ಷಾಗಳ ಸಂಕ್ಷಿಪ್ತ ವರ್ಣನೆಯನ್ನು ಇಲ್ಲಿ ಕೊಡಲಾಗಿದೆ. | आसाम् एव शिक्षाणां संक्षिप्तवर्णनम् अत्र दास्यते। |
san_Deva | hin_Deva | काम्यकर्माणि बन्धनं कुर्वन्ति। तेषां त्याग एव विधीयते। | काम्यकर्म बन्धन करतें है इसलिए उनके त्याग का ही विधान किया गया है। |
kan_Knda | san_Deva | ಪ್ರಥಮಾ ಏಕವಚನದಲ್ಲಿ ಈ ರೂಪವು ಆಗುತ್ತದೆ. | प्रथमैकवचने रूपमिदम्। |
kan_Knda | hin_Deva | ಮತ್ತು ಅವರು ಯಾವ ಫಲದ ಕಾಮನೆಯಿಂದ ಯಜ್ಞವನ್ನು ಮಾಡುತ್ತಾರೆಯೋ ಆ ಫಲದ ಲಾಭವಾಗಬೇಕು ಹೀಗೆ ಅವರ ಇಚ್ಛೆ ಇರುತ್ತದೆ. | और वे जिस फलकी कामना से यज्ञ करते हैं वह फल लाभ हो ऐसी उनकी इच्छा होती है। |
san_Deva | kan_Knda | तेषु मन्त्राणां विनियोगविषये च सविस्तीर्णं वर्णनं प्राप्यते। | ಅವುಗಳಲ್ಲಿ ಮಂತ್ರಗಳ ವಿನಿಯೋಗ ವಿಷಯಗಳಲ್ಲಿ ವಿಸ್ತಾರವಾದ ವರ್ಣನೆಯು ಲಭ್ಯವಾಗುತ್ತದೆ. |
kan_Knda | hin_Deva | ತೇಜೋಮಯವಾದ ಅಂತಃಕರಣದಿಂದ ಜೀವದ ಹೆಸರು ತೇಜಸ್ ಎಂದು. | तेजोमय अन्तःकरण से उपहित जीव का तैज इस प्रकार का नाम होता है। |
kan_Knda | san_Deva | ಬ್ರಹ್ಮನು ಯಜ್ಞ ವೀಕ್ಷಕ. ಯುಕ್ತ-ಅಯುಕ್ತವನ್ನು ಪರೀಕ್ಷಿಸುತ್ತಾನೆ. ಅವನ್ನು ಎಲ್ಲ ವಿಧಿಯ ಮಂತ್ರವನ್ನು ತಿಳಿದಿರುತ್ತಾನೆ. ಅದಕ್ಕೆ ಬೇಕಾದ ಮಂತ್ರಗಳ ಸಂಗ್ರಹ ಅಥರ್ವವೇದ. | ब्रह्मा यज्ञनिरीक्षकः कृताकृतावेक्षणकर्त्ता, स हि सर्वविधमन्त्रज्ञः, तदपेक्षितो मन्त्रराशिः अथर्ववेद इति कथ्यते। |
san_Deva | kan_Knda | अत्यन्तं क्रममाणस्य विष्णोः उत्कृष्टे स्थाने मधुरनिःस्यन्दो वर्तते। | ಮಧುರ ಸರೋವರವು ವಿಷ್ಣುವಿನ ಅತ್ಯುತ್ತಮ ಸ್ಥಳವಾಗಿದೆ. |
kan_Knda | hin_Deva | (ಯಜು 34/6) 35 ನೇ ಅಧ್ಯಾಯವು ಪಿತೃಮೇಧ ಯಜ್ಞದ ಮಂತ್ರಗಳನ್ನು ಒಳಗೊಂಡಿದೆ. | (यजु ३४/६ ) पैंतीसवें अध्याय में पितृमेध यज्ञ सम्बन्धि मन्त्र सङ्कलित है। |
hin_Deva | san_Deva | इस प्रकार से उपनिषद् काल का शुभारम्भ २५०० सौ वि० पूर्व कह सकते है। | अनेन प्रकारेण उपनिषत्कालस्य समारम्भः २५०० वि० पूर्वं शतकं कथयितुं शक्यते। |
hin_Deva | san_Deva | आरण्यक वेदों से औषधि के समान सारभूत है यहाँ क्या प्रमाण है? | आरण्यकं वेदेभ्य ओषधिभ्यः सारभूतमित्यत्र किं प्रमाणम्? |
san_Deva | kan_Knda | अस्य सविस्तृतं वर्णनं तत्र एव अन्येषु अध्यायेषु (१।४।५,२=१- १७) उपलभ्यते। | ಇದರ ವಿಸ್ತಾರವಾದ ವರ್ಣನೆಯನ್ನು ಅಲ್ಲಿಯೇ ಬೇರೆ ಅಧ್ಯಾಯಗಳಲ್ಲಿ (೧/೪/೫,೨=೧-೧೭) ಇದರಲ್ಲಿ ಲಭ್ಯವಾಗುತ್ತದೆ. |
hin_Deva | kan_Knda | इसलिए उसे संशय अविरोधि निश्चयात्मक ज्ञान विधिवत् वेदाध्ययन के द्वारा सम्पादित करना चाहिए। | ಹಾಗೆಯೇ ಸಂಶಯಾವಿರೋಧಿನಿಶ್ಚಯಾತ್ಮಕವಾದ ಜ್ಞಾನವು ವಿಧಿವದ್ವೇದಾಧ್ಯಯನನಿಂದ ಸಂಪಾದಿಸಬೇಕಾಗುತ್ತದೆ. |
hin_Deva | kan_Knda | इस सूत्र में वाचादीनाम् उभौ उदात्तौ ये सूत्र में आये पदच्छेद हैं। | ಈ ಸೂತ್ರದಲ್ಲಿ ವಾಚಾದೀನಾಂ ಉಭೌ ಉದಾತ್ತೌ ಈ ಸೂತ್ರದಲ್ಲಿ ಬಂದ ಪದಚ್ಛೇದಗಳಾಗಿವೆ . |
hin_Deva | san_Deva | 12. यस्माज्जातम् ... इस मन्त्र कौ व्याख्या कीजिए। | १२. यस्माज्जातम् ... इति मन्त्रं व्याख्यात। |
san_Deva | hin_Deva | सरलार्थः- अत्र मन्त्रे अग्निं प्रति उच्यते यत् हे अग्ने अङ्गिरो वा त्वं हविदानकारिणां यजमानानां कृते यत् कल्याणं करोषि तत् वस्तुतः तवैव सुखसाधनम् अस्ति। | सरलार्थ - यहाँ मन्त्र में अग्नि के प्रति कहते है की हे अग्नि अथवा अङिगर तुम हविदान करने वाले यजमान के लिए जो कल्याण करोगे वह वस्तुतः आप का ही सुख साधन है। |
kan_Knda | hin_Deva | ಹೇಗೆ ರಾಜನು ಯುದ್ಧ ಮಾಡುತ್ತಾ ಯೋದ್ಧರಲ್ಲಿ ಮತ್ತು ಯುದ್ಧ ಮಾಡುತ್ತಿರುವರ ಮಧ್ಯದಲ್ಲಿ ತಾನೇ ಯುದ್ಧ ಮಾಡುತ್ತಿಲ್ಲದೆಯೇ ಸಂನಿಧಿ ಮಾತ್ರದಿಂದ ಗೆಲ್ಲುತ್ತಾನೆಯೇ ಮತ್ತೆ ಸೋಲುತ್ತಾನೆ. | जैसा राजा युद्ध करते हुए योद्धाओं में युद्ध करते हुओं के बीच में स्वयं युद्ध नहीं करता हुआ भी संन्निधि मात्र से ही जीतता है तथा पराजित होता है। |
san_Deva | hin_Deva | आत्मनः कति रूपाणि? | आत्मा के कितने रूप होते हैं? |
san_Deva | hin_Deva | ततः प्रकृतसूत्रेण समासे उपसर्जनसंज्ञकस्य कृष्ण अम् इत्यस्य पूर्वनिपातः भवति। | इसके बाद प्रकृतसूत्र से समास में उपसर्जनसंज्ञक का कृष्ण अम् इसका पूर्व निपात होता है। |
san_Deva | hin_Deva | तथा देवानपि यज्ञस्थलमावहति। | और देवों का भी यज्ञस्थल में आह्वान करती है। |
san_Deva | kan_Knda | अर्थात् “सोऽयं देवदत्तः” इत्यत्र त्यक्तयोः विरुद्धयोः सशब्दायंशब्दयोः तदर्थयोः च लक्षणत्वम्। | ಅಂದರೆ "ಸೋಽಯಂ ದೇವದತ್ತಃ" ಇಲ್ಲಿ ತ್ಯಜಿಸಲಾದ ವಿರುದ್ಧಗಳ ಸ ಶಬ್ದ ಮತ್ತು ಅಯಂ ಶಬ್ದಗಳ ತದರ್ಥಗಳ ಲಕ್ಷಣವೇ ಲಕ್ಷಣವಾಗಿದೆ. |
kan_Knda | san_Deva | ರುಣಧ್ಮಿ - ರುಧ್- ಧಾತುವಿನಿಂದ ಲಟ್ ಉತ್ತಮಪುರುಷ ಏಕವಚನದಲ್ಲಿ ಇದೆ. | रुणध्मि - रुध् - धातोः लटि उत्तमपुरुषैकवचने । |
kan_Knda | san_Deva | ಸೋಮರಸವೇ ಸೋಮಯಾಗದ ಪ್ರಧಾನ ಆಹುತಿ. | सोमरसः एव सोमयागस्य प्रधानम् आहुतिः। |
san_Deva | hin_Deva | सूत्रार्थसमन्वयः- अत्र अङ्ग इत्यनेन युक्तं कुरु इति तिङन्तम् अस्ति। | सूत्र अर्थ का समन्वय- यहाँ अङ्ग इससे युक्त कुरु यह तिङन्त पद है। |
san_Deva | hin_Deva | सूत्रार्थसमन्वयः - पचादिगणे देवट्-इति शब्दस्य पाठात् दिव्-धातोः 'नन्दिग्रहिपचादिभ्यो ल्युणिन्यचः' इति सूत्रेण अच्-प्रत्यये देवशब्दः निष्पद्यते। | सूत्र अर्थ का समन्वय - पचादिगण में देवट्- इस शब्द के पाठ से दिव्-धातु को ' नन्दिग्रहिपचादिभ्यो ल्युणिन्यचः' इस सूत्र से अच्-प्रत्यय करने पर देवशब्द बनता है। |
kan_Knda | hin_Deva | ಸುಷುಪ್ತಿಯಲ್ಲಿ ಮನಸ್ಸಿನ ಅಭಾವದಿಂದ ಜಗತ್ತಿನ ಪ್ರತೀತಿಯೇ ಇಲ್ಲ. | इसलिए सुषुप्ति में जगत को प्रतीति नहीं होती हे। |
san_Deva | kan_Knda | तद् दिव्यरूपं दृष्ट्वा स मोहितो भवति। | ಆ ದೈವಿಕ ಸ್ವರೂಪವನ್ನು ನೋಡಿ ಅವನು ಆಕರ್ಷಿತಳಾಗುತ್ತಾನೆ. |
kan_Knda | hin_Deva | ಮತ್ತು ಅಲ್ಲಿ ಸಾಯಾಣಾಚಾರ್ಯರ ಭಾಷ್ಯದಲ್ಲಿ ಬರೆಯಲಾಗಿದೆ. | और वहाँ सायणाचार्य ने भाष्य लिखा है। |
kan_Knda | san_Deva | ವೃಷಾದೀನಾಂ ಚ ಈ ಸೂತ್ರವನ್ನು ವ್ಯಾಖ್ಯಾನಿಸಿರಿ . | वृषादीनां च इति सूत्रं व्याख्यात। |
san_Deva | hin_Deva | "चतुर्थी तदर्थार्थबलिहितसुखरक्षितैः" इति सूत्रस्यार्थः कः? | “चतुर्थी तदर्थार्थबलिहितसुखरक्षितैः'” इस सूत्र का अर्थ क्या हैं? |
kan_Knda | san_Deva | ವಿಧೇಮ - ಪೂಜಾರ್ಥಕ ವಿಧ್-ಧಾತುವಿನಿಂದ ವಿಧಿಲಿಂಗ್ ಲಕಾರ ಉತ್ತಮಪುರುಷ ಬಹುವಚನದಲ್ಲಿ ವಿಧೇಮ ರೂಪವು ಸಿದ್ಧವಾಗುತ್ತದೆ. | विधेम- पूजार्थकात् विध्-धातोः विधिलिङि उत्तमपुरुषबहुवचने विधेम इति रूपम्। |
hin_Deva | san_Deva | “प्राक्कडारात्समासः'', “सह सुपा”, “तत्पुरुषः'' ये तीन अधिकृत सूत्र हैं। | " प्राक्कडारात्समासः " , " सह सुपा " , " तत्पुरुषः " इत्येतानि अत्र अधिकृतानि । |
hin_Deva | san_Deva | द्विगु समास का तत्पुरुष भेद से “परवल्लिङग हन्दतत्पुरुषयोः'' इससे प्राप्त द्विगु का और द्वन्द का परवलियङ्गता से अपवाद यही सूत्र हैं। | द्विगुसमासस्य तत्पुरुषभेदत्वात् "परवल्षिङ्गं द्वन्द्वतत्पुरुषयोः" इत्यनेन प्राप्तायाः द्विगोः द्वन्द्वस्य च परवल्लिङ्गताया अपवादभूतं सूत्रमिदम् । |
san_Deva | hin_Deva | सूत्रे "प्रत्ययः", "ङ्याप्प्रातिपदिकात्", "परश्च", "तद्धिताः", "समासान्ताः" इत्येतानि अधिकृतानि। | सूत्र में "प्रत्ययः", "ङ्याप्प्रातिपदिकात्", "परश्च", "तद्धिताः", "समासान्ताः" ये अधिकृत सूत्र हैं। |
hin_Deva | kan_Knda | अथवा वृत्रैः तरति इससे वृत्रतरम् बनता है। | ಅಥವಾ ವೃತ್ರೈಃ ತರತಿ ಇದರಿಂದ ವೃತ್ರತರಮ್ ಆಗುತ್ತದೆ. |
kan_Knda | san_Deva | ಪೂರ್ವ ಕಾಯಸ್ಯ ಎಂಬ ಲೌಕಿಕ ವಿಗ್ರಹದಲ್ಲಿ ಪೂರ್ವ ಸು ಕಾಯ ಜ್ಞಸ್ ಎಂಬ ಅಲೌಕಿಕ ವಿಗ್ರಹದಲ್ಲಿ "ಷಷ್ಠೀ" ಇದರಿಂದ ಷಷ್ಠೀತತ್ಪುರುಷಸಮಾಸವಾಗುವಾಗ ಅದನ್ನು ಬಾಧಿಸಿ ಪ್ರಕೃತ ಸೂತ್ರದಿಂದ ಕಾಯ ಜ್ಞಸ್ ಎಂಬ ಏಕತ್ವಸಂಖ್ಯಾವಿಶಿಷ್ಟದಿಂದ ಅವಯವಿವಾಚಕದ ಸುಬಂತದಿಂದ ಪೂರ್ವ ಸು ಎಂಬ ಸುಬಂತ ಪ್ರೋಕ್ತವಾದ ಸೂತ್ರದಿಂದ ತತ್ಪುರುಷಸಮಾಸಸಂಜ್ಞಾ ಆಗುತ್ತದೆ. | पूर्व कायस्येति लौकिकविग्रहे पूर्व सु काय ङस् इत्यलौकिकविग्रहे "षष्ठी" इत्यनेन षष्ठीतत्पुरुषसमासे प्राप्ते तं प्रबाध्य प्रकृतसूत्रेण काय ङस् इति एकत्वसंख्याविशिष्टेन अवयविवाचकेन सुबन्तेन पूर्व सु इति सुबन्तं प्रोक्तसूत्रेण तत्पुरुषसमाससंज्ञं भवति। |
san_Deva | hin_Deva | षड्-ऋचात्मकस्य सूक्तस्यास्य ऋषिः याज्ञवल्क्यः, मनो देवता, त्रिष्टुप् छन्दः। | छः मन्त्र वाले इस सूक्त के ऋषि याज्ञवल्क्य, मनो देवता, त्रिष्टुप् छन्द है। |
san_Deva | hin_Deva | कर्मधारयसमासः विशेष्यविशेषणयोः मध्ये भवति। | कर्मधारयसमास विशेष्य और विशेषण के मध्य में होता है। |
kan_Knda | hin_Deva | ಕೃ ಧಾತುವಿನಿಂದ ಶತೃ ಪ್ರತ್ಯಯ ಮತ್ತು ಶಾನಚ್ ಪ್ರತ್ಯಯವಾದಾಗ ಕ್ರಮವಾಗಿ ಕುರ್ವನ್ ಮತ್ತು ಕುರ್ವಾಣಃ ಇವೆರಡು ರೂಪಗಳು ಇವೆ. | कृ धातु से शतृप्रत्यय और शानच् प्रत्यय होने पर क्रमके अनुसार कुर्वन् और कुर्वाणः ये दो रूप हैं। |
san_Deva | hin_Deva | अस्मिन् पुरुषसूक्ते आदौ पुरुषस्वरूपं वर्णितम्। | इस पुरुषसूक्त में प्रारम्भ में पुरुष स्वरूप वर्णित है। |
hin_Deva | san_Deva | अनुष्ठान के और हवनीय द्रव्यों के देवताओं की बहुत प्रशसा से ब्राह्मणों के शरीर में वृद्धि हुई। | अनुष्ठानस्य हवनीयद्रव्यस्य च देवतानां भूयसीप्रशंसातः ब्राह्मणानां शरीरं वृद्धिं गतम्। |
san_Deva | hin_Deva | अनेन प्रकारेण हेतुवचनेन पाठकाननुष्ठानानां कारणस्य स्वतः परिचयो प्राप्यते तथा समधिकायाः श्रद्धाया उदयोऽपि भवति। | इस प्रकार के हेतु वचन से पाठकों के अनुष्ठानों के कारण का अपने आप परिचय प्राप्त होता है, तथा समाधन रूपी श्रद्धा से उनकी उन्नति भी होती है। |
hin_Deva | san_Deva | आगच्छ यह गति अर्थ वाले लोट् से युक्त तिङन्त भी है। | आगच्छ इति गत्यर्थलोटा युक्तं तिङन्तम् अपि अस्ति। |
hin_Deva | kan_Knda | “अधिकरणवाचिनाच'' इस सूत्र का क्या अर्थ है? | "ಅಧಿಕರಣವಾಚಿನಾ ಚ" ಈ ಸೂತ್ರದ ಅರ್ಥವೇನು? |
san_Deva | kan_Knda | वृषादिगणे तावत् वृष-जन-त्वर-हय-गय-नय-तय-अंश-वेद-सूद-पद-गुहाः इत्यादयः शब्दाः सन्ति। | 'ವೃಷಾದಿಗಣ'ದಲ್ಲಿ "ವೃಷ - ಜನ - ತ್ವರ - ಹಯ - ಗಯ - ನಯ - ತಯ - ಅಂಶ - ವೇದ - ಸೂದ - ಪದ - ಗುಹಾಃ" ಇತ್ಯಾದಿ ಶಬ್ಧಗಳಿವೆ. |
hin_Deva | san_Deva | सूत्र का अर्थ- (वाच्- इत्यादि शब्दों के दोनों वर्ण ही उदात्त हो)। | सूत्रार्थः- (वाच्- इत्यादीनां शब्दानाम् उभौ एव वर्णौ उदात्तौ स्तः)। |
san_Deva | hin_Deva | अस्यैव क्रमस्य अध्यारोपापवादन्यायः इत्युच्यते। | इस क्रम से यह अध्यारोपवाद न्याय कहलाता है। |
hin_Deva | san_Deva | गायत्री छन्द सोम देवताओं को लेकर जा रहा था, मार्ग में गन्धर्वो ने उसका अपहरण कर लिया। | गायत्रीच्छन्दः सोमं देवताभ्यः नीत्वा गच्छति स्म, मार्गे गन्धर्वाः तम् अपहृतवन्तः। |
kan_Knda | hin_Deva | ಶುಭಾಗಮನವಾದ ಮತ್ತು ಸುಲಭ ಉಪಾಯವನ್ನು ಇರುವ ಸೂಪಾಯನ ಎಂದು ಕರೆಯುತ್ತಾರೆ. | शुभागमन वाला और सुलभ उपाय वाला सूपायनः कहलाता है। |
san_Deva | hin_Deva | स च ज्ञानमात्रसाध्यः। | और वह ज्ञान मात्र के द्वारा साध्य होता है। |
hin_Deva | kan_Knda | यह सब उस प्रज्ञा के ही नेत्र हैं क्योंकि प्रज्ञा के द्वारा ही इनको ले जाया जाता है। | ಇವೆಲ್ಲವು ಪ್ರಜ್ಞಾ ನೇತ್ರವಾಗಿದೆ. ಏಕೆಂದರೆ ಪ್ರಜ್ಞೆಯೇ ಎಲ್ಲವನ್ನು ತೆಗೆದುಕೊಂಡು ಹೋಗುತ್ತದೆ. |
kan_Knda | hin_Deva | ಸಮವರ್ತತ - ಸಂ ಪೂರ್ವಕ ವೃದ್-ಧಾತುವಿನಿಂದ ಲಂಗ್ ಲಕಾರ ಪ್ರಥಮಪುರುಷ ಏಕವಚನದಲ್ಲಿ ಸಮವರ್ತತ ರೂಪವು ಸಿದ್ಧಿಸುತ್ತದೆ. | समवर्तत - सम्पूर्वक वृद्-धातू से लड् लकार प्रथमपुरुष एकवचन में समवर्तत रूप सिद्ध होता है। |
kan_Knda | san_Deva | ಇಲ್ಲಿ ಯತ್ ಎಂಬ ಪ್ರತ್ಯಯವಿದೆ. | अत्र यत् इति प्रत्ययः। |
san_Deva | kan_Knda | स्त्रीकर्मविषये अथर्ववेदे यद् उक्तं, तद्विस्तारेण लिखत। | ಸ್ತ್ರೀಕರ್ಮ ವಿಷಯದ ಬಗ್ಗೆ ಅಥರ್ವವೇದದಲ್ಲಿ ಏನು ಹೇಳಿದ್ದಾರೆಯೋ ಅದನ್ನು ವಿಸ್ತಾರವಾಗಿ ಬರೆಯಿರಿ. |
kan_Knda | san_Deva | ಆದ್ದರಿಂದಲೇ ಯಾವ ಸಾಧನದ ನಂತರ ಯಾವ ಸಾಧನೆಯನ್ನು ಮಾಡಬೇಕೆಂದು ಮುಮುಕ್ಷು ಸರಿಯಾಗಿ ತಿಳಿಯಬೇಕು. | अत एव कस्मात् साधनात् परं किं साधनम् कर्तव्यमिति सुष्ठु बोद्धव्यम् मुमुक्षुणा। |
san_Deva | hin_Deva | इतरेतरयोगद्वन्द्वसमासः। श्रितश्च अतीतश्च पतितश्च गतश्च अत्यस्तश्च प्राप्तश्च आपन्नश्च श्रितातीतपतितगतात्यस्तप्राप्तापन्नाः, तैःश्रितातीतपतितगतात्यस्तप्राप्तापन्नैः इति विग्रहः। | इतरेतरयोगद्वन्द समास/श्रितश्च अतीतश्च पतिश्च गतश्च अत्यस्तश्च प्राप्तश्च आपन्नश्च-श्रितातीतपतितगतात्यस्तप्राप्तापन्नाः, तैः श्रितातीतपतितगतात्यस्तप्राप्तापन्नै; यह विग्रह है। |
hin_Deva | kan_Knda | प्रसिद्ध उपनिषदों के मध्य ऋग्वेद के ऐतरेयोपनिषद में “प्रज्ञानं ब्रह्म” इस प्रकार का महावाक्य है। | ಪ್ರಸಿದ್ಧವಾದ ಉಪನಿಷತ್ತುಗಳಲ್ಲಿ ಋಗ್ವೇದದ ಐತರೇಯ ಉಪನಿಷತ್ತಿನಲ್ಲಿ "ಪ್ರಜ್ಞಾನಂ ಬ್ರಹ್ಮ" ಎಂಬ ಮಹಾವಾಕ್ಯವು ಇದೆ. |
hin_Deva | san_Deva | सामर्थ्य दो प्रकार का होता है-एकार्थीभाव रूप और व्यपेक्षा भाव रूप। | तत्र सामर्थ्यं द्विविधम् - एकार्थीभावरूपं व्यपेक्षाभावरूपं चेति। |
san_Deva | kan_Knda | शुक्लयजुर्वदीय-मन्त्रसंहिता वाजसनेयीसंहिता इति नाम्ना विख्याता। | ಶುಕ್ಲ ಯಜುರ್ವೇದ ಮಂತ್ರ ಸಂಹಿತೆಯು ವಾಜಸನೇಯ ಸಂಹಿತೆ ಎಂದು ಪ್ರಸಿದ್ಧವಾಗಿದೆ. |
san_Deva | kan_Knda | अनेन सूत्रेण उदात्तस्वरः विधीयते। | ಈ ಸೂತ್ರದಿಂದ ಉದಾತ್ತ ಸ್ವರದ ವಿಧಾನವನ್ನು ಮಾಡಲಾಗುತ್ತದೆ. |
hin_Deva | san_Deva | ब्रह्म स्वरूप का उसकी प्राप्ति उपाय का, जीव का, जगत का, तथा आत्मा आदि विषयों का विस्तार सहित वर्णन उपनिषद् में है। | ब्रह्मणः स्वरूपस्य तत्प्राप्त्युपायस्य जीवस्य जगतश्च तथा आत्मादिविषयाणां सविस्तरं वर्णनम् उपनिषदि अस्ति। |
hin_Deva | san_Deva | अब अपवाद को आरम्भ करते हैं। | अथ अपवाद आरभ्यते। |
kan_Knda | hin_Deva | ಆಮ್ರಃ ಇಲ್ಲಿ 'ತೃಣಧಾನ್ಯಾನಾಂ ಚ ದುವ್ಯಷಾಮ್' ಎಂಬ ಸೂತ್ರದಿಂದ ಆದ್ಯುದಾತ್ತ ಏಕೆ ಬಂದಿಲ್ಲ? | आम्रः यहाँ पर 'तृणधान्यानां च द्वयषाम्' इस सूत्र से आद्युदात्त कैसे नहीं हुआ? |
kan_Knda | hin_Deva | ಆ ಯಜ್ಞದ ಅಂತಿಮ ದಿನದ ಹಿಂದಿನ ದಿನದಂದು ಮಹಾವ್ರತನ ಅನುಷ್ಟಾನವಾಗುತ್ತದೆ. | उस यज्ञ का जो अन्तिम दिन उससे पहले के दिन में महाव्रत का अनुष्ठान होता है। |
hin_Deva | san_Deva | वर्तमान में निघण्टु ग्रन्थ में 'वृषाकपि' शब्द लिखा हुआ प्राप्त होता सङ्गृहीत है। | वर्तमाने निघण्टुग्रन्थे 'वृषाकपिः' शब्दः सङ्गृहीतः अस्ति। |
hin_Deva | san_Deva | सह शब्द का स आदेश होता है। | सहशब्दस्य सादेशो विधीयते। |
kan_Knda | san_Deva | ಅವಾಗ ಹೇಳುವುದೇನೆಂದರೆ, ಎಷ್ಟು ದೇಶದಲ್ಲಿ ಸ್ವಾಭಾವಿಕಪ್ರಯತ್ನದಿಂದ ಉಚಾರಿತವಾದಂತಹದ್ದು ಸಂಬೋಧನೆ ಮಾಡುವುದರಿಂದ ಕೇಳುವುದಿಲ್ಲವೋ ಅಷ್ಟು ದೇಶ ದೂರಶಬ್ದದಿಂದ ಹೇಳಲ್ಪಡುತ್ತದೆ. | तस्य समाधानम् उच्यते यत् यावति देशे स्वाभाविकप्रयत्नेन उच्चारितं सम्बोध्यमानेन न श्रूयते, तावान् देश एव दूरशब्देन गृह्यते। |
hin_Deva | kan_Knda | 15. उपपूर्वक अस्-धातु से लेट मध्यमपुरुष एकवचन में। | ೧೫. ಉಪಪೂರ್ವಕ ಅಸ್- ಧಾತುವಿನಿಂದ ಲೇಟ್ ಮಧ್ಯಮಪುರುಷ ಏಕವಚನದಲ್ಲಿ. |
kan_Knda | san_Deva | ಆದ್ದರಿಂದ ವೇದಾಂತವು ಏಕಾಂತೋಪಾಯವು. | अतः वेदान्तः एकान्तोपायः। |
kan_Knda | hin_Deva | ಪ್ರತ್ಯಯವನ್ನು ಗ್ರಹಿಸಿದಾಗ " ತದಂತಾಃ ಗ್ರಾಹ್ಯಾಃ" ಈ ನ್ಯಾಯದಿಂದ ತದಂತವನ್ನು ಗ್ರಹಿಸುವಾಗ ಚತುರ್ತ್ಯಂತವೆಂದು ಆಗುತ್ತದೆ. | प्रत्यय ग्रहण करने पर तदन्ता: ग्राह्याः इस न्याय से तदन्त ग्रहण में चतुर्थ्यन्त होती है। |
san_Deva | kan_Knda | "नदीभिश्च" इति सूत्रस्य उदाहरणम् भवति पञ्चगङ्गम् । | "ನದೀಭಿಶ್ಚ" ಈ ಸೂತ್ರದ ಉದಾಹರಣೆಯಾಗಿದೆ ಪಂಚಗಂಗಮ್. |
hin_Deva | san_Deva | यहाँ पदों का अन्वय है - अदेवनस्य अक्षस्य आदि: उदात्तः इति। | ततश्च अत्र पदान्वयः भवति- अदेवनस्य अक्षस्य आदिः उदात्तः इति। |
hin_Deva | kan_Knda | समासः वियक्त्यलोपः ये दोनों यह प्रथमा विभक्ति के एकवचनान्त है। | ಸಮಾಸಃ ವಿಭಕ್ತ್ಯಲೋಪಃ ಈ ಎರಡು ಪದಗಳು ಪ್ರಥಮಾ ಏಕವಚನಾಂತ ಪದಗಳಾಗಿವೆ. |
hin_Deva | kan_Knda | प्रायणीय इष्टी के बाद सोमलता क्रयण का अनुष्ठान देखा जाता है। | ಪ್ರಾಯಣೀಯ ಇಷ್ಟಿಯ ನಂತರ, ಸೋಮಲತಾ ಕ್ರಯಣದ ಅನುಷ್ಠಾನವನ್ನು ನೋಡಬಹುದು. |
kan_Knda | san_Deva | ಅಂಗಿಯು ಶರೀರದ ಸ್ಥಿತಿ ಹೇತು ಶರೀರದಲ್ಲಿ ತಿಂದು ಕುಡಿಯುವ ರಸದಿಂದ ಆಯಿತು. | अङ्गिनः शरिरस्य स्थितिहेतुः शरीरे अशितात् पीताद् रसः जायते। |
kan_Knda | san_Deva | ’ಸ್ವರಿತಾತ್’ ಎಂಬುದು ಪಂಚಮ್ಯಂತಪದ. ಆದ್ದರಿಂದ "ತಸ್ಮಾದಿತ್ಯುತ್ತರಸ್ಯ" ಎಂಬ ಪರಿಭಾಷಾಸೂತ್ರದ ಅನುಸಾರ ಸ್ವರಿತದ ಮುಂದಿರುವ ಎಂಬ ಅರ್ಥದ ಪ್ರಾಪ್ತಿಯಾಗುತ್ತದೆ. | स्वरिताद् इति पञ्चम्यन्तं पदम्, अतः तस्मादित्युत्तरस्य इति परिभाषया स्वरितात् परस्य इत्यर्थो बोध्यः। |
hin_Deva | kan_Knda | वस्तुतः जीव तथा ब्रह्म में अभेद ही होता है। | ವಾಸ್ತವಿಕವಾಗಿ ಜೀವ ಮತ್ತು ಬ್ರಹ್ಮಗಳ ಅಭೇದವು ಇದೆ. |
san_Deva | hin_Deva | योग्यतारूपे यथार्थ अव्ययीभावसमासस्योदाहरणं भवति अनुरूपम् इति। | योग्यतारूप में यथा अर्थ में अव्ययीभावसमास का उदाहरण होता है अनुरूपम्। |
san_Deva | kan_Knda | यजमानः कीदृशं रयिं प्राप्नोति? | ಯಜಮಾನ ಯಾವ ಪ್ರಕಾರವಾದ ಧನವನ್ನು ಪಡೆಯುತ್ತಾನೆ? |
hin_Deva | san_Deva | वह चैतन्य न तो कार्य होता है और ना ही कारण। | तत् चैतन्यं न कार्यम्, नापि कारणं भवति। |
kan_Knda | san_Deva | ಇವುಗಳಲ್ಲಿ ಒಂದು ತಿಳಿದಿಲ್ಲದಿದ್ದರೆ ಅವನು ಯಾವ ಪ್ರಕಾರದ ವೈದ್ಯ. | एषु एकमपि न जानाति चेत् कीदृशः स वैद्यः। |
san_Deva | kan_Knda | केवलसमासः अव्ययीभावसमासः च। "समसनं समासः" इति समासस्य सामान्यलक्षणम्। | ಕೇವಲ ಸಮಾಸ ಮತ್ತು ಅವ್ಯಯೀ ಭಾವ ಸಮಾಸ. "ಸಮಸನಂ ಸಮಾಸಃ" ಎಂಬುದು ಸಮಾಸದ ಸಾಮಾನ್ಯ ಲಕ್ಷಣವಾಗಿದೆ. |
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